सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री एवं लेखिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, देहरादून)
आलेख :
“आज धरा के प्राणी स्वयं को बैर से मुक्त करेंगे, तभी यह सृष्टि पुनः सौंदर्यमयी बन सकेगी” — सुश्री सरोज कंसारी
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आँखों में आँसू भरे हों, तब भी निरंतर गतिमान रहो, अपने अश्रुओं को ओझल कर पराजय को अस्वीकार कर लें। आज संपूर्ण संसार आपकी इस जिजीविषा को नमन कर रहा है। निश्चित ही प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में प्रगति करने, व्यक्तित्व के विकास और ख्वाहिशों को पूर्ण करने का अधिकार है। ध्यान रखें! किसी को पीछे करने की चाह के बिना सदा अच्छाई और सच्चाई के साथ कार्य करते रहें। मेहनत कर सफल होना, लाभ प्राप्त करना हर मनुष्य का स्वाभाविक गुण होता है, पर, किसी को हानि पहुँचाना आपका उद्देश्य न हो। जीवन-मरण के इस चक्र से गुजरते हुए अपनी मानसिकता स्वस्थ रखें। दूसरों को कष्ट देकर कभी सुख, शांति और समृद्धि की कामना न करें। किए गए कर्म हर पल पीछा करते हैं। कभी अपनी असफलता और दुख के लिए किसी को दोषी मत मानिए। आत्मबोध से हर संशय मिट जाते हैं। किसी भी बात के कई पहलू होते हैं, बिना जाने कोई भी निर्णय मत लीजिए। आज मनुष्य जीवन अति व्याकुल और तनाव से भरा सफ़र है। इंसान के चेहरे पर मायूसी और दर्द यूँ ही नहीं होती। अपनों से मिले कष्ट वैसे भी बहुत भारी होते हैं, फिर भी सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर पर हमें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हर इंसान के जीवन में परिवार सबसे महत्वपूर्ण होता है। लेकिन, आज उनकी उपेक्षा, आधुनिक जीवनशैली की ओर अधिक झुकाव, सामंजस्य के अभाव, स्वार्थ की अधिकता की वजह से ही कलह-द्वेष, मनमुटाव, आपसी कड़वाहट, झगड़े, विवाद बढ़ रहे हैं। किसी का जीवन तनाव से मुक्त नहीं है। आज हम खुद को जरा सी परेशानी में देख धैर्य खो देते हैं। किसी भी रिश्ते को जब अपनों से भावनात्मक सहयोग, प्रेम और सांत्वना नहीं मिलता, तब वे कमजोर होने लगते हैं। जहां आपस में लगाव होता है, वहां गलतियों की माफी हो जाती है, स्वार्थ की अधिकता से रिश्ते टूटते हैं। अपने में हो रही होनी-अनहोनी, तकलीफ का कारण जब तक दूसरों को मानते रहेंगे, हम कभी शांति से नहीं रह सकते। गलतफहमी से रिश्तों में अक्सर दरारें आती हैं। मुसीबत में क्रोधित, दुखी और निराश होने की बजाय मन की गहराई में जाकर आत्मचिंतन कीजिए, समाधान निश्चित मिलेंगे। भटकिए मत, संभलने की कोशिश कीजिए। शांत मन से हर कार्य सही होते हैं। भावनाओं में शुद्ध विचारों का संचार निरंतर होने दीजिए। अनहोनी के बाद भी अगर आप अडिग हैं, विचलित नहीं होते, तो आप निश्चित ही आत्मविश्वास से भरें मजबूत व्यक्तित्व हैं। जीवन में संघर्ष करते हुए हमें हर तरह के व्यक्ति से अनुभव मिलते हैं। हर इंसान की कोई कहानी होती है, उन्हें जानने-समझने की कोशिश करें तो हमें जीवन के मूल तत्व की जानकारी प्राप्त होती है, जिससे कई रहस्य हम जान पाते हैं। सब कुछ हम खुद से नहीं सीख सकते, अपनो के सहारे के बिना जीवन सच में अधूरा ही होता है। मानवीय भावनाओं को प्रज्ज्वलित करते रहिए… जब सही समय होता है, हम अपने आप में व्यस्त और मस्त होते हैं। लेकिन, दुख की घड़ी में सहयोग चाहते हैं, यही स्वार्थ की प्रवृत्ति हमें बेबस कर देती है। जीवन के हर क्षेत्र में सहयोगी रहना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। खुद सफल होकर, दूसरों के लिए भला करते रहें। जब हम सकारात्मक सोच रखते हैं, बिना किसी दिखावे के जब दूसरों के दुख में सहभागिता देते हैं… उनकी तकलीफ में मदद करते हैं, तब लोगों से जुड़ते हैं। सहयोगी व्यक्ति हर जगह सम्माननीय होते हैं, वे न केवल अपने सुख के लिए बल्कि संगठित समाज, परिवार और राष्ट्र के विकास में सहयोगी बनते हैं। जीवन कठिनाइयों से भरा है, सहयोगी बनकर ही हर सुख-दुख का निर्वहन अच्छे से कर सकते हैं। स्वार्थपूर्ण जीवन में, इंसान एक समय के बाद अकेले रह जाते हैं। याद रखिए! अच्छे कार्य के लिए किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं होता और बुरे कर्म कर कोई बच नहीं सकते। हमें किस राह चलना है, यह खुद तय कीजिए। जीवन की इस धारा में बहते हुए न जाने हम कहां जाएंगे, किसी को पता नहीं होता? एक उम्मीद ही है जो हमें हर परिस्थिति पर चलते रहने का साहस देती है। मन के निश्छल होने से किसी तरह का भय नहीं होता। निर्भय होकर निकलिए जीवन की इस राह पर और हर एक पल को जीवंत बनाइए। उलझनों के बीच ही अपने चाहत को ढूंढिए। मानिए जो छूट गया वो भी महत्वपूर्ण था, पर अफसोस मत कीजिए, जो है उसे भी बेहतर बनाना आवश्यक है। कभी मुस्कुराते हुए होठों पर खुशियों के गीत होते हैं, कभी व्याकुल मन, फिर भी जिंदगी हमें हर पल में नई ताजगी के साथ उठने, मेहनत करने, प्रेम बांटने और जीवन के प्रति सकारात्मक रहने के कई विकल्प देती है। सच्चा विजेता वह नहीं होता है, जिसे कभी दुख न मिला हो, बल्कि वह होता है जिसने गहरे दुख और पीड़ा में भी मुस्कुराते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना नहीं छोड़ा और अंततः अपनी इच्छाशक्ति से अपनी नियति को बदल दिया…स्पष्टवादिता ही श्रेष्ठ है, किंतु लोक-मर्यादा का निर्वाह भी आवश्यक है; अंततः हृदय की पुकार सुनना ही श्रेयस्कर है। आज संसार में शेष ही क्या है? प्रेम का स्थान युद्ध, घृणा और प्रतिशोध ने ले लिया है। स्वयं को इस बैर से मुक्त करें, तभी यह सृष्टि पुनः सौंदर्यमयी बन सकेगी। यदि मानवता करुणा को अपना आधार बना ले, तो हर आंगन सुख की वर्षा से सराबोर होगा। तब मनुष्य मनुष्य के दुःख को समझेगा, उसका रक्त नहीं बहाएगा। अगर हम संवेदनशील और सहनशील बने, तभी मानवता सुरक्षित रहेगी।







