प्रभारी सम्पादक (मध्यप्रदेश): राजेन्द्र सिंह जादौन।
देहरादून यात्रा और पहाड़ों का फकुरीपन एक घुमन्तू पत्रकार की आँखों से
(नया अध्याय, देहरादून)
देहरादून की ओर बढ़ती सड़कें जैसे किसी और ही संसार की ओर ले जाती हैं। पहाड़ों की यह धरती सिर्फ भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि एक जीवित एहसास है जो चलते-चलते अपने भीतर समेट लेता है। मैं अक्सर खुद को “घुमन्तू पत्रकार” कहता हूँ। एक ऐसा इंसान जिसकी तलाश कभी ख़त्म नहीं होती, जिसकी जिज्ञासा कभी थमती नहीं, और जिसकी कलम हर जगह एक नई कहानी खोज लेती है। बचपन से ही मन में जो उबाल, जो खोज और जो बेचैनी थी, वह आज भी वैसी ही है ताज़ी, कच्ची और जिद्दी।
इस बार कदम बढ़े उत्तराखंड की ओर। जगह सिर्फ यात्रा का पड़ाव नहीं, बल्कि अनुभव का स्रोत बन गई। ऋषिकेश, हरिद्वार, टिहरी, चमोली ये केवल भौगोलिक नाम नहीं बल्कि अनुभूतियों के पड़ाव हैं, जहां प्रकृति और आध्यात्मिकता दोनों किसी पत्रकार के भीतर सोई संवेदनाओं को हल्के से झकझोर देती हैं।
मैं मध्यप्रदेश के विंध्याचल पर्वतों का बेटा हूँ, सतपुड़ा के घने जंगलों का साक्षी हूँ। वहाँ की धरती सख्त है, हवा गर्म है और जीवन का संघर्ष सदियों से वहीं की मिट्टी में बसता आया है। पर जब पहाड़ों की इस नई दुनिया में कदम रखा, तो लगा जैसे प्रकृति ने किसी और ही भाषा में संवाद करना शुरू कर दिया हो। यहाँ की हवा में ठंडक है, पर वह ठंडक मन को सुकून देती है। यहाँ की चोटियाँ ऊँची हैं, पर वे अहंकार नहीं जगातीं बल्कि विनम्रता सिखाती हैं। और यहाँ की नदियाँ तेज़ बहती हैं, पर उनका प्रवाह अराजक नहीं, बल्कि एक अनुशासित, ठहरा हुआ संगीत है।
देहरादून की पहाड़ियों में कुछ ऐसा फ़क़ीरीपन है, जो शहरों का भाग-दौड़ भरा जीवन कभी नहीं दे सकता। यह फ़क़ीरपन गरीबी नहीं बल्कि एक मानसिक स्वतंत्रता है जहाँ इंसान चीज़ों का नहीं, बल्कि अनुभवों का मालिक बन जाता है। पहाड़ों में यह स्वभाव जन्मजात होता है। यहाँ न कोई शोर है, न कोई दिखावा, न कोई दौड़। बस जीवन है अपने सबसे सादे, सबसे प्राकृतिक और सबसे ईमानदार रूप में।
ऋषिकेश में गंगा आरती की घंटियों की ध्वनि दिल में उतर जाती है। जैसे कोई पुकार हो जो भीतर की धूल झाड़ रही हो। हरिद्वार में श्रद्धा और परंपरा की पुरानी परतें आज भी वैसी ही हैं मजबूत, अडिग, और इंसान को अपने मूल की याद दिलाती हुईं। चमोली की बर्फीली हवा चेहरे पर पड़ते ही एक ताजगी जगाती है, मानो प्रकृति कह रही हो “यहाँ आकर तू अपने बोझ उतार दे।” और टिहरी की झील का सन्नाटा… वह तो जैसे किसी ध्यान की अवस्था की तरह है। वहाँ खड़े होकर मन अपने आप हल्का होने लगता है।
पत्रकारिता हमें दुनिया देखने की एक अलग दृष्टि देती है। हम घटनाएँ देखते हैं, लोग देखते हैं, संघर्ष देखते हैं, और बहुत बार दुनिया की सच्चाइयों को उतनी खूबसूरती में नहीं देख पाते। लेकिन पहाड़ इंसान की उस दृष्टि को नया रूप दे देते हैं। वे बताते हैं कि जीवन सिर्फ शोर नहीं है, सिर्फ राजनीति नहीं है, सिर्फ संघर्ष नहीं है जीवन में शांति भी है, ठहराव भी है और भीतर की यात्रा भी है।
