डॉ.यल.कोमुरा रेड्डी
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष
हिन्दी विभाग
एस.आर.आर.कला एवं विज्ञान महाविद्यालय
करीम नगर, तेलंगाना।
(नया अध्याय, देहरादून)
मेडारम जातरा:कोया अस्मिता का लोक-पर्व और सांस्कृतिक संप्रभुता का शंखनाद।
तेलंगाना के मुलुगु जिले के घने जंगलों के बीच आयोजित होने वाला सम्मक्का-सारलम्मा जातरा, जिसे मेडारम जातरा के नाम से जाना जाता है, केवल एक धार्मिक मेला नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया के स्वदेशी समुदायों की सांस्कृतिक स्वायत्तता, ऐतिहासिक वीरता और अन्याय के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध का एक असाधारण प्रतीक है । दंडकारण्य वन क्षेत्र के हृदय स्थल, एतुरुनगरम वन्यजीव अभयारण्य में प्रत्येक दो वर्ष में आयोजित होने वाला यह महोत्सव अपनी विशाल जनभागीदारी के कारण ‘दक्षिण का कुंभ’ कहा जाता है, जहाँ श्रद्धालुओं की संख्या करोड़ों में पहुँच जाती है । इस जातरा का विश्लेषण करते समय यह स्पष्ट होता है कि यह केवल परंपराओं का निर्वहन नहीं है, बल्कि यह आदिवासी पहचान को मुख्यधारा की धार्मिक संरचनाओं के भीतर और उनके समांतर पुनर्गठित करने की एक जटिल प्रक्रिया है। 13वीं शताब्दी के काकतीय शासन के विरुद्ध कोया आदिवासियों के विद्रोह से उपजी यह गाथा आज आधुनिक भारत के सबसे बड़े आदिवासी समागम के रूप में विकसित हो चुकी है, जो न केवल धार्मिक श्रद्धा बल्कि सामाजिक न्याय, लिंग समानता और पर्यावरणीय चेतना के गहरे संदेशों को अपने भीतर समेटे हुए है ।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और वीरता का आख्यान
मेडारम जातरा का ऐतिहासिक आधार 13वीं शताब्दी (लगभग 1000 ईस्वी से 1323 ईस्वी के बीच) की घटनाओं में निहित है, जब वारंगल के काकतीय शासकों का दक्षिण भारत के बड़े हिस्से पर प्रभुत्व था । लोक कथाओं के अनुसार, कोया जनजाति के एक समूह ने शिकार के दौरान दंडकारण्य के जंगलों में बाघों के बीच खेलती हुई एक अलौकिक नवजात कन्या को पाया था, जिसके शरीर से दिव्य प्रकाश पुंज उत्सर्जित हो रहा था। आदिवासी प्रमुख ने उसे गोद लिया और उसका नाम सम्माक्का रखा। वह न केवल एक साहसी योद्धा के रूप में बड़ी हुई, बल्कि उसके पास औषधीय पौधों और उपचार की चमत्कारिक शक्तियाँ भी थीं, जिसके कारण पूरे क्षेत्र के आदिवासी उसे अपनी रक्षक और मार्गदर्शक मानने लगे। सम्माक्का का विवाह पगीदिद्दा राजू से हुआ, जो काकतीय साम्राज्य के अधीन मेडारम क्षेत्र के एक आदिवासी जागीरदार थे ।
इस ऐतिहासिक संघर्ष का मुख्य कारण ‘कर’ और ‘अन्यायपूर्ण कानून’ था। एक भीषण सूखे के दौरान जब कोया आदिवासी काकतीय सम्राट प्रतापरुद्र देव को कर (कोपम) चुकाने में असमर्थ थे, तो सम्राट ने इसे विद्रोह मानकर अपनी सेना मेडारम की ओर भेज दी । यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि यह जंगल की संप्रभुता और बाहरी सत्ता के हस्तक्षेप के विरुद्ध आदिवासियों की पहली बड़ी लड़ाई थी। इस युद्ध में पगीदिद्दा राजू, उनकी पुत्रियाँ सरलम्मा और नागुलम्मा, और उनके दामाद गोविंदा राजू वीरगति को प्राप्त हुए । सम्माक्का का पुत्र जम्पन्ना भी इस युद्ध में गंभीर रूप से घायल हो गया और पास की एक जलधारा ‘संपंगी वागु’ में गिर गया, जिससे उस धारा का रंग उसके रक्त से लाल हो गया, और तब से इसे ‘जम्पन्ना वागु’ के नाम से पूजा जाने लगा। अपने परिवार के बलिदान के बावजूद सम्माक्का ने युद्ध जारी रखा, लेकिन अंततः वह भी घायल होकर चिलकला गुट्टा पहाड़ी की ओर चली गईं, जहाँ वे एक ‘कुंकुम भरणी’ (सिंदूर की डिबिया) के रूप में विलीन हो गईं ।
