सम्पादक रुद्रप्रयागः लक्ष्मण सिंह नेगी
(नया अध्याय)
हिमालय के आंचल में आस्था का तीर्थ नन्दीकुण्ड।
पौराणिक गौरव, आध्यात्मिक ऊर्जा और अलौकिक प्राकृतिक सौन्दर्य का संगम।
ऊखीमठ: मध्य हिमालय की गोद में द्वितीय केदार मदमहेश्वर धाम से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नन्दीकुण्ड न केवल एक उच्च हिमालयी झील है, बल्कि यह स्थल धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक साधना और पौराणिक कथाओं से ओत-प्रोत एक दुर्लभ तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित है। समुद्र तल से लगभग 4,700 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह दिव्य कुण्ड पंचकेदार क्षेत्र के अंतर्गत आता है और भगवान शिव के वाहन नन्दी से गहरे रूप से जुड़ा हुआ माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार नन्दीकुण्ड वह स्थान है जहाँ भगवान शिव के वाहन नन्दी ने घोर तपस्या की थी। कहा जाता है कि इसी तपोभूमि के प्रभाव से यह कुण्ड अत्यंत पवित्र माना गया और यहीं से नन्दी को शिवभक्ति का परम वरदान प्राप्त हुआ। यही कारण है कि केदारनाथ, तुंगनाथ और मध्यमहेश्वर की यात्राओं से जुड़ा यह क्षेत्र विशेष धार्मिक महत्व रखता है। मान्यता है कि इस कुण्ड के दर्शन मात्र से श्रद्धालु के पापों का क्षय होता है और जीवन में आध्यात्मिक शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
आध्यात्मिक अनुभूति का केन्द्र
नन्दीकुण्ड केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि साधना और मौन तप का केन्द्र है। चारों ओर फैली हिमराशि, निस्तब्ध वातावरण और स्वच्छ जल आत्मा को गहन शांति प्रदान करता है। अनेक साधु-संत एवं शिवभक्त यहाँ ध्यान व साधना हेतु पहुँचते रहे हैं। स्थानीय जनमान्यता के अनुसार रात्रि के समय कुण्ड क्षेत्र में दिव्य ऊर्जा का अनुभव होता है और वातावरण में ओंकार की अनुभूति होती है।
प्राकृतिक सौन्दर्य का अनुपम दृश्य
नन्दीकुण्ड का प्राकृतिक सौन्दर्य अत्यंत मनोहारी है। चारों ओर बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाएँ, हिमनदों से निकलती जलधाराएँ, अल्पाइन घास के मैदान और दुर्लभ हिमालयी वनस्पतियाँ इस क्षेत्र को प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान बनाती हैं। वर्षा ऋतु में यहाँ ब्रह्मकमल, नीलकमल और अनेक प्रजाति के अन्य दुर्लभ पुष्प खिलते हैं, जो इसकी सुंदरता को और भी अलौकिक बना देते हैं। स्वच्छ नीला जल और उसमें प्रतिबिंबित हिमशिखर किसी चित्रकार की कल्पना से कम नहीं प्रतीत होते।
पैदल ट्रैक और यात्रा विवरण।
नन्दीकुण्ड तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं एवं ट्रैकर्स को कठिन लेकिन रोमांचक पैदल यात्रा करनी पड़ती है। सामान्यतः यह यात्रा द्वितीय केदार मध्यमहेश्वर धाम से शुरू होती है। घने जंगलों, तीव्र चढ़ाई, संकरे हिमालयी मार्गों और बुग्यालों से गुजरती यह यात्रा साहस और धैर्य की परीक्षा लेती है। मार्ग में कई स्थानों पर प्राकृतिक जलस्रोत और अस्थायी पड़ाव स्थल मिलते हैं। मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए यह यात्रा केवल अनुभवी मार्ग दर्शकों के साथ ही करने की सलाह दी जाती है। आस्था, साहस और प्रकृति का संगम ।
प्रकृति प्रेमी मनोज पटवाल बताते है कि नन्दीकुण्ड वास्तव में वह स्थल है जहाँ आस्था, साहसिक यात्रा और प्रकृति तीनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह न केवल शिवभक्तों के लिए एक पावन तीर्थ है, बल्कि हिमालय की आत्मा को निकट से अनुभव करने का दुर्लभ अवसर भी प्रदान करता है। प्रोफेसर कविता भट्ट शैलपुत्री का कहना है कि ऐसे दिव्य स्थलों का संरक्षण हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की रक्षा के लिए अनिवार्य है।