देहरादून पहुँचते ही महसूस हुआ कि यहाँ की फिज़ा में कुछ ऐसा है जो आपके भीतर की थकान को खींच कर बाहर फेंक देती है। बस स्टैंड से लेकर राजपुर रोड तक, और वहाँ से मसूरी की ओर खिंची सड़कें सबने एक बात साफ़ कर दी कि पहाड़ खुद चलकर किसी को नहीं बुलाते, मगर एक बार बुला लें तो अपनी खुशबू आपकी नसों में बसा देते हैं।
यह यात्रा मेरे लिए सिर्फ एक सफ़र नहीं थी, बल्कि एक मानसिक पुनर्निर्माण जैसा अनुभव बन गई। पत्रकारिता की भागदौड़, रोज़ के संघर्ष, दबाव, राजनीति, आरोप, सच और झूठ के बीच जो मन थकने लगता है, यहाँ आकर वह मन फिर से अपने मूल में लौट जाता है। प्रकृति का यही सबसे बड़ा चमत्कार है वह आपको आपके ही भीतर वापस ले आती है।
पहाड़ों में एक अजीब सी विनम्रता है। वे आपकी आवाज नहीं सुनते, लेकिन आपका मन सुन लेते हैं। आप कितना ही ऊँचा बोल लें, उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता, पर आप मन ही मन अगर चुपचाप कुछ कह दें तो ऐसा लगता है जैसे हवा ने उसे पकड़ लिया है। यही एहसास शायद पहाड़ों का फ़क़ीरीपन कहलाता है जहाँ ईश्वरीयता दिखावे में नहीं, बल्कि अनुभव में मिलती है।
उत्तराखंड की यह यात्रा मुझे प्रकृति के इतना करीब ले आई कि लगा जैसे जीवन का असली मक़सद यहीं कहीं छिपा है। हम शहरों में दौड़ते-दौड़ते यह मान लेते हैं कि लक्ष्य वहीं है जहाँ हमारी नौकरी, संघर्ष और पहचान है। लेकिन पहाड़ बताते हैं कि लक्ष्य बाहर नहीं, बल्कि भीतर है। और भीतर का रास्ता अक्सर प्रकृति से होकर ही गुजरता है।
मैं यह नहीं कहता कि पहाड़ जीवन की मुश्किलें हल कर देते हैं। नहीं, वे सिर्फ याद दिलाते हैं कि जीवन को देखने का दूसरा कोण भी है। वे यह बताते हैं कि अंत चाहे जो भी हो दर्द, संघर्ष, हारा हुआ मन, थकी हुई आत्मा शुरुआत हमेशा सुंदर हो सकती है। और खूबसूरती सिर्फ दृश्य में नहीं, मन की निर्मलता में होती है।
शायद इसलिए यह यात्रा मेरे लिए एक किस्म की आध्यात्मिक पत्रकारिता थी। जहाँ मैंने सिर्फ पहाड़ नहीं देखे, बल्कि खुद को देखा। सिर्फ घाटियाँ नहीं, बल्कि अपने भीतर की गहराई को महसूस किया। सिर्फ चुप्पी नहीं सुनी, बल्कि अपनी ही आवाज़ को साफ़-साफ़ सुना।और इस पूरे अनुभव के बाद सिर्फ एक ही बात मन में ठहर गई अंत चाहे फिर जो भी हो, पर पहाड़ों ने नई शुरुआत तो दे ही दी है।
देहरादून की गलियाँ, लोग और अनकही कहानियाँ
देहरादून किसी फिल्मी शहर की तरह नहीं है, जहाँ हर दृश्य चमकता हुआ मिले; यह एक ऐसा शहर है जो अपनी खूबसूरती को संभालकर रखता है और हर आगंतुक को सिर्फ उतना ही दिखाता है जितना वह महसूस कर सकता है। कहते हैं कुछ शहर दृश्य से नहीं, एहसास से समझे जाते हैं। देहरादून ठीक वैसा ही शहर है। यहाँ की गलियाँ, यहाँ का मौसम और यहाँ के लोग इन तीनों में ऐसी सादगी है जो किसी भी घुमन्तू को थाम लेती है।
जब पहली बार देहरादून की सड़कों पर चलना शुरू किया, तो लगा कि यह शहर भागता नहीं है बल्कि धीरे-धीरे बहता है। यहाँ का हर मोड़, हर पेड़, हर पुरानी इमारत जैसे किसी कहानी का हिस्सा हो। शहर की गलियों में एक अजीब सा संयम है न तेज़ शोर, न अनियंत्रित भागदौड़, बस एक संतुलित लय, जिसमें जीवन अपने ही हिसाब से सांस ले रहा है।
