✍🏿 आशीष त्रिवेदी, अधिवक्ता
(सिविल कोर्ट मुजफ्फरपुर)
(नया अध्याय, देहरादून)
UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026: सामाजिक न्याय के नाम पर ‘संवैधानिक संतुलन’ से समझौता?
👉🏿 शिक्षा के मंदिरों को ‘अदालतों’ में बदलने से रोकना होगा, ताकि हर वर्ग का छात्र स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सके।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर देशभर के शैक्षणिक गलियारों में एक वैचारिक युद्ध छिड़ गया है। सबसे पहले यह जानना जरूरी होगा कि ये क्या है? ये ना ही “एक्ट” है ना ही “बिल” ये “रेगुलेशंस” है। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि बिल(विधेयक), एक्ट(कानून) और रेगुलेशन(विनियम) अलग अलग होते है। संक्षेप में कहे तो बिल प्रस्तावना है, एक्ट मुख्य कानून है और विनियम संचालन के नियम है।
यूजीसी एक्ट 1956 मुख्य रूप से कानून (Act) है जिसे संसद में बनाया गया है। यह UGC को शक्ति देता है। यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस 2026, यूजीसी का नियम है जिसे UGC ने अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए बनाया ताकि इन्हें दिया गए शक्ति का उपयोग या दुरुपयोग हो सके।
इस विनियम के बारे में जहाँ एक ओर इसे हाशिए पर खड़े समाज का सुरक्षा कवच बताया जा रहा है, वहीं सामान्य वर्ग इसे अपनी संवैधानिक गरिमा और सुरक्षा के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देख रहा है। इस कानून के कई बिंदु न केवल एकतरफा प्रतीत होते हैं, बल्कि न्याय के वैश्विक सिद्धांतों को भी सीधी चुनौती देते हैं।
इसके मुख्य विवादित पहलुओं का विश्लेषण आवश्यक है:
1. ‘समता समिति’ का एकतरफा स्वरूप:
न्याय का गला घोंटने जैसा है। नए नियमों के अनुसार, संस्थानों में गठित होने वाली ‘समता समिति’ में SC, ST, OBC और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है, लेकिन सामान्य वर्ग (General Category) के लिए एक भी स्थान सुरक्षित नहीं रखा गया है।
• विधिक तर्क: न्याय का प्राथमिक सिद्धांत है ‘Audi
Alteram Partem’ (दूसरे पक्ष को भी सुना जाए)। यदि निर्णय लेने वाली समिति में आरोपी के वर्ग का कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं होगा, तो निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह संरचना एक प्रकार की ‘कंगारू कोर्ट’ (Kangaroo Court) जैसी व्यवस्था को जन्म दे सकती है, जहाँ निर्णय पूर्व-निर्धारित होने की आशंका रहेगी।
2. ‘झूठी शिकायतों’ पर सजा का प्रावधान हटाना: असुरक्षा का मूल कारण है कि वर्ष 2012 के पुराने नियमों में एक सुरक्षा कवच (Check and Balance) मौजूद था। यदि कोई छात्र व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए किसी प्रोफेसर या सहपाठी पर झूठा आरोप लगाता था, तो उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान था। 2026 के नए नियमों में इस सुरक्षात्मक प्रावधान को पूरी तरह हटा दिया गया है।
• सामान्य वर्ग की चिंता: दंड के भय के अभाव में झूठे आरोपों की बाढ़ आने की प्रबल आशंका है। छात्र और शिक्षक डरे हुए हैं कि इस कानून का इस्तेमाल अकादमिक प्रतिशोध (Academic Revenge) या मेरिट को दबाने के लिए एक ‘हथियार’ के रूप में किया जाएगा। बिना जवाबदेही का कोई भी कानून अंततः अराजकता ही फैलाता है।
3. मेरिट पर प्रहार और ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का खतरा:
उच्च शिक्षा मूलतः शोध और योग्यता (Merit) का क्षेत्र है। नए नियमों में ‘भेदभाव’ की परिभाषा इतनी व्यापक और अस्पष्ट है कि किसी भी कड़े शैक्षणिक मूल्यांकन या अनुशासन को ‘उत्पीड़न’ का नाम दिया जा सकता है।
• अकादमिक प्रभाव: इससे कैंपस में भय का ऐसा माहौल बनेगा जहाँ शिक्षक आरक्षित वर्ग के छात्रों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने से कतराएंगे, जिसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा। यह स्पष्ट रूप से ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (उल्टा भेदभाव) की स्थिति है।
4. संवैधानिक समानता (अनुच्छेद 14) का खुला उल्लंघन:
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। सामान्य वर्ग के बुद्धिजीवियों और विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि:
• किसी भी छात्र या कर्मचारी को केवल उसके वर्ग के आधार पर पहले से ही ‘दोषी’ मान लेना या उसे सुरक्षा तंत्र से बाहर रखना असंवैधानिक है।
• एक ही संस्थान के भीतर दो अलग-अलग वर्गों के लिए न्याय के अलग-अलग मापदंड नहीं हो सकते। यह संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
न्याय सबके लिए हो:
UGC इक्विटी एक्ट 2026 की वर्तमान रूपरेखा सामाजिक न्याय के नाम पर सामाजिक विद्वेष बोने का कार्य कर रही है। न्याय की अवधारणा वही है जहाँ ‘एक के साथ न्याय’ करते समय ‘दूसरे के साथ अन्याय’ न हो। सामान्य वर्ग की यह मांग पूर्णतः तर्कसंगत और न्यायोचित है।
यूजीसी को इस एक्ट की सफलता के लिए तीन मूलभूत सुधारों पर विचार करना ही चाहिए:-
• समता समिति का संतुलन: इसमें सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।
• जवाबदेही की बहाली: झूठी और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के विरुद्ध सख्त प्रावधान वापस लाए जाएं।
• परिभाषा की स्पष्टता: भेदभाव और शैक्षणिक अनुशासन के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींची जाए। भेदभाव की परिभाषा को स्पष्ट, पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ (Objective) बनाया जाए।
समाधान की राह:
यदि इस कानून को संतुलित नहीं किया गया, तो यह कैंपस में सौहार्द लाने के बजाय संघर्ष को जन्म देगा। शिक्षा के केंद्रों की गरिमा तभी सुरक्षित रहेगी जब न्याय सबके लिए समान और निष्पक्ष होगा। न्याय वही है जो सबको न्यायोचित लगे। सामाजिक न्याय का अर्थ ‘वर्ग विशेष का तुष्टिकरण’ नहीं, बल्कि ‘सर्वजन हिताय’ होना चाहिए।
शिक्षा के मंदिरों को ‘अदालतों’ में बदलने से रोकना होगा ताकि हर वर्ग का छात्र खुद को सुरक्षित महसूस कर सके।
अंततः शिक्षा के मंदिरों को अदालतों में तब्दील होने से बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।







