सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री एवं लेखिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, देहरादून)
“औरों के चेहरे की मुस्कान: स्वयं की समस्याओं का श्रेष्ठ निदान” : सुश्री सरोज कंसारी
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इंसान होना एक अवसर है, लेकिन ‘मानव’ बनना एक साधना है। राक्षसी प्रवृत्ति—क्रोध, लोभ, और ईर्ष्या—बाहर नहीं, हमारे भीतर के अंधकार में होती है। वास्तविक सुख की खोज बाहर के कोलाहल में नहीं, बल्कि अंतर्मन के एकांत में संभव है। प्रतिदिन सूर्यास्त के पश्चात जब हम अपने दिनभर के कर्मों का लेखा-जोखा करते हैं, तब हम केवल अपनी कमियों को नहीं पहचानते, बल्कि अपने चरित्र को तराशते हैं। बुराइयों को रेखांकित करना ‘आत्म-सुधार’ है और अच्छाइयों के लिए ईश्वर का आभार मानना ‘कृतज्ञता’ है। यही कृतज्ञता हमारे कर्मों को ‘श्रेष्ठता’ की ओर ले जाती है। आज का युग कलह और चुनौतियों का सागर है। यहाँ वही व्यक्ति ‘विजेता’ है जिसने अपनी इंद्रियों के घोड़ों को विवेक की लगाम से थाम लिया है। वासना और इच्छाओं का मार्ग उस तप्त रेगिस्तान के समान है, जहाँ मृगतृष्णा तो है पर तृप्ति नहीं। इसके विपरीत, ‘संस्कारों का निर्वहन’ वह शीतल उपवन है जो जीवन जीने के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित करता है। जब मन शांत होता है, तो कर्तव्य (फर्ज) का मार्ग निष्कंटक हो जाता है। गरीबी धन की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि भावों की दरिद्रता है। ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति होने के नाते, हमारे पास ‘साहस, सौम्यता और स्नेह’ का वह अक्षय भंडार है जो बांटने से बढ़ता है। विडंबना देखिए कि मनुष्य अपनी तिजोरी में धूल जमने देता है, पर अपनी चिंताओं और शिकायतों की पोटली हर राहगीर के सामने खोल देता है। कठिन समय में किसी को दिया गया ‘प्रोत्साहन का एक शब्द’ उस बुझते हुए दीपक के लिए घी का काम करता है। यदि हम किसी के आँसू नहीं पोंछ सकते, तो कम से कम अपनी कड़वाहट से उसके जख्मों को कुरेदें भी नहीं। मीठी वाणी केवल संस्कार नहीं, बल्कि समस्या का आधा समाधान है। जीवन का सत्य: द्वंद्व से समाधान तक : अजीब विडंबना है कि हमारे पास पूरी कायनात पर चर्चा करने का वक्त है, पर खुद से गुफ्तगू करने की फुर्सत नहीं। हम समाज और राष्ट्र के हर मुद्दे पर अंतहीन बहस करते हैं, लेकिन अहंकार के वश में होकर न कभी थकते हैं, न झुकना चाहते हैं। जवानी के जोश में अक्सर हम होश खो देते हैं और धीरे-धीरे हमारे मस्तिष्क में बुराइयों का एक ऐसा मकड़जाल बुन जाता है, जिसे सुलझाने में ही जीवन के हसीन पल बीत जाते हैं। हम दूसरों को नीचा दिखाने और उनके जख्मों को कुरेदने में अपनी जीत समझते हैं। ईर्ष्या, छल और क्रोध के जिस विषैले पौधे को हम अपने भीतर पाल रहे हैं, वह हमारे दूषित विचारों से ही पुष्पित हो रहा है। हम यह भूल जाते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है और इच्छाएं अनंत। हम अशांत हैं क्योंकि हमारा मन सहज रहने के बजाय भोग, कठोरता और अव्यावहारिक आदतों के वश में होकर ‘पशुतुल्य’ हो गया है। जीने के कई सुंदर विकल्प मौजूद हैं, पर हमारी दृष्टि उन पर नहीं पड़ती। एक बार इन मानसिक झंझावतों के बीच अपने दिल को ‘विशाल समंदर’ बनाकर तो देखिए! उसकी गहराई से जब सुंदर विचारों के रत्न निकलेंगे, तो नकारात्मकता, शोक और नफरत खुद-ब-खुद विलीन हो जाएंगे। जैसे ही अनावश्यक विचारों की खरपतवार साफ होगी, आपका व्यक्तित्व विशाल हो जाएगा। याद रखें! कुंठित सोच हमें कभी आगे नहीं बढ़ने देती। हर वह कार्य ‘शुभ’ है जिसमें स्वार्थ के साथ परोपकार छुपा हो, और वह ‘अशुभ’ है जिससे किसी की भावना आहत हो। आप स्वयं अपने जीवन के निर्णायक हैं। यहाँ आप ही परीक्षा के प्रश्न हैं और आपको ही सटीक उत्तर लिखकर उत्तीर्ण होना है। इसलिए, चिंतन करें पर चिंता नहीं। अपने कार्यक्षेत्र और मित्रों से निरंतर सीखने का प्रयास करें और केवल श्रेष्ठ को ही आत्मसात कीजिये। हमें किसी की भटकती हुई ‘गुमनाम राह’ नहीं, बल्कि एक प्रकाशमान मंजिल बनना है। जब हम अपने ‘मन, वचन और कर्म’ से सर्वश्रेष्ठ देना शुरू करते हैं, तो हम केवल अपना जीवन नहीं सुधारते, बल्कि पूरी सृष्टि के कल्याण में भागीदार बनते हैं।
एक सूत्र: “जो मेरे पास है, वह ईश्वर की कृपा है; जो मैं दूसरों को देता हूँ, वह मेरी प्रार्थना है।
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