राजपुर रोड पर चलते हुए लगा कि यह सिर्फ एक सड़क नहीं है, बल्कि देहरादून की धड़कन है। सड़क के दोनों ओर बसी छोटी-छोटी दुकानें, कैफ़े, पुरानी कोठियाँ, और पहाड़ियों से उतरती हवा का ठंडा थपका सब मिलकर यह एहसास कराते हैं कि शहर जितना आधुनिक है, उतना ही पुरानी आत्मा वाला भी है।
पत्रकार होने का मतलब है कि आपको हर चेहरे में कहानी ढूँढनी पड़ती है। और देहरादून के लोग इस मामले में निराश नहीं करते। यहाँ के चेहरे में एक संतोष है जैसे जीवन की रफ्तार को लेकर कोई बेचैनी नहीं। यह संतोष शायद पहाड़ों की छाया का असर है या गंगा की पवित्र हवा का, लेकिन इतना तय है कि यहाँ के लोग अपनी जमीन और संस्कृति से बेहद जुड़े हुए हैं।
एक दिन मैं छोटी-सी चाय की दुकान पर रुका। चौराहे पर बनी एक लकड़ी की झोपड़ी, जिसके पीछे पहाड़ का ढलान दिखता था। दुकान चलाने वाला युवक चमोली का था और देहरादून में रहकर पढ़ाई कर रहा था। उसकी आँखों में उम्मीद साफ़ दिख रही थी। लेकिन वह उम्मीद किसी महानगर की तरह हड़बड़ाई हुई नहीं थी शांत, स्थिर और पहाड़ी जीवन की तरह सधी हुई थी।
उसकी बातचीत से समझ आया कि पहाड़ों के लोग कम में खुश रहना जानते हैं। वे सपने देखते हैं, पर दौड़ते नहीं। वे चाहते हैं, पर लालच नहीं पालते। शायद यही पहाड़ी संस्कृति का मूल है “जरूरत से ज्यादा नहीं, जरूरत जितना ही।”
देहरादून सिर्फ पहाड़ों की गोद में बसा शहर नहीं, बल्कि एक बदलता हुआ शहर भी है। यहाँ सेना का अनुशासन भी है, शिक्षा की संस्कृति भी, और युवाओं का नया जोश भी। दून स्कूलों और कॉलेजों की वजह से यह जगह हमेशा से विचारों का संगम रही है। लेकिन बदलाव के बीच भी यह शहर अपनी मूल पहचान को खोने नहीं देता।
गलियों में घूमते हुए कई बार लगा कि देहरादून अपने भीतर दो दुनियाएँ समेटे हुए है। एक दुनिया वह है जो कैफ़े, आर्ट गैलरी, विश्वविद्यालय और तेज़ विकास के बीच पल रही है। दूसरी दुनिया वह है जो पुराने घरों की दहलीज़ पर बैठकर शाम की धूप को अपनी हथेलियों पर उतारती है। दोनों दुनिया एक-दूसरे के करीब हैं, लेकिन एक-दूसरे को भीड़ में धक्का देकर हटाने की कोशिश नहीं करतीं। यही संतुलन इस शहर की खूबसूरती है।
मसूरी की ओर बढ़ते हुए बादलों के बीच से झाँकता देहरादून और भी निखरा हुआ दिखता है। एक पत्रकार के लिए ऊँचाई से शहर को देखना सिर्फ दृश्य नहीं, बल्कि एक दृष्टिकोण होता है वह दृष्टिकोण जो बताता है कि शहर किस तरफ बढ़ रहा है और किस तरफ लौटना चाहता है।
देहरादून की गलियों में एक चीज़ और खास है यहाँ कहानियाँ दिखाई नहीं देतीं, बल्कि महसूस होती हैं। लोग खुलकर बोलते नहीं, लेकिन उनका व्यवहार बहुत कुछ कह जाता है। किसी बुजुर्ग का “नमस्कार बिटिया/भइया”, किसी दुकानदार का “आराम से बैठ जाइए”, किसी ऑटो वाले का “चलो भाई, चिंता मत करो” ये छोटी-छोटी बातें किसी भी बाहरी व्यक्ति को यहाँ का बना देती हैं।
