भारत में कार्यस्थल सुरक्षा कानून : एक विधिक विश्लेषण

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एडवोकेट अनुराधा शर्मा

कक्ष संख्या–214

जिला एवं सत्र न्यायालय, 

जवाहर नगर, हिसार (हरियाणा)

 

 

                   (नया अध्याय, देहरादून)

 

भारत में कार्यस्थल सुरक्षा कानून : एक विधिक विश्लेषण

 

कार्यस्थल किसी भी व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, जहाँ वह न केवल अपनी आजीविका अर्जित करता है, बल्कि अपनी गरिमा, स्वास्थ्य और सुरक्षा भी दांव पर लगाता है। भारत जैसे विकासशील देश में औद्योगीकरण, निजीकरण और सेवा क्षेत्र के विस्तार के साथ कार्यस्थलों की संख्या बढ़ी है, किंतु इसके साथ ही कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं, शोषण और असुरक्षित परिस्थितियों की चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। ऐसे में कार्यस्थल सुरक्षा कानूनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

 

कार्यस्थल सुरक्षा का आशय केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक सुरक्षा, लैंगिक गरिमा, स्वास्थ्य, स्वच्छ वातावरण और सम्मानजनक व्यवहार भी सम्मिलित है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद इक्कीस प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें सुरक्षित और गरिमापूर्ण कार्य स्थितियाँ भी निहित हैं। इसके अतिरिक्त नीति-निर्देशक तत्व राज्य को यह निर्देश देते हैं कि वह श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति की रक्षा करे।

 

भारत में कार्यस्थल सुरक्षा से संबंधित अनेक विधिक प्रावधान अस्तित्व में हैं। औद्योगिक प्रतिष्ठानों के संदर्भ में कारखाना अधिनियम लंबे समय तक एक प्रमुख कानून रहा, जिसका उद्देश्य श्रमिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण को सुनिश्चित करना था। इस अधिनियम के अंतर्गत कार्य के घंटे, स्वच्छता, प्रकाश, वायु संचार, मशीनों की सुरक्षा और दुर्घटनाओं की रोकथाम जैसे विषयों को विनियमित किया गया।

 

हाल के वर्षों में श्रम कानूनों के संहिताकरण के अंतर्गत व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएँ संहिता को लागू किया गया है, जिसने अनेक पुराने कानूनों को समाहित कर एक समग्र ढांचा प्रस्तुत किया है। इस संहिता का उद्देश्य संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों को सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करना है। इसमें जोखिमपूर्ण कार्यों, रासायनिक पदार्थों, निर्माण कार्य और खनन जैसे क्षेत्रों में विशेष सुरक्षा प्रावधान किए गए हैं।

 

कार्यस्थल सुरक्षा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा है। कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न महिलाओं की गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर आघात करता है। इस संदर्भ में कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न निवारण अधिनियम एक मील का पत्थर है। इस कानून के अंतर्गत प्रत्येक कार्यस्थल पर आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य किया गया है, ताकि पीड़ित महिलाओं को त्वरित और गोपनीय न्याय मिल सके। यह कानून यह स्पष्ट करता है कि सुरक्षित कार्यस्थल महिलाओं का मौलिक अधिकार है।

 

इसके अतिरिक्त, मानसिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल तनाव भी आज के समय में गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। अत्यधिक कार्य दबाव, असमान व्यवहार और नौकरी की असुरक्षा कर्मचारियों के मानसिक संतुलन को प्रभावित करती है। यद्यपि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अभी भी व्यापक और विशिष्ट कार्यस्थल कानूनों का अभाव है, फिर भी न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्वीकार किया है कि मानसिक उत्पीड़न भी कार्यस्थल सुरक्षा के दायरे में आता है।

 

असंगठित क्षेत्र में कार्यस्थल सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार, कृषि मजदूर और ठेका श्रमिक अक्सर विधिक सुरक्षा से वंचित रह जाते हैं। कानूनों के होते हुए भी इनके प्रभावी क्रियान्वयन का अभाव देखने को मिलता है। कार्यस्थल सुरक्षा कानूनों की वास्तविक सफलता तभी संभव है, जब उनका लाभ समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक पहुँचे।

 

न्यायपालिका ने कार्यस्थल सुरक्षा के संदर्भ में सक्रिय भूमिका निभाई है। न्यायालयों ने यह माना है कि नियोक्ता का कर्तव्य है कि वह कर्मचारियों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करे। लापरवाही के कारण हुई दुर्घटनाओं में नियोक्ताओं की जिम्मेदारी तय की गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कार्यस्थल सुरक्षा केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि विधिक दायित्व भी है।

 

हालाँकि, विधिक ढांचे के बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। निरीक्षण तंत्र की कमजोरी, जागरूकता की कमी, और श्रमिकों का अपने अधिकारों से अनभिज्ञ होना कानूनों की प्रभावशीलता को कम करता है। कार्यस्थल सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन, प्रशिक्षण और सामाजिक जागरूकता की भी आवश्यकता है।

निष्कर्षतः, भारत में कार्यस्थल सुरक्षा कानून श्रमिकों के जीवन और गरिमा की रक्षा के लिए एक आवश्यक आधार प्रदान करते हैं। बदलते सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में इन कानूनों को और अधिक संवेदनशील, समावेशी और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। सुरक्षित कार्यस्थल केवल श्रमिकों का अधिकार नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज की अनिवार्य शर्त है।

 

लेखिका परिचय

             एडवोकेट अनुराधा शर्मा जिला एवं सत्र न्यायालय, हिसार में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत हैं। वे श्रम कानून, महिला अधिकार एवं संवैधानिक विधि से जुड़े समकालीन विषयों पर नियमित लेखन करती हैं।

 

 

 

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