प्रभारी सम्पादक (जौनपुर यूपी): पंकज सीबी मिश्रा, विश्लेषक एवं पत्रकार।
वही छोटी सी चूक और भगदड़ का पुराना इतिहास।
यूपीः आपको याद होगा दशकों पूर्व लखनऊ में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की रैली थी, हज़ारों लोग ट्रेन से आ जा रहे थे। ऐन मौक़े पर एक ट्रेन का प्लेटफार्म बदल दिया गया और फिर बस कोई रेल की पटरियाँ फाँद तो कोई ओवरब्रिज पर चढ़ भागते दौड़ते नये प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचने की कोशिश करने लगा मची भगदड़ ने कई जिंदगियां ली। यह न पहली ऐसी घटना थी न अंतिम ऐसी हुई। अभी दिल्ली में यही वाकया देखने को मिला तो ऐसे में प्रश्न लाजमी है की रेलवे ऐन मौके पर प्लेटफार्म बदलने की गलती करता ही क्यों है। इतने विचारशील,उच्चशिक्षित ,योग्य और उम्रदराज लोग भी ऐसी गलतियां करते नजर आए तो कैसे चलेगा। महाकुंभ है, सबको मालूम है, वीकेंड है भीड़ और पुण्य प्राप्त करने की आंधी चल रही है तो अपने वाहन से या ट्रेन से इतनी लंबी यात्रा यह चैलेंज लेना क्या कहलाएगा ? क्या हम यह करके अपने पूरे परिवार को संकट में नही डाल रहे। दुर्भाग्य है कि मेरी हर चेतावनी सही सिद्ध हुई है, मैं कोई भविष्यवक्ता नहीं हूं बस अनुभव, जागरूकता और हिंदू मानसिक स्थिति को समझने का निचोड़ होती हैं,मेरी चेतावनियां। अभी भी सुधर जाएं हम तो जनहानि कम हो जाएगी। ऐन मौक़े पर गाड़ी का प्लेटफ़ार्म बदलना इतिहास में सबसे ज़्यादा प्लेटफ़ार्म पर भगदड़ वाली दुर्घटना का ज़िम्मेदार रहा है। पर इसकी पुनरावृत्ति है कि रुकती नहीं। 2025 चल रहा है दुनिया एआई की बात कर रही है और हम अभी भी इतनी बेसिक बेसिक चीजें न सुधार पा रहे हैं। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ वाली दुर्घटना दुखद है। रेलवे ने दस लाख मुआवज़ा दे अपना दामन साफ कर लिया। विपक्ष के लोग सरकार को कोसेंगे, इस्तीफा मांगेगे। सरकार के समर्थक इसमें विपक्ष की साज़िश बतायेंगे, बतायेंगे कि सोच समझ कर निकलना था कि ट्रेन में चलने पर जान भी जा सकती है। जनपद के पत्रकार और विश्लेष्ल पंकज सीबी मिश्रा ने घटना पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि अंततः जिनके घर परिवार वाले इस हादसे का शिकार हुवे, उन्हें कभी न्याय न मिलेगा और न ही ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हो इस दिशा में कोई सार्थक पहल रेलवे प्रशासन की ओर से होती नही दिखती है। एक बार फिर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ की घटना ने सिद्ध कर दिया कि हम अर्थात हिंदू समाज एक दिशाहीन और पूर्णतया असफल समाज हैं। सच कहूं तो मूर्खता के पर्याय कहलाने वाले हम गधे और भेड़ें भी हम ज्यादा संगठित, अनुशासित और विचारशील हैं। हमारे समाज को समझाना या दिशा दिखलाने के परिणाम हमेशा नेगेटिव होता है। पत्थर की दीवार पर सिर दे मारने जैसा है! मूर्खता की पराकष्ठा ने कल रात फिर बीसो लोगों की बलि ले ली। 144 वर्ष के महाकुंभ का प्रचार, अच्छे इंतजाम की सरगोशी, पुण्य की कामना, दिखावे की इच्छा ने अत्यधिक कष्ट झेलते हुए कुम्भ की सफल तीर्थयात्रा कर डाली। समाज को आजतक किसी ने नहीं समझाया कि कष्ट झेलने को तीर्थयात्रा का अंग समझना नितांत मूर्खता है।