पत्रकार की नजर हमेशा बदलाव और बेचैनी को पकड़ती है। लेकिन देहरादून में यह बेचैनी कम मिलती है। यहाँ की नमी, यहाँ की हवा, यहाँ का मौसम जैसे इंसान के भीतर की उथल-पुथल को स्थिर कर देता है।
एक शाम मैं घंटाघर के पास बैठा था। शहर की पुरानी रूह वहीं सबसे ज़्यादा महसूस होती है। लोग वहाँ आते-जाते रहते हैं, पर शहर की असल धड़कन उस गोलचक्कर के आसपास ही घूमती है। मैंने देखा वहाँ कोई भी जल्दबाजी में नहीं था। न भीड़ धक्का दे रही थी, न लोग चीख रहे थे, न कोई अराजकता। सब कुछ जैसे सहज, सरल और शांत।
यही देहरादून है एक ऐसा शहर जो पहाड़ों की विनम्रता में ढला है। जहाँ जीवन की गति धीमी हो सकती है, पर भावनाएँ तेज होती हैं। जहाँ प्रकृति सुंदर है, पर इंसान उससे भी सुंदर लगते हैं। जहाँ गलियाँ कहानी बन जाती हैं और यात्राएँ यादों में बदल जाती हैं।
इस शहर ने मुझे यह सिखाया कि पत्रकारिता सिर्फ संघर्ष के बीच ही नहीं होती, शांति में भी होती है। कहानियाँ सिर्फ विवादों में नहीं, सादगी में भी छिपी होती हैं। और सच सिर्फ तथ्यों में नहीं, अनुभवों में भी मिलता है।
देहरादून की यह यात्रा मेरे लिए एक दर्पण बन गई जिसमें मैंने खुद को साफ़-साफ़ देखा। पहाड़ों के बीच खड़े होकर महसूस हुआ कि जीवन जितना ऊपर से दिखता है, असल में उतना ही भीतर भी उतरना पड़ता है।
और शायद यही कारण है कि जब मैं देहरादून की गलियों से वापस लौटा, तो लगा कि मैं सिर्फ एक शहर नहीं देख कर आया मैं एक संस्कृति, एक आत्मा और एक अदृश्य शांति को साथ लेकर आया हूँ।
मसूरी बादलों के बीच छिपा देहरादून का दूसरा रूप
देहरादून से ऊपर उठती सड़कें जब मसूरी की तरफ मुड़ती हैं, तो लगता है जैसे किसी दूसरी ही दुनिया का दरवाज़ा खुलने वाला है। पहाड़ एकाएक बदल जाते हैं उनकी रंगत, उनकी खुशबू, उनकी चुप्पी सब कुछ। देहरादून की साधी-सादी हवा के बाद मसूरी की हवा जैसे किसी कवि के शब्दों में ढली होती है। हल्की ठंडक, बादलों की परतें और सड़क के दोनों तरफ चीड़ के पेड़, जो हवा के साथ झूमते हुए आपको एक अजीब-सी गहराई में ले जाते हैं।
मसूरी सिर्फ एक हिल स्टेशन नहीं, एक एहसास है एक सजीव कविता, जहाँ प्रकृति अपने सबसे नर्म और सबसे खूबसूरत रूप में सामने आती है। लेकिन पत्रकार की नजर से देखें तो मसूरी सिर्फ पहाड़ों के सौंदर्य का नाम नहीं, बल्कि इंसानी अनुभवों का एक पूरा संसार है।
जैसे-जैसे गाड़ी ऊपर चढ़ती है, हवा अपने आप धीमी और ठंडी होती जाती है। लगता है आसमान पास आता जा रहा है। बादल सड़क पर उतरकर साथ चलने लगते हैं। पहाड़, घाटियाँ, पेड़ और आसमान एक-दूसरे में घुलते हुए एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जिसे कैमरा तो कैद कर लेता है, पर दिल कभी नहीं भूलता।
मसूरी पहुँचते ही महसूस होता है कि शहर का हर कोना किसी पुराने किस्से की तरह है, जिसे पढ़ने और महसूस करने के लिए समय चाहिए। यहाँ की सुबहें बेहद शांत, और शामें बेहद रोशन होती हैं दोनों अपने भीतर कोई न कोई कहानी छिपाए हुए।
मॉल रोड, जो मसूरी की धड़कन मानी जाती है, वहाँ भीड़ जरूर होती है, पर शोर नहीं। लोग चलते हैं, पर भागते नहीं। दुकानें सजी होती हैं, पर दिखावा नहीं। हर चेहरे पर एक अलग तरह की खुशी होती है जैसे लोग अपने बोझ उन बादलों में कहीं टांग कर आए हों।
