“जिस अंतस में संवेदना का अभाव, वह मात्र जड़ देह है,चैतन्य मनुष्य नहीं” — सुश्री सरोज कंसारी।

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री, लेखिका एवं शिक्षाविद्

मानवीय संवेदनाओं की मुखर अभिव्यक्ति करने वाली समाजसेविका।

नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

 

                         (नया अध्याय, देहरादून)

 

“जिस अंतस में संवेदना का अभाव, वह मात्र जड़ देह है,चैतन्य मनुष्य नहीं” — सुश्री सरोज कंसारी।

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मनुष्य की असली पहचान उसकी शारीरिक बनावट से नहीं, बल्कि उसके हृदय की संवेदनशीलता से होती है। यदि हम दूसरों के दर्द को महसूस नहीं कर सकते, तो हम जीवित होते हुए भी मृत समान (जड़) हैं। मानवता का आधार ही एक-दूसरे के प्रति संवेदना रखना है। यह पृथ्वी ईश्वर का वह अनमोल वरदान है जिसे हमें एक सुंदर उपवन के रूप में देखना चाहिए। इसकी शाश्वत आभा और प्रसन्नता सदा बनी रहे। ईश्वरीय अनुकंपा से समस्त जीव-जगत् के संग ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के भाव को साकार कर सकें। आपकी मंज़िल आपकी सोच से भी कहीं बड़ी और ऊँची है। आगे चलकर आप जो हासिल करेंगे, वो आपको खुद हैरान कर देगा। अतीत की दुखद यादें (पुरानी स्याही) अक्सर हमारे आज के सुख (नये पन्ने) को खराब कर देती हैं। अगर हम पुरानी बातों को सोचकर दुखी होते रहेंगे, तो हम आज के दिन की खूबसूरती को भी काला कर देंगे। बीते हुए कल के दुख को आज की खुशी बर्बाद मत करने दो। क्योंकि, सांसारिक उलझनों और अंतर्मन की व्यथाओं से थककर इंसान एक समय के बाद बहस और शिकायतों से किनारा कर लेता है। जब निराशाएँ बढ़ने लगती हैं, तो मौन और समझौता ही विकल्प बन जाते हैं। यही वह पड़ाव है जहाँ से बाहरी कोलाहल थमता है और अंतर्मन की यात्रा शुरू होती है। बाधाओं के बावजूद जीवन में उम्मीदें कभी दम नहीं तोड़तीं, हम चाहतों और पाने की इच्छा से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाते। जो व्यक्ति पूरी तरह शांत हो जाते हैं, उनका मौन हार नहीं, बल्कि जीवन की गहरी समझ व आत्म-मंथन का प्रतीक होता है। खामोश होने का अर्थ यह नहीं कि कहने को कुछ शेष नहीं, बल्कि यह उस अंतर्मन की व्यथा है जो अब शब्दों को व्यर्थ मान चुकी है। अपनो के व्यवहार और सांसारिक यातनाओं से परिचित होकर मनुष्य अक्सर एकांत चुन लेता है। वह समझ जाता है कि दूसरों से अपेक्षाएं केवल मानसिक संताप देती हैं; इसलिए वह स्वयं से सुलह कर लेता है और मानसिक शांति की खातिर दूसरों की त्रुटियों को भी स्वीकार कर लेता है। जहाँ कुछ इन्सान इस मानसिक बोझ तले दबकर, अंदर से रिक्त हो जाते हैं, वहीं धैर्यवान व्यक्ति इसी संघर्ष से नई चेतना जागृत करते हैं। वे दुख के सागर में डूबने के बजाय, अपनी अंतर्यात्रा को आत्म-मंथन का माध्यम बनाते हैं और राख से पुनर्जीवित होकर, सफलता की एक नई इबारत लिखने में जुट जाते हैं। सांसारिक जीवन एक कठिन तपस्या है; जो इस ताप को सह लेते हैं, वही निखरकर आगे बढ़ते हैं। पीड़ा में भी जिजीविषा बनाए रखने वाले लोग ही समाज के लिए प्रेरणा पुंज बनते हैं। जब हम समर्पण के साथ परोपकार में जुट जाते हैं, तो मन के सारे द्वंद्व स्वतः समाप्त हो