“संवेदनहीन संसार में मानवीय संवेदनाएँ जगाने की अनिवार्यता” – सुश्री सरोज कंसारी।

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री एवं लेखिका

अध्यापिका, समाज सेविका

नवापारा-राजिम,  रायपुर, (छ. ग.)

 

 

 

“संवेदनहीन संसार में मानवीय संवेदनाएँ जगाने की अनिवार्यता” – सुश्री सरोज कंसारी।

 

                                           (नया अध्याय, देहरादून)

 

संसार में सर्वत्र शांति स्थापित करने के लिए ईश्वर का बोध (आध्यात्मिक चेतना) और एकता की भावना पुष्ट करना आवश्यक है।” यह जीवन की व्यवस्था कानून के पालन व नियमों के निर्वहन से है। स्वयं के अस्तित्व को बेहतर बनाने हेतु प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं को निरन्तर तैयार करना चाहिए। यह स्वीकार करते हुए कि भीषण, निठुर संसार की भीड़ में अकेले ही मार्ग बनाना है, व्यक्ति को ख़ुद के लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए तथा उन्हें प्राप्त करने के लिए अथक व अविरल प्रयास करते रहना चाहिए। केवल सोचते रहने से कुछ नहीं होता, सपनों को हकीकत में बदलने के लिए हमारे कर्म आवश्यक है। पूर्वाग्रह और असफलता का डर प्रगति में बाधा डालते हैं। ऐसी कल्पना करने से दिमाग में अनावश्यक संदेह का जन्म होता हैं और हम फैसला कर पाने में असमर्थ हो जाते हैं। स्पष्टवादी और निर्णय करने की क्षमता का निर्माण करना बेहद जरूरी है। किसी के पास इतना समय नहीं कि कोई अपने पास बिठाकर जीने की हर कला को बारीकी से सीखा दे, मार्गदर्शन हमारे बड़े बुजुर्ग माता-पिता और शुभचिंतक जो होते हैं वे समय-समय पर देते ही हैं उनका अनुकरण करते हुए आगे का सफर तय करना होता है। किताबी ज्ञान तो विद्यालय में मिलते हैं। लेकिन व्यावहारिक ज्ञान हमें जूझने से जोखिम उठाने से हिम्मत करने से सीखने का प्रयास से और अनुभव से मिलते हैं जो जितना अधिक संघर्ष करते हैं। उतने अधिक निखारते हैं। चाहे कितनीभी संपत्ति हो, सारी सुख-सुविधाएं हो जाये कहीं न कहीं विपरीत परिस्थिति का सामना करना ही पड़ेगा। घर में बैठकर सब नहीं पाएंगे और न ही एक जगह चुपचाप बैठ जाने से जिंदगी का निर्वहन संभव हैं अपनी क्षमता सक्रियता कुशलता और उस क्षेत्र में अपना ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। जिसके आप योग्य है। उस क्षेत्र में अपने हुनर को प्रदर्शित करने के लिए मेहनत करनी होंगी। जिसकी बदौलत एक पहचान बनेगी जब खुद को ढूंढने का प्रयास करेंगे तभी जान पाएंगे हममें क्या अच्छाई हैं, जिसे तराशना है, और साधना करनी है, और आगे बढ़ने के लिए क्या चाहिए? हम अपना अधिकांश समय अनावश्यक बातों, कार्यों और विचारों में बर्बाद कर देते हैं, जिससे खुशियों के रास्ते बंद हो जाते हैं। संसार में हर तरह की सोच और स्वभाव के व्यक्ति हैं, लेकिन हमें इन सबके बीच सामंजस्य बिठाते हुए, सही मार्ग पर बने रहना चाहिए और जीवन में सकारात्मक जिनकी एक अलग विशेषता है। जिन्हें पढ़कर देखकर खुद का मूल्यांकन करें। आप किस स्थान पर हैं और आगे जाना कहां है पहले तय करें? एक उत्कृष्ट जीवन शैली के निर्माण के लिए हृदय की गराहाई में अपने लिए खुद एक कानून बनाएं एक मर्यादा संयम संस्कार हो कोई गलती होने पर पता कर सकें सुधार के लिए क्या करना है। गलत और सही का जब मूल्यांकन करते चलेंगे तो बहुत से परिवर्तन आएंगे और एक दिन उस चमक को प्राप्त करेंगे जो अपने में देखना चाहते हैं। दूसरे जब कमी निकालते हैं तो ये स्वाभाविक है कि बुरा लगता है लेकिन, जब खुद के अंदर सुधार करने और परिवार, समाज और राष्ट्र उपयोगी बनाने लगन होगी तो मानसिकता भी स्वस्थ हो जाएगी। कुछ गलत होने या करने पर आत्मा से आवाज आएगी की यहां सुधार की आवश्यकता हैं जहां हर गलती का निपटारा करने की आपमें क्षमता विकसित होगी। इस संसार में सर्वत्र शांति स्थापित करने के लिए ईश्वर का बोध (आध्यात्मिक चेतना) और एकता की भावना पुष्ट करना सबसे आवश्यक है। यदि ऐसा न हो, तो इस संवेदनहीन संसार में अराजकता फैल जाएगी, असामाजिक तत्व, उपद्रवी और आतंकवादी लोगों का राज हो जाएगा, और समस्त मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए, व्यवस्था बनाए रखने हेतु ईश्वरीय तथा मानवीय कानूनों का पालन अतिशय आवश्यक है। अति उग्र अपराधियों के लिए कठोर नियम और दंड विधान भी आवश्यक हैं। हम सभी इन्हीं कानूनों, व्यवस्था के कारण सुरक्षित और सुखी रहते हैं। जिसे बनाएं रखने में हम सबकी सहभागिता जरुरी हैं कानून के दायरे में रहकर ही कार्य करना चाहिए। हर व्यक्ति का जीवन एक नियम के तहत ही ठीक हैं जहां नियमों का उलंघन होता हैं वहीं अपराध का जन्म होता हैं कानून सबके लिए समान है कोई कानून से बड़े नहीं। कर्मभूमि में जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए कई कठिनाई आती हैं। जिससे मानसिकता उलझ जाती है। और कई नियमों का पालन नहीं कर पाते हैं। जिसकी सजा मिलती है। गलत कार्य व्यवहार और स्वभाव की वजह से झुकना भी पड़ता है। हर किसी की बुराई पर नियंत्रण हम नहीं रख सकते न ही, किसी को सुधार सकते हैं।

