सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
नवापारा-राजिम
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, देहरादून)
आलेख
“सजगता, मानसिक शक्ति और धैर्य ही वह नाव है जो आपको जीवन रूपी नदी के सफर में भटकाव से बचाकर सार्थकता की ओर ले जाती है” : सुश्री सरोज कंसारी
—————————————
जीवन एक निरंतर प्रवाह है जिसे सिर्फ़ पार करना ही काफी नहीं, बल्कि जागरूकता के साथ समझना जरूरी है। अगर आप अपने अन्तर्मन को शक्तिशाली बना लें और धीरज का साथ न छोड़ें, तो आप जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों (लहरों) में डूबने के बजाय, उन पर कुशलता से तैरना सीख जाते हैं। मनुष्य-मन की शक्ति असीम होती है। मन की प्रबल इच्छा शक्ति से हम जीवन की हर चुनौती का सामना सहजता से कर सकते हैं। विपरीत दौर में भी अपनी सोच को नया आकार और मोड़ देकर एक श्रेष्ठ जीवन का निर्माण कर सकते हैं। योग्यता, बल, बुद्धि, विद्या सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं, बस ! मन की अनियंत्रित चंचलता को एकाग्र कर सही दिशा देने की जरूरत होती है। इच्छाओं के पीछे भागते मन को आत्म-कल्याण, व्यक्तित्व के विकास, मानसिक मजबूती और शांत संतुलित जीवन के लिए तैयार कीजिए। हर तरह की दुर्भावनाओं से इस मन को मुक्त कीजिए। सुकून भरे जीवन के लिए कठिन साधना पूर्ण जीवन शैली अपनाइए। क्षणिक आवेश में कभी गलत कदम उठाकर अपने अमूल्य जीवन को बर्बाद मत कीजिए। रुकिए और सोचिए ! और जो उचित है उस दिशा में बढ़िए। बहक जाना दो पल का काम है, पर उसकी सजा जीवन भर मिलती है। जीवन में हर तरह की दुविधाएँ हैं, दुख, तकलीफ या यूँ कहें भटकाव का एक जाल है। यह भी सच है कि हर समस्या का हल कर सकते हैं मनोबल से, मन को बस उदास मत कीजिए। हार, असफलता, धोखा, झूठ, बेईमानी, भ्रष्टाचार, दुर्व्यवहार, दिखावा से भरी दुनिया की इस भीड़ से डरिए मत! डटकर सामना कीजिए अपने अस्तित्व और स्वाभिमान को बचाने के लिए। जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयास करते रहें। इस संसार की विविधता को, लोगों के व्यवहार, छल को इतने आसानी से नहीं समझ पाएंगे। बहुत कुछ देखेंगे जीवन की इन राहों में, महसूस करेंगे आशा-निराशा को, जख्मी होंगे। जितना अधिक दर्द मिलेगा, आप उतने अधिक मजबूत होंगे। जैसे-जैसे सांसारिक जीवन में आगे बढ़ेंगे, लोगों की मानसिकता को जानेंगे, अपने-पराए को समझेंगे, नए अनुभव होंगे इस विचित्र संसार से परिचित होंगे। अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में संतुलन बनाकर रखें। जीवन के इस संग्राम में हमें निर्भीक होकर खड़े होना है। चाहे जो हो जाए, कभी अपने ख्वाहिश को मुरझाने मत दीजिए। जब तक जीवित हैं, जीने के लिए कई अवसर बाकी रहते हैं। गम के अंधकार से बस निकलकर देखिए! जब आप जीवन से हारकर भी पूर्ण मनोबल से फिर से उठने का प्रयास करते हैं, तो आप खुद को नवीन रूप में देखते हैं। जहाँ आप निश्चिंत, सहज और साहसी बन जाते हैं, सारी दुविधाएं दूर हो जाती हैं। मन की उम्मीदों को खो देने पर जीने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। मन को मजबूत करके ही इस जीवन संग्राम में हम विजय प्राप्त कर सकते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में हमें आत्म-विश्वास के साथ खड़े होना चाहिए। दूसरों के सहारे रहने पर किसी मोड़ पर साथ छूटने पर हम भयभीत हो जाते हैं, अकेले उस वक्त हिम्मत जुटाना मुश्किल हो जाता है। जब हम अकेले चलकर गिरते हैं, ख़ुद उठने का प्रयास करते हैं, तो विपरीत दौर में भी संभल जाते हैं। दुख जो मन की गहराई में होता है, वो हमें हर पल जख्मी करता है। लगाव अंतर्मन की प्रबल भावना है, जो किसी व्यक्ति विशेष से होता है, जिसमें जीवन की मिठास होती है, जिसके साथ हम जीवन के सौंदर्य को महसूस कर पाते हैं। किसी के न होने से हमें गहरा आघात पहुँचे, ऐसी आदत मत बनाइए। जीवन में आकस्मिक भी कोई घटना होती है, जिससे मनुष्य का मन-मस्तिष्क विचलित हो जाता है। हम चाहकर भी उस स्थिति से निकल नहीं पाते। जीवन के हर पहलू पर दृष्टि डालें और गहराई से सोचें, तो ज्ञात होगा कि यहाँ सब कुछ क्षणभंगुर है—एक दिन मुट्ठी से रेत की तरह सब छूट जाना ही है। हम जिन मोह-माया के धागों को मजबूती से पकड़े बैठे हैं, वे अंततः टूटने के लिए ही बने हैं। इसलिए, अपने मन को उन व्यर्थ के द्वंद्वों, शिकायतों और ईर्ष्याओं से मुक्त रखना सीखिए जो आपकी ऊर्जा सोख लेते हैं और आपको एक मायूसी भरी ज़िन्दगी जीने के लिए विवश करते हैं। जब अंत निश्चित है, तो फिर इस सफर को बोझ बनाकर क्यों चलना? अपनी रूह को हल्का कीजिए। जो बीत गया उसे क्षमा के साथ विदा दें, और जो आने वाला है उसे मुस्कुराहट के साथ स्वीकार कीजिए। याद रखें ! अंत में, आपके साथ आपके संचय किए हुए सामान नहीं, बल्कि वे पल जाएंगे जिनमें आप वाकई ‘जीवित’ थे। आज में जीना शुरू कीजिए, क्योंकि जो छूट जाना है उसकी चिंता में उसे खो देना बुद्धिमानी नहीं…जिसे आप अभी जी सकते हैं।
निष्कर्ष : अंततः, जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं है कि हमने कितनी दूरी तय की, बल्कि इसमें है कि हम किस ‘भाव’ से बहे। जब मन की शक्ति और धीरज का संगम होता है, तो संघर्ष भी साधना बन जाता है।
संदेश : नदी की तरह बहना सीखें—चट्टानों से टकराकर टूटना नहीं, बल्कि अपना रास्ता बनाना सीखें। याद रखें, शांत मन ही जीवन की गहराई को नाप सकता है।
—————————————







