‘जब हम अनुपलब्ध की अंधी दौड़ छोड़ देते हैं, तो हमें वह संगीत सुनाई देने लगता है जो हमारी अपनी सांसों व अपनों की हंसी में मौजूद है’

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका

नवापारा-राजिम

रायपुर, (छत्तीसगढ़)

 

                     (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

                                   आलेख

            ‘जब हम अनुपलब्ध की अंधी दौड़ छोड़ देते हैं, तो हमें वह संगीत सुनाई देने लगता है जो हमारी अपनी सांसों व अपनों की हंसी में मौजूद है’ सुश्री सरोज कंसारी

          *—————————————

 

अनुपलब्ध की तृष्णा में हम उस संगीत को अनसुना कर देते हैं, जो आज की साँसों में बज रहा है। यह ज़िन्दगी है, सब कुछ अचानक से होता है और देखते ही देखते बहुत कुछ बदल जाता है। कभी-कभी हम बेवजह इस दिल और दिमाग में भय भर लेते हैं और उस बात को सोचकर परेशान होते हैं जो हुआ नहीं। बस, हो सकता है ऐसा हो गया तो क्या होगा, कैसे होगा? इस प्रश्न में उलझे रहते हैं और किसी से कह भी नहीं पाते। उस वक्त मन-मस्तिष्क अशांत होता है तो हम असमर्थ होते हैं कुछ भी व्यक्त करने के लिए। हम शारीरिक और मानसिक रूप से पीड़ित हो जाते हैं और उस पल, लोगों और स्थान का आनंद नहीं ले पाते और जो हमारे पास है उसे भी धीरे-धीरे खो देते हैं। वास्तविकता है, जो कमजोर और संकोची होते हैं, जिनमें आत्मविश्वास और साहस नहीं होता, वे जल्द ही घबरा जाते हैं। जरा सी बात को लेकर बेचैन हो जाते हैं। जिंदगी है तो कहीं गम की आंधी और खुशियों की बरसात होती ही रहती है। पर हम सदैव जब सुख-सुविधा की कल्पना करते हैं तब मानसिकता विचलित हो जाती है। ये जीवन, एक सफर ही तो है, जहाँ हर पग पर कई मोड़ आते हैं, लोग मिलते हैं और बिछड़ते हैं। कुछ बातों को उपेक्षा करना जरूरी होता है। लेकिन जब हम हर बात में गंभीर होते हैं, अक्सर भीड़ से घबराते हैं और एकांत को ही चुनते हैं, तब जल्द ही बिखर जाते हैं। क्योंकि हम संसार की भीड़ में रहते हैं और वहीं हमारे जीवन का निर्वहन होता है। कुछ खट्टी-मीठी यादें, बातें और लोगों के साथ कभी मुस्कुराते हैं, तो कभी दर्द से भर जाते हैं। सब कुछ अचानक से होता है, हम जब तक समझते हैं, बहुत कुछ बदल जाता है। हमारे वश में कुछ नहीं होता, जीवन चक्र चलता रहता है। कब प्रलय और सृजन होना है, ये विधाता का ही लेख है? पर, जब हम हर छोटी सी बात में खुद तनाव लेते हैं, तब अपने इस पल को भी बर्बाद कर देते हैं। हमारे आसपास परिवार, समाज और इस संसार में बहुत सी विचित्र घटनाएँ और बातें होती ही रहती हैं। भूलना, कुछ सुनना और सहज होना जरूरी है। अपनी क्षमता अनुसार काम, व्यवहार करना ज़्यादा ज़रूरी है, जब हम जरूरत से ज्यादा कुछ करने की सोच लेते हैं, तो वह हानिकारक ही होती है। जितना हम संभाल पाएं, उतने ही रखें। चाहें लोग, दौलत, रिश्ते-नाते, मित्र या कोई भी चीज जो खुद के नियंत्रण से बाहर हो, उससे जबरदस्ती उचित नहीं। देखभाल के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं। जो हैं, उन्हें उनके अनुकूल वातावरण देना जरूरी है। कोई भी चीज़ हो, एक जगह पड़े रहे और उसका कोई उपयोग बहुत दिन तक न हो, तो जंग लग जाते हैं। पर, हम यही बात नहीं समझ पाते, बस जो है, उसको अनदेखा कर बहुत कुछ बटोर लेना और पाना चाहते हैं, ये जाने बिना कि क्या हम उसे ध्यान दे पाएंगे? उतना ही रखें, सोचें! चले और व्यवहार दें, जिसे हम जतन सके, निभा सकें। क्योंकि हम इंसान हैं, भावनाओं से भरें होते हैं। इस नाजुक मन में हर एक स्थिति का असर होना स्वाभाविक है। बस कमजोर होकर इस संसार का सामना नहीं कर सकते, कभी कठोर होना पड़ता है। कुछ प्रिय को खोना और कुछ पाना होता है। जैसे हैं, वैसे ही नहीं रह सकते, पल-पल में हमारी जरूरत बदलती है। जैसी परिस्थिति निर्मित होती