 

प्रत्येक व्यक्ति को अपनी छोटी-छोटी गलतियों को देखना चाहिए, उन पर विचार करना चाहिए, और उनसे सीखना चाहिए। इन गलतियों को स्वीकार कर लगातार सुधार करना अत्यंत आवश्यक है। ऐसा करने से, बिना किसी विवाद या सज़ा के, अपने आप ही चारों ओर एक सुखद वातावरण का निर्माण हो जाएगा। आज समाज में सताना, शोषण, लूट, चोरी, डकैती, घूसखोरी, कालाबाजारी, हिंसा और अंधविश्वास जैसी कई समस्याएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। मनुष्यों के लिए, सही और गलत कार्यों का आभास होना और अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनना आवश्यक है। जब हम अपने विवेक का उपयोग कर नैतिक आचरण अपनाते हैं, शांति, भाईचारे और आत्मीयता की भावना विकसित करते हैं, और यह नियम बनाते हैं कि हमारे मन, वचन और कर्म से किसी को नुकसान न पहुँचे, तभी हम स्वयं तथा समाज का सुधार व विकास कर सकते हैं। एक-दूसरे के मार्ग में बाधक बनने के बजाय, सहयोग करते हुए ही वास्तविक प्रगति संभव है। इस उद्देश्य हेतु, विश्व-बंधुत्व (वसुधैव कुटुम्बकम्) की भावना को समझना व उसका आचरण करना नितांत अतीव आवश्यक है।

 

 

नारी शक्ति, अस्मिता की एक सशक्त प्रतीक 

 

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