ऐतिहासिक पात्र संबंध और भूमिका अंतिम परिणति
सम्माक्का कोया योद्धा और आध्यात्मिक नेता चिलकला गुट्टा पर सिंदूर की डिबिया में रूपांतरण
सरलम्मा सम्माक्का की ज्येष्ठ पुत्री युद्ध के मैदान में वीरगति
पगीदिद्दा राजू सम्माक्का के पति और कोया प्रमुख काकतीय सेना के विरुद्ध लड़ते हुए बलिदान
जम्पन्ना सम्माक्का का पुत्र जम्पन्ना वागु में जल समाधि (बलिदान)
प्रतापरुद्र देव काकतीय सम्राट आक्रमणकारी और कर अधिरोपित करने वाला शासक
कोया जनजाति और जातरा का मानवशास्त्रीय महत्व
मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण से, मेडारम जातरा कोया जनजाति के सामाजिक ढांचे और उनकी धार्मिक मान्यताओं का प्रतिबिंब है। कोया तेलंगाना की सबसे बड़ी आदिवासी जमात है, जो स्वयं को ‘दोरला सट्टम’ (स्वामियों का समूह) या ‘पुट्टा दोरा’ (मूल निवासी) कहती है । शोधकर्ताओं के अनुसार, यह जातरा मूलतः एक ‘प्रजनन पंथ’ के रूप में विकसित हुआ है । आदिवासी आख्यानों में यह उल्लेख मिलता है कि कोया बुजुर्ग चंदम बोइरा के निःसंतान होने के दुःख को सम्माक्का के आगमन ने दूर किया था, जिसके कारण उन्हें संतान प्राप्ति हुई। यही कारण है कि आज भी लाखों माताएँ अपनी संतानों के कल्याण के लिए यहाँ मन्नत माँगने आती हैं ।
यह महोत्सव रॉबर्ट रेडफील्ड के ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ और ‘लिटिल ट्रेडिशन’ के सिद्धांतों को चुनौती देता है। जहाँ मुख्यधारा के हिंदू त्योहारों में अक्सर ब्राह्मणवादी अनुष्ठानों का वर्चस्व होता है, मेडारम जातरा पूरी तरह से गैर-वैदिक और गैर-ब्राह्मणवादी परंपराओं पर आधारित है । यहाँ कोई स्थायी मंदिर संरचना नहीं थी और पूजा खुले आकाश के नीचे की जाती है, जो प्रकृति और मनुष्य के सीधे संबंध को दर्शाती है । अनुष्ठान कोया पुजारियों (पुजारुलु) द्वारा गोंडी भाषा में संपन्न किए जाते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि आदिवासियों ने अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को बाहरी प्रभावों से बचाकर रखा है ।
अनुष्ठानिक प्रक्रिया और प्रतीकात्मकता
चार दिनों तक चलने वाला यह महोत्सव हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार माघ महीने(जनवरी व फरवरी)की पूर्णिमा के दौरान मनाया जाता है । इसके अनुष्ठान केवल धार्मिक कृत्य नहीं हैं, बल्कि वे वीरता और दुःख की उस ऐतिहासिक स्मृति को पुनर्जीवित करने का माध्यम हैं ।
चार दिवसीय महोत्सव का अनुष्ठानिक क्रम
1. प्रथम दिवस (बुधवार): यह दिन सारलम्मा के आगमन का प्रतीक है। उनके प्रतीक स्वरूप कुंकुम भरणी को कन्नेपल्ली गाँव से एक गुप्त अनुष्ठान के बाद मेडारम के मुख्य मंच (गद्दे) पर लाया जाता है ।
2. द्वितीय दिवस (गुरुवार): मुख्य अधिष्ठात्री देवी सम्माक्का का चिलकला गुट्टा पहाड़ी से आगमन होता है। जब देवी का प्रतीक मंच पर लाया जाता है, तो परंपरा के अनुसार जिले के पुलिस अधीक्षक हवा में तीन गोलियाँ चलाकर सम्मान प्रकट करते हैं ।यह राजकीय सम्मान और आदिवासी श्रद्धा का एक अनूठा संगम है।
3. तृतीय दिवस (शुक्रवार): यह दर्शन और बलि अर्पण का मुख्य दिन है। करोड़ों श्रद्धालु ‘जम्पन्ना वागु’ के लाल जल में स्नान करते हैं और देवियों को ‘बंगाराम’ अर्पित करते हैं ।
4. चतुर्थ दिवस (शनिवार): देवियों का ‘वन प्रवेशम’ (जंगल में वापसी) होता है, जो वन और आदिवासी जीवन के अटूट बंधन को दर्शाता है ।
बंगाराम और जम्पन्ना वागु की महत्ता