पत्रकार होने के नाते मैं हर यात्रा को सिर्फ यात्रा नहीं रहने देता; मैं उसे एक अनुभव, एक अध्ययन और एक गहरी सामाजिक परत की तरह देखता हूँ। मॉल रोड की भीड़ में मुझे वो परतें साफ़ दिखीं। यहाँ पर्यटक हैं, व्यापारी हैं, विद्यार्थी हैं, बुजुर्ग दंपत्तियाँ हैं, और युवा जोड़े हैं सब की अपनी कहानी है। पर इन सभी कहानियों को जोड़ने वाली चीज़ है मसूरी की प्रकृति, जिसकी छाया में हर व्यक्ति थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन अपनी दुनिया भूल जाता है।
एक शाम मैं गन हिल की तरफ टहलता हुआ निकल गया। बादलों की चादर शहर पर ऐसे फैली थी जैसे किसी चित्रकार ने ब्रश को हलके से हिला दिया हो। वहाँ खड़े होकर नीचे देहरादून की झिलमिलाती रोशनी देखने का आनंद ही अलग है जैसे धरती ने सितारों को उल्टा टाँग दिया हो।
गन हिल की ऊँचाई पर पहुँचकर महसूस हुआ कि पहाड़ सिर्फ ऊँचे नहीं होते, वे इंसान के मन को भी ऊँचा कर देते हैं। वहाँ हवा में वह ठंडक थी जो सिर्फ तापमान की वजह से नहीं, बल्कि उस शांति की वजह से थी, जो पहाड़ों की मिट्टी में सदियों से जमा है।
लेकिन मसूरी की असली खूबसूरती सुबह के वक़्त खुलती है। ताज़ी हवा, नर्म रोशनी और बादलों की धीमी चाल ऐसा लगता है जैसे पहाड़ सुबह पूरे शहर को नहलाकर नए दिन के लिए तैयार कर देता है। मैं सुबह-सुबह चैतन्य धाम की तरफ गया। रास्ते में सिर्फ हवा की आवाज़ थी और पत्तों की सरसराहट। उस सन्नाटे ने मुझे बताया कि प्रकृति जब बोलती नहीं, तब सबसे ज़्यादा समझाती है।
मसूरी में लोग भी थोड़े अलग हैं। सादगी यहाँ की हवा में है। एक दुकानदार से बातचीत में उसने कहा “साहब, यहाँ लोग वक्त से नहीं, मौसम से चलते हैं।” यह बात सुनकर समझ आया कि पहाड़ी जीवन अपनी गति खुद तय करता है। यहाँ समय का दबाव नहीं, मौसम की सलाह चलती है। यही कारण है कि पहाड़ों में जीवन थोड़ा धीमा लगता है, पर वह धीमापन बोझ नहीं, राहत है।
पत्रकारिता की तेज रफ्तार वाले जीवन में यह धीमापन कभी-कभी जरूरी होता है। यह इंसान को अपने भीतर लौटने का समय देता है। मसूरी में हर कदम पर यही महसूस हुआ कि जिस जीवन से हम रोज़ भाग रहे हैं, असल में वही जीवन हमसे मिलने को तरस रहा है।
कैमल्स बैक रोड पर बैठकर सूरज ढलते देखना एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। यह सड़क अपने आप में एक दास्तान है। यहाँ की चट्टानों के आकार ऊँट की तरह दिखते हैं, इसलिए इसका नाम पड़ा। पर मेरे लिए यह सड़क एक जीवित कविता की तरह थी। यहाँ बैठकर पहाड़ों के पीछे डूबते सूरज को देखते हुए लगा कि मसूरी सिर्फ देखने की जगह नहीं, जीने की जगह है।
मसूरी की यात्रा ने एक बात बहुत साफ़ कर दी यह हिल स्टेशन सिर्फ खूबसूरती का केंद्र नहीं, बल्कि संवेदनाओं का घर है। यहाँ बादलों में घुली हुई चुप्पी इंसान को अपने भीतर ले जाती है। यहाँ की हवा पिछले कई दशकों की कहानियाँ लेकर चलती है। यहाँ की पगडंडियाँ यात्रियों के कदमों से ज्यादा उनकी भावनाओं को दर्ज करती हैं।
