‘जीवन की सार्थकता भाग-दौड़ में नहीं, बल्कि उस आंतरिक स्थिरता में है जहाँ आप शरीर से तो कर्म करते हैं, किंतु मन से पूर्णतः शांत व संतुलित रहते हैं’

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका

नवापारा-राजिम

रायपुर, (छत्तीसगढ़)

 

                 (नया अध्याय, देहरादून)

 

                      आलेख

 

‘जीवन की सार्थकता भाग-दौड़ में नहीं, बल्कि उस आंतरिक स्थिरता में है जहाँ आप शरीर से तो कर्म करते हैं, किंतु मन से पूर्णतः शांत व संतुलित रहते हैं’ – सुश्री सरोज कंसारी

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भीतर की शांति वह साधना है जिससे जीवन एक उत्सव बन जाता है। भस्म भभूति से होता शिव जी का अलौकिक श्रृंगार: हर मनुष्य श्रृंगार प्रिय होता है। खुद को सजाने संवारने में एक प्रकार से उनमें उत्साह का संचार होता है। वैसे भी मानव की स्वाभाविक प्रकृति होती है – अच्छे कपड़े, गहने पहनकर उन्हें खुशी मिलती है। हर किसी के रहन-सहन अलग होते हैं, पर सुंदर और आकर्षक दिखने की प्रवृत्ति सभी में होती है…भौतिकता के इस युग में आज नए-नए फैशन अपनाकर इस तन को सबसे अलग अंदाज़ में प्रदर्शित करने की एक प्रकार से होड़ है। जो की हाड़-मांस से बना एक पुतला मात्र है, क्षणभंगुर है, कब निकल जाए…तन से प्राण पता नहीं? फिर भी गर्व से फूले नहीं समाते। काल से कोई नहीं बच सकता, कब्र में जाकर ढेर हो जाएंगे सभी…इसलिए आत्मकल्याण के मार्ग ढूंढने से स्थाई सुख की प्राप्ति संभव है, पर इस ओर कम ही लोगों का ध्यान जाता है…भारतीय संस्कृति में वैसे तो हर देवी-देवताओं का महत्व है, जिसके प्रति जनमानस में अपार श्रद्धा, भक्ति और विश्वास है। जिससे आध्यात्म का संचार होता है हृदय में, सभी के रूप मनमोहक होते हैं। लेकिन सबसे अलग अद्भुत होता है देव के देव महादेव का श्रृंगार – सर पर गंगा, जटाधारी, चंद्र को धारण किए, गले में सर्प की माला, हाथ में डमरू, त्रिशूल और खाल लपेटे। जिनके हर श्रृंगार मानव जीवन को अमूल्य संदेश देते हैं, धार्मिक महत्व भी है। शिव जी के पूरे शरीर में भस्म भभूति के लेप होते हैं जो उन्हें अति प्रिय हैं। भस्म लगाने वाले व्यक्ति का मन शांतचित्त होकर अध्यात्म की ओर अग्रसर होता है। जो इसे पवित्र भाव से मस्तिष्क पर लगाते हैं, उन्हें परम आनंद की प्राप्ति होती है…भस्म भभूति मानव जीवन की नश्वरता को इंगित करती है। समस्त देहधारी को यह समझाती है – यह तन जलकर एक दिन राख हो जाएगी, इसलिए इससे अधिक प्रेम रखना मूर्खता की निशानी है। अपने हर पल को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करना चाहिए। दया-दान, धर्म में जीवन यापन करते हुए विचार को सात्विक रखना चाहिए। शिव पुराण के अनुसार, भस्म को शिव का स्वरूप माना जाता है। जो अपने भक्त को शारीरिक और आत्मिक शक्ति प्रदान करते हैं। भस्म को अति पवित्र माना गया है, क्योंकि मृत व्यक्ति के जलने के बाद राख ही शेष रह जाते हैं। मानव जीवन की सारी विडंबनाएं समाप्त हो जाती हैं…भस्म को धारण करने का अर्थ होता है – पवित्र भाव को हृदय में संजोना, सांसारिक भोग-विलास में लिप्त न होकर समर्पण के मार्ग पर चलना, कर्तव्य निर्वहन के लिए सदमार्ग का अनुकरण करना। भगवान शिव सरल, सहज और एकदम भोले हैं और रहस्यमयी भी हैं। शिव जी के जीवन से प्रेरणा मिलती है कि – अति किसी बात की ठीक नहीं, दुर्गुणों से दूर रहें। जब-जब पाप बढ़ते हैं, उसका अंत निश्चित है। इसलिए जितना हो सके, पुण्य कर्म, सत्संग, भजन-कीर्तन और प्रवचन में लीन रहें। हमारा शरीर एक ‘वाहन’ है और चेतना उसकी ‘ऊर्जा’। जब हम जीवन को केवल शरीर की जरूरतों (भोजन, निद्रा, भय) तक सीमित रखते हैं, तो हम केवल जीवित रहते हैं, जी नहीं पाते। सार्थक जीवन वह है जहाँ ‘स्व’ का विस्तार ‘सर्व’ में हो जाए। जब आप दूसरों के दुख में अपना दुख और दूसरों के सुख में अपना सुख देखने लगते हैं, तो आपकी चेतना विराट हो जाती है।

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