जातरा की सबसे अनूठी रस्म ‘बंगाराम’ का अर्पण है। स्थानीय भाषा में गुड़ को ‘बंगाराम’ (सोना) कहा जाता है ।श्रद्धालु अपने वजन के बराबर गुड़ देवियों को अर्पित करते हैं, जो इस विश्वास को दर्शाता है कि गुड़ की मिठास और उसकी ऊर्जा जीवन के संघर्षों को कम करेगी। वहीं, जम्पन्ना वागु में स्नान को वैज्ञानिक रूप से मिट्टी की संरचना के कारण लाल माना जाता है, लेकिन आदिवासियों के लिए यह जम्पन्ना के बलिदान का साक्षात् प्रमाण है, जो उन्हें संकटों से लड़ने का साहस प्रदान करता है ।
अनुष्ठान/प्रतीक धार्मिक अर्थ सामाजिक निहितार्थ
बंगाराम (गुड़) स्वर्ण के समान मूल्यवान अर्पण सादगी और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान
जम्पन्ना वागु स्नान पापों की शुद्धि और साहस का संचार ऐतिहासिक पूर्वजों के बलिदान के प्रति कृतज्ञता
कुंकुम भरणी देवी की भौतिक उपस्थिति नारी शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक
गद्दे (मंच) पवित्र अधिष्ठान बिना मूर्ति के निराकार सत्ता की पूजा
प्रशासनिक ढांचा और आर्थिक प्रभाव
तेलंगाना सरकार ने 1996 में इस जातरा को ‘राज्य उत्सव’ घोषित किया था । तब से लेकर आज तक, इसके प्रबंधन में व्यापक बदलाव आए हैं। विशेष रूप से 2026 के आगामी जतरा के लिए मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के नेतृत्व में ₹251 करोड़ का रिकॉर्ड बजट आवंटित किया गया है । यह राशि न केवल अस्थायी व्यवस्थाओं के लिए है, बल्कि मेडारम के दीर्घकालिक और स्थायी बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भी है ।
बजट और बुनियादी ढांचे का विवरण (2026 की योजना)
राज्य सरकार ने इस आयोजन को कुंभ मेले के स्तर पर ले जाने का लक्ष्य रखा है। बजट का विभाजन मुख्य रूप से दो श्रेणियों में किया गया है:
• सामान्य व्यवस्थाएं (₹150 करोड़): इसमें जलापूर्ति, स्वच्छता, परिवहन और सुरक्षा शामिल है ।
• मंचों का जीर्णोद्धार (₹101 करोड़): पवित्र ‘गद्दे’ परिसर को स्थायी ग्रेनाइट संरचना में बदला जा रहा है, जिसमें 46 नक्काशीदार स्तंभ और विशाल प्रवेश द्वार शामिल हैं ।
सुरक्षा और परिवहन के मोर्चे पर, तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम लगभग 4,000 बसें चलाने की योजना बना रहा है, जिससे 21 लाख से अधिक लोगों का परिवहन संभव हो सके । सुरक्षा के लिए 9,000 से अधिक पुलिस अधिकारियों की तैनाती और ड्रोन कैमरों के माध्यम से भीड़ नियंत्रण का प्रबंध किया गया है । आर्थिक रूप से, यह जातरा स्थानीय स्तर पर ₹500 से ₹1,000 करोड़ का व्यापार उत्पन्न करती है, जिससे कोया समुदाय के छोटे व्यापारियों, हस्तशिल्पकारों और अस्थायी सेवा प्रदाताओं को आजीविका मिलती है ।
सांस्कृतिक संघर्ष और पहचान की राजनीति: स्वास्तिक विवाद
मेडारम जातरा वर्तमान में ‘संस्कृतिकरण’ और आदिवासी पहचान के संरक्षण के बीच एक वैचारिक युद्धभूमि बन गया है। हाल ही में, मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान ‘बाएं मुख वाले स्वास्तिक’ के उपयोग ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है आदिवासी शोधकर्ता डॉ. एम. अरुण कुमार और कोया समुदाय के शिक्षित युवाओं के अनुसार, यह स्वास्तिक कोया आदिवासी परंपरा का एक अभिन्न हिस्सा है और इसका हिंदू धर्म के ‘दाएं मुख वाले स्वास्तिक’ से कोई संबंध नहीं है ।
इस शोध दल ने 15 वर्षों तक कोया ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों का अध्ययन किया और 7,000 से अधिक प्राचीन आदिवासी चित्रों की पहचान की, जिन्हें अब मंदिर के ग्रेनाइट स्तंभों पर उकेरा जा रहा है । यह आंदोलन इस बात का प्रतीक है कि आदिवासी समुदाय अब अपनी धार्मिक कथाओं का स्वयं लेखन कर रहा है और मुख्यधारा के प्रतीकों के ‘थोपने’ का विरोध कर रहा है। शोधकर्ताओं का तर्क है कि ‘शिव’ की पूजा भी मूल रूप से आदिवासी प्रकृति की है और वे अपनी परंपराओं को किसी भी दबाव में बदलने को तैयार नहीं हैं 。