और देहरादून और मसूरी का रिश्ता किसी शहर और हिल स्टेशन का रिश्ता नहीं बल्कि दो आत्माओं का जुड़ाव है। देहरादून धरती है, मसूरी आसमान। दोनों मिलकर वह अनुभव रचते हैं जिसे शब्दों में सिर्फ दर्ज किया जा सकता है, पूरी तरह व्यक्त कभी नहीं।
इस पूरी यात्रा ने मुझे सिर्फ दृश्य नहीं दिए, बल्कि दृष्टि दी। सिर्फ शांति नहीं दी, बल्कि समझ दी। और सिर्फ सुंदरता नहीं दी, बल्कि आत्मिक स्पष्टता दी कि जीवन सिर्फ नीचे की चकाचौंध में नहीं, ऊपर के बादलों में भी बसा है। मसूरी ने एक पत्रकार को उसकी खोई हुई नमी वापस कर दी, और एक इंसान को उसका खोया हुआ सुकून।
टिहरी : पानी, पहाड़ और स्मृतियों की गहराई
टिहरी… इस नाम में ही एक अजीब-सी खामोशी छिपी है।
जैसे कोई पुरानी याद पहाड़ों की तहों में दबे शब्दों की तरह सांस ले रही हो। देहरादून और मसूरी की यात्रा के बाद जब मैं टिहरी की ओर बढ़ा, तो लगा कि पहाड़ मुझे एक और परत में ले जा रहे हैं एक ऐसी परत जहाँ कहानी सिर्फ जमीन और आसमान की नहीं होती, बल्कि पानी की भी होती है। टिहरी झील सिर्फ एक झील नहीं, एक पूरा इतिहास है एक ऐसा इतिहास जिसे पानी ने अपने भीतर दफ़न कर लिया, और समय ने अपने पन्नों में चुपचाप दर्ज कर दिया।
टिहरी की ओर जाने वाला रास्ता ऊबड़-खाबड़ नहीं, बल्कि भावनात्मक है। जैसे-जैसे सड़क आगे बढ़ती है, प्रकृति का रूप बदलता जाता है। पहाड़ों की ढलानें गहरी होने लगती हैं, हवा ठंडी होती जाती है और नदियों का स्वर तेज़। सड़क से नीचे बहती भागीरथी नदी पहले एक साधारण धारा लगती है, लेकिन धीरे-धीरे उसके स्वर में वह नमी दिखने लगती है जो पहाड़ों के दर्द और उम्मीद दोनों को साथ लेकर चलती है।
टिहरी डैम की पहली झलक किसी विशाल कैनवास की तरह सामने आती है। मन एक पल को ठहर जाता है, क्योंकि प्रकृति और मानव-निर्मित संरचना का यह दुर्लभ संगम भयभीत भी करता है और विस्मित भी। डैम को देख कर लगता है कि मनुष्य ने पहाड़ की शक्ति से लड़ने के बजाय उसके साथ समझौता करना सीखा है।
लेकिन असल कहानी तो उस झील की सतह के नीचे छिपी है। पुराना टिहरी शहर गाँव, मंदिर, स्कूल, चौपालें, खेत… सब इस झील के नीचे सोए हुए हैं। कहते हैं कि बरसात में कभी-कभी पुराने शहर के कुछ अवशेष दिखाई देते हैं। जैसे पानी कह रहा हो “मैंने उन्हें मिटाया नहीं, बस अपने भीतर सँभाल लिया है।” इस तथ्य ने मेरे पत्रकार मन में कई सवाल खड़े किए। क्या विकास हमेशा विस्थापन लाता है? क्या आधुनिकता हमेशा स्मृतियों को डुबो देती है? क्या पहाड़ों के लोगों ने यह बदलाव अपनी इच्छा से स्वीकार किया या मजबूरी से?
टिहरी के स्थानीय लोगों से बात करने पर पता चला कि उनका दिल आज भी अपने पुराने घरों में बसता है।
एक बुजुर्ग ने कहा “हमारा गाँव अब पानी में है, पर हमारी यादें अभी भी सूखी जमीन पर चलती हैं।” इस एक वाक्य ने टिहरी की पूरी कहानी खोलकर रख दी।
टिहरी झील के किनारे बैठना किसी दार्शनिक किताब को पढ़ने जैसा है। यहाँ की हवा में स्थिरता है, पर स्थिरता मृत नहीं जीवित है। झील की सतह चिकनी है, लेकिन पानी की गहराई भीतर