जाते हैं। दुर्भावनाओं का त्याग कर हृदय में सद्भावना का दीप जलाए रखना ही श्रेष्ठ जीवन का परिचायक है। यह तो सच है कि संघर्ष की ठोकरें कभी-कभी सशक्त व्यक्ति को भी डगमगा देती हैं और एकाकीपन का बोझ भारी लगने लगता है, किंतु ऐसे ही संकटपूर्ण क्षणों में अडिग रहकर स्वयं को संभाल लेना ही सच्ची उपासना, सर्वोपरि धर्म और वास्तविक मनुष्यता है। जीवन के सफ़र में अक्सर हम दुःख से इतना डरते हैं कि उसे बचाने के चक्कर में सुख का आनंद लेना ही भूल जाते हैं। सच तो यह है कि दुःख ही हमें मजबूत बनाता है और जीवन की असलियत से वाकिफ कराता है। यदि हम अपने भीतर सहनशीलता पैदा कर लें, तो हर मुश्किल का शांति से हल निकाला जा सकता है। जब इंसान तकलीफ-दुःख में होता है, तो वह बहुत भावुक हो जाता है; तब छोटी सी कड़वी बात भी बहुत बुरी लगती है। जिन्होंने कभी संघर्ष नहीं देखा, उन्हें छोटी सी समस्या भी पहाड़ जैसी लगती है। अंत में समझ आता है कि सब हमारे मन का खेल है। अगर हम अपनी सोच को सकारात्मक रखें और छोटी-छोटी बातों को दिल से लगाना छोड़ देंगे, तो मन की बेचैनी अपने आप कम हो जाती है। रिश्तों में सच्चाई और संवेदनशीलता ही हमें दूसरों की मानसिकता समझने और जीवन के प्रति सकारात्मक नज़रिया रखने की शक्ति देती रहती है। जीवन एक रणभूमि है, जहाँ एक वीर योद्धा की तरह अंत तक डटे रहना अनिवार्य है; क्योंकि ज़रा सी,लापरवाही हमें कमज़ोर कर सकती है। याद रखें, अशांत मन समस्याओं का समाधान नहीं ढूँढ सकता। अक्सर क्रोध और चिड़चिड़ापन हमें अपनों से दूर कर देता है। यद्यपि हर व्यक्ति दिनभर की थकान के बाद सुकून की नींद चाहता है, लेकिन यह सुख सिर्फ़ उन्हें ही मिलता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी सचेत रहकर मुस्कुराना जानते हैं। कुछ लोग बेचैन रहते हैं रात के अंधेरे में उनकी चिंताएँ और गहरी होने लगती हैं,सिसकते हैं और कुछ परेशानियों को याद कर उन्हें घबराहट होती है। परेशान मन खामोश हो जाता है कि सवेरा क्या होगा? जब मन अधूरे कार्यों, ऋण के भार, किसी बड़ी चूक या प्रियजनों की चिंता जैसी उथल-पुथल से घिरा होता है, तब रातों की नींद और मन का चैन छिन जाता है। अक्सर रात का सन्नाटा अंतर्मन की पीड़ा को और सघन कर देता है, जिससे नकारात्मक विचार भयभीत करने लगते हैं। अकेलेपन में अपनी व्यथा से उलझने के बजाय अपनों का साथ खोजें और उनसे संवाद करें। मन में दुख का बोझ दबाए रखने से मनुष्य भीतर से निर्बल हो जाता है, अतः उचित यही है कि परस्पर सहयोग से समाधान खोजा जाए। पुरानी दुखद स्मृतियों को विदा कर, अपने वर्तमान में छोटी-छोटी खुशियों का सृजन करने का अनवरत प्रयास करते रहें।

निष्कर्षतः, कवयित्री एवं लेखिका सुश्री सरोज कंसारी जी का यह भावप्रवण एवं प्रेरणादायी आलेख अतीत की कटु स्मृतियों को विस्मृत कर, वर्तमान की धुरी पर आनंद के नूतन सृजन का मार्ग प्रशस्त करता है। उनकी लेखनी हमें सकारात्मकता के आलोक से दीप्त करती है और यह बोध कराती है कि जीवन की विषमताएँ एवं वेदनाएँ ही वस्तुतः मानवीय जीवटता को परिष्कृत करती हैं तथा हमें यथार्थ के धरातल पर सुदृढ़ बनाती हैं।

 

             नारी शक्ति एवं अस्मिता की सशक्त प्रतीक

 

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