पर्यावरणीय चुनौतियां और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव
एतुरुनगरम वन्यजीव अभयारण्य, जो मेडारम का घर है, एक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है। करोड़ों लोगों के आगमन से इस क्षेत्र में वनों की कटाई, मृदा अपरदन और कचरे के प्रबंधन की विकराल समस्याएँ पैदा होती हैं । शोध पत्र बताते हैं कि जातरा के दौरान खुले में शौच और पशु बलि के कारण जलजनित और वायुजनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है ।
31 अगस्त 2024 की एक अभूतपूर्व प्राकृतिक घटना ने इस खतरे को और भी स्पष्ट कर दिया। एक अत्यधिक स्थानीयकृत मौसमी घटना) के कारण अभयारण्य के 300 हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 1 लाख पेड़ जड़ से उखड़ गए 。 वन विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षति की भरपाई करने में दशकों का समय लगेगा। जतरा के दौरान बढ़ती मानव गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन का संगम इस क्षेत्र के भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है । सरकार अब प्लास्टिक मुक्त जातरा के लिए 20 माइक्रोन से कम के प्लास्टिक पर प्रतिबंध और जूट/कागज के थैलों के उपयोग को बढ़ावा देने जैसे उपाय कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है ।
वैश्विक पटल पर मेडारम: यूनेस्को की दावेदारी
भारत सरकार मेडारम जातरा को यूनेस्को की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ के रूप में मान्यता दिलाने के लिए प्रयासरत है। यूनेस्को की अंतर-सरकारी समिति का 20वां सत्र दिसंबर 2025 में नई दिल्ली में आयोजित होना तय है, जहाँ इस तरह के सांस्कृतिक तत्वों पर विचार किया जाएगा । जातरा की विशालता, इसकी लोकतांत्रिक संरचना (जहाँ किसी जाति या धर्म का भेदभाव नहीं है), और महिलाओं की वीरता का उत्सव इसे एक वैश्विक विरासत बनाने के लिए पर्याप्त मानदंड प्रदान करता है ।
जातरा की विशेषताएं (UNESCO हेतु) महत्व और प्रभाव
गैर-पदानुक्रमित पूजा सामाजिक समानता और समावेशिता का प्रमाण
महिला योद्धा केंद्रित पितृसत्तात्मक समाज में नारी शक्ति का उत्सव
कोया मौखिक परंपरा प्राचीन भाषाई और सांस्कृतिक ज्ञान का संरक्षण
प्रकृति पूजा आधुनिक युग में पारिस्थितिक संधारणीयता का संदेश
भविष्य की राह और निष्कर्ष
मेडारम जातरा आदिवासी समाज की वह धड़कन है जो सदियों के उत्पीड़न और आधुनिकता के दबावों के बावजूद आज भी उतनी ही तीव्रता के साथ धड़क रही है। यह महोत्सव हमें सिखाता है कि इतिहास केवल राजाओं और उनके महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन जंगलों और जलधाराओं में भी जीवित है जहाँ साधारण लोगों ने असाधारण साहस दिखाया था । 2026 का आगामी जतरा, अपने विशाल बजट और तकनीकी उन्नयन के साथ, इस परंपरा को एक नया स्वरूप प्रदान करेगा, लेकिन इसकी असली परीक्षा इस बात में होगी कि क्या यह अपनी मूल आदिवासी आत्मा को बचा पाएगा ।
निष्कर्षतः, मेडारम जातरा को केवल एक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे स्वदेशी अधिकारों, सांस्कृतिक प्रतिरोध और पर्यावरणीय संरेखण के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में समझा जाना चाहिए। सरकार, शोधकर्ताओं और स्थानीय समुदायों के बीच का समन्वय ही इस बात को सुनिश्चित करेगा कि चिलकला गुट्टा की पहाड़ियों से निकलने वाली सम्माक्का की वह गूंज आने वाली पीढ़ियों के लिए भी साहस और न्याय का मार्ग प्रशस्त करती रहे ।