है, वैसे ही हमें ढलना होता है। जब हम किसी हालात को अपना नहीं पाते, तभी व्याकुल होते हैं। ज़िन्दगी प्रत्येक समय हमारी पसंद से हमें मिला देती, तो क्या बात है? जीवन की राह में कठिनाई भी आती है। कई अपने होते हैं, वहीं अजनबी चेहरे भी हमें मिलते हैं। जिन्हें न जानते हैं, न ही उनकी मानसिकता को समझ पाते हैं। जीवन में विपरित स्थिति होना जरूरी है, क्योंकि उस वक्त हम सही मायने में समझते हैं, कैसे-कैसे लोग रहते हैं? किसी की नियत, कौन मित्र है और कौन शत्रु? जीवन के विभिन्न रूप होते हैं, जहाँ रहकर हर पग पर हमें मानसिक संतुलन बनाए रखना पड़ता है। कभी कहीं शांत होना पड़ता है, कहीं अपनी बात को कहना भी जरूरी होता है। जब तक जीवित हैं, कोई न कोई कहानी बनते और बिगड़ते ही रहेंगे, पूर्ण नहीं होते। हम बस अधूरे ही रहते हैं, जीवन के अंतिम अवस्था तक, कुछ ख्वाहिश बाकी ही रह जाती है…। क्योंकि हम मोह-माया में जन्म लेते हैं और उसी के लिए भागते-दौड़ते जिंदगी निकल जाती है। कभी ईश्वर के लिए उतने समर्पित नहीं होते, सच्ची श्रद्धा-भक्ति और आस्था नहीं रख पाते। मांगते तो बहुत कुछ हैं भगवान से, लेकिन जीवन में श्रेष्ठता, सरलता और सादगी को नहीं अपना पाते। बस, भोग-विलास, मौज-मस्ती में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। संयम-मर्यादा और संस्कार का पालन भूल जाते हैं। बहुत जल्द क्रोधित होते हैं, धैर्य खो देते हैं। मन में ईर्ष्या-द्वेष, बैर-झूठ, छल-कपट लेकर हम चलते हैं और औरों में सुधार करना चाहते हैं, उनमें कमी निकालते हैं। दूसरों के जीवन में बाधा पहुँचाकर उनके सुख-चैन छीनकर खुद के लिए शांति की तलाश करते हैं। सुकून के लिए भटकते हैं, यह भूल जाते हैं कि जो पास है, पारिवारिक रिश्ते-नाते, माता-पिता, बुजुर्ग, भाई-बहन, उनका आदर-सम्मान, सेवा और जिम्मेदारी, प्रेम और सहयोग दिए बिना आशीर्वाद लिए बिना कहीं भी तरक्की नहीं पा सकते। अगर हम चलेंगे नहीं, सक्रिय नहीं रहेंगे, किसी काम में लगन, मेहनत, रुचि नहीं रहेगी, तो अकर्मण्य हो जाएंगे। संघर्ष नहीं करेंगे, तो ठोकर खाकर संभलेंगे कैसे? जीवित होकर बस एक जगह स्थिर हो जाना, चुप बैठ जाना संभव नहीं। जब मुसीबत का सामना करते हैं, उपेक्षित, अपमानित, असफल होते हैं, भटकते हैं, दर्द सहते हैं, तब हम होश में आते हैं। जीवन का सही अर्थ समझ पाते हैं। एक नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत कर पाते हैं। जब तक नादान, मासूम, भोले, सीधे-सच्चे और व्यवहारिक होते हैं, तब तक हम षडयंत्र को नहीं जान पाते और धोखा ही खाते हैं। जब तक अपनों का साया मिलता है, हम जीना नहीं सीख सकते। दूसरों पर निर्भर होकर हम खुद कोशिश नहीं करते, बस उनके पीछे चलते हैं। बस सुख में जीने की आदत होती है। जैसे ही हम अकेले होते हैं, अपनों का साथ नहीं मिलता, वे बिछड़ जाते हैं, हमेशा के लिए। जब दूर हो जाते हैं, तब पता चलता है, दुख क्या है, जिम्मेदारी क्या होती है, इस अजनबी दुनिया में कितनी ठोकर मिलती हैं? हकीकत का सामना किए बिना हम भ्रमित ही रहते हैं। इसलिए जो हैं, उन्हें समझिए, दुत्कारिए मत। कभी दूर की मत सोचिए, कि आगे क्या होगा, कैसे ये ज़िन्दगी जिएंगे, सुख में रहेंगे कि नहीं? जो वर्तमान की दहलीज पर खड़ा है, वही जीवन के सच्चे माधुर्य का अधिकारी है। अतीत की स्मृतियों और भविष्य की चिंताओं के भंवर से निकलकर, उन चेहरों में अपनी खुशियाँ तलाशें जो आज आपके संग हैं। इस क्षण की सघनता में ही अनंत सुख छिपा है; इसलिए जो प्राप्त है, उसे ही पर्याप्त मानकर इस ‘अभी’ के उत्सव में पूरी तरह डूब जाना ही वास्तविक जीवन है। अनुपलब्ध’ की चाहत एक अंतहीन रेगिस्तान की तरह है। जब मन इस दौड़ को विराम देता है, तभी वह ‘ठहराव’ आता है जहाँ सत्य का अनुभव संभव है।

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