कभी न हो मंदा चंदा उगाही का धंधा     

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डा. सुधाकर आशावादी

 

 

                  (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

व्यंग्य:

कभी न हो मंदा चंदा उगाही का धंधा

    

समाज में अच्छे काम करने वालों की कमी नहीं है। देश का बुद्धिजीवी भले ही घर खर्च की चिंता न करे, मगर समाज की चिंता उसे लगी रहती है। काम न होने पर भी अपने लिए काम का जुगाड़ कर लेता है। सदियों से यही होता आ रहा है। कुछ लोग अपने घर के प्रति नहीं बल्कि समाज के लिए समर्पित रहते हैं। सच्चा समर्पण चैरिटी बिगिंस एट होम को अपनाने वाला होता है। व्यक्ति जब जेब से पैसा खर्च करके समाज सेवा करता है, तब लगता है, कि वह मानवता की सेवा कर रहा है। दूसरे प्रकार का प्राणी वह होता है, जो समाज सेवा को अपनी जीवनचर्या में सम्मिलित करता है। वह समाज से अपने लिए कुछ नहीं लेता, उसके घर के खर्चे उसके उपार्जित धन से ही चलते रहते हैं। वह कभी जेब से चंदा नहीं देता। वह मित्रों, परिचितों से चंदा उगाही करके समाज सेवा करता है। तीसरा समाजसेवी वह होता है, जो चंदा उगाही में परास्नातक होता है। उसका कार्य ही नित्य नए आयोजन करना होता है। आयोजन के लिए व्यापक स्तर पर चंदा उगाही करता है। चंदे का सदुपयोग वही अच्छी तरह करता है।

चंदा उगाहने के प्रयोग में लाये गए वाहन के किराये से लेकर चंदा उगाहने वाली टीम पर किये गए खर्च को भी वह आयोजन के खर्च में जोड़ता है। चंदे से प्राप्त धन के व्यय के लिए उसका हिसाब पारदर्शी होता है, किन्तु उसके मुनाफे की रकम आयोजन से लिए खरीदी गई वस्तुओं के बिल में जुड़ी रहती है। बहरहाल यदि चंदा उगाहने में विशिष्ट कौशल रखने वाले समाजसेवी समाज में न हों, तो आधे से अधिक सार्वजनिक आयोजन संपन्न ही न हों। चंदा उगाहने में एक्सपर्ट एक सज्जन ने तो कार्यक्रम आयोजन और चंदा उगाही को अपना परमानेंट व्यवसाय ही बना लिया है। उन्हें बस किसी कार्यक्रम के आयोजन का दायित्व सौंप दीजिये। वह चंदा देने वालों की सूची बनाकर तुरंत अपने कार्य में जुट जाते हैं। आयोजन की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए अतिथियों के नाम निमंत्रण पत्र में प्रकाशित करके उनके नाम से ही चंदा उगाही करने लगेंगे। फिर हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा।   (विनायक फीचर्स)

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