सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री एवं लेखिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख
“जो सबके कल्याण के लिए जीता है, वह सदा जीवित रहता है। स्वार्थ के लिए जीना तो केवल पशु-वृत्ति है”
— सुश्री सरोज कंसारी।
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परोपकारी मनुष्य ही युगों तक याद किया जाता है। प्रयास रहे कि आपके भीतर की विनम्रता और संवेदनशीलता का यह दीप कभी बुझने न पाए। यह जीवन एक अनवरत यात्रा है। इन रास्तों में खुशियाँ हर ओर बिखरी हुई हैं, उन्हें खोजने की आवश्यकता नहीं होती, बस सकारात्मक दृष्टि से उन्हें महसूस करने की आवश्यकता है। जीवन में कुछ पाने और खोने के बीच जिंदगी उलझी ही रहती है। सरलता के अभाव में हम कठिन राह से गुजरने के लिए विवश होते हैं। जिंदगी भर हम जिस बात को सोच-सोचकर परेशान होते हैं, एक दिन मृत्यु के साथ सब अंत हो जाता है। जीते जी हम सुकून-शांति से नहीं रह पाते, कारण अहंकार से भरे मनुष्य मन सादगी, सच्चाई, इंसानियत और अच्छाई को अपने आचरण में उतारने के बजाय इच्छाओं के पीछे भाग रहे हैं। गलती करके उसे स्वीकार करने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। सुधार की बजाय हम दूसरों को गलत मान लेने में आगे होते जा रहे हैं। दिल के रिश्ते कमजोर होते जा रहे हैं, समझना ही नहीं चाहते एक-दूसरे की भावनाओं को। झूठे ख्वाबों, ख्यालों, दिखावे, खोखले रीति-रिवाजों से जकड़े हम इंसानों में मानवीय संवेदनाओं का सर्वत्र अभाव होता जा रहा है। प्रेम की अनुभूति सिर्फ पवित्र भाव से हो सकती है। छल से भरे मन में हमेशा दुख और दरिद्रता का वास होता है। अहंकार को त्याग कर हम जीवन के हर पल का आनंद ले सकते हैं। दुख का मूल कारण जानकर ही आंतरिक सुख की प्राप्ति कर सकते हैं। सांसारिक जीवन में भोग-विलास, लोभ-मोह, काम-क्रोध माया का जाल होता है, जहां से निकल पाना कठिन है। जब तक संयम, शुद्धता, नैतिकता, धर्म और अध्यात्म की राह नहीं चलेंगे, मानसिकता ऐसी ही अशांत रहेगी। इस जीवन की हर छोटी-बड़ी बातें विचलित करती ही रहेंगी। अंदर से मजबूत होकर ही बाहरी समस्याओं का सही ढंग से समाधान संभव है। बाहरी सुख हमें भ्रमित करती हैं, जो बनती-बिगड़ती रहती हैं। बाहर कुछ नहीं, भीतर से हमें स्थिरचित्त रहने के लिए आत्म-संयम से रहना आवश्यक है। यह जीवन क्षण भंगूर है, यह जानते हुए भी इस सांसारिक जीवन में खो जाते हैं। अपने अच्छे कर्म से संसार को प्रकाशित करना हर मनुष्य का धर्म होना चाहिए, लेकिन हम जिम्मेदारियों से विमुख हो दुर्भाव से युक्त जीवन यापन कर रहे हैं। सद विचार से ही सदकार्य आरंभ हो सकता है। जरुरी है कि हम समय के अनुसार जो संकल्प, आत्म कल्याण के साथ मानवता के हित में लेते हैं, उसे पूर्ण करने का प्रयास निरंतर करते रहें। प्रेम का एक दीप हर पल मन में जलता रहे, तभी हम नफरत, घृणा, बैर, दुश्मनी, दुर्व्यवहार, दुराचार जैसे अंधकार को दूर कर पाएंगे। मन में अनंत लालसाओं को लेकर घूमते हैं, लेकिन गंभीरता से चिंतन करें तो जीवन का सार हमें मिलता है। प्रेम एक स्वाभाविक गुण है जो प्रत्येक दिल में होता है। किसी वस्तु का खंडित होना उसके अस्तित्व का अंत नहीं, बल्कि एक नए रूपांतरण का आरंभ है। जिस प्रकार ‘किन्त्सुगी’ कला में पात्र की दरारों को सोने से भरकर उसे पहले से भी अधिक मूल्यवान और सुंदर बना दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार जीवन के आघात और हृदय की चोटें हमें केवल घायल नहीं करतीं, बल्कि अनुभवों की पूंजी से समृद्ध करती हैं। अपनी वेदना से भागें नहीं, बल्कि उसे एक शिक्षक के रूप में स्वीकार करें। स्मरण रहे, जिस कष्ट को आपने धैर्य से सहा है, वही भविष्य में आपकी अटूट शक्ति और संकल्प बनकर उभरेगा। अपने संघर्षों को सहर्ष स्वीकार कर निरंतर आगे बढ़ते रहें। अपने अनुभवों को एक प्रज्वलित मशाल बना लें, ताकि उस प्रकाश से न केवल आपका मार्ग प्रशस्त हो, बल्कि अन्य पथिकों की राह भी सुगम और आलोकित हो सके। आज संपूर्ण विश्व में प्रेम के स्थान पर द्वेष, हिंसा और प्रतिशोध व्याप्त है। जीवन की इस यात्रा में हम जिन मार्गों से होकर गुजरे हैं अथवा भविष्य में जिन पथों पर हमें चलना है, वे सब हमारे भीतर भी निरंतर जीवंत हैं। अपने अंतर्मन की पुकार को सुनो और उसे जानने का प्रयास करो। स्वयं की प्रतिध्वनि को सुनना और अपने स्वरूप को दर्पण के पार देखना, जीवित होने की सबसे सुंदर अनुभूति है। जो परोपकार हेतु अपना जीवन उत्सर्ग करता है, वही कालजयी होकर युगों-युगों तक स्मृति शेष रहता है। इसके विपरीत, केवल स्वयं के लिए जीने वाला मनुष्य पशुवृत्ति के समान है। ये जीवन की सार्थकता इसमें है कि हम अपने संवेगों को दबाएँ नहीं, क्योंकि खुलकर रोना मन की शुद्धि करता है और खुलकर हँसना जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। ये दोनों ही ईश्वरीय उपहार हैं। प्रकृति और पुस्तकें हमें बहुत कुछ सिखाती हैं, इनमें हमारे सभी प्रश्नों के उत्तर निहित हैं। खुशी जीवन की समस्याओं का समाधान कर सकती है। आत्म-ज्ञान खुशी की कुंजी है। अपने स्वभाव, मूल्यों और रुचियों पर ही खुशहाल जीवन जी सकते हैं। हंसी ही आपको खुश करेगी। खुशहाल जीवन के लिए आत्म-ज्ञान, अपने मूल्यों के अनुसार जीना, और हंसी आवश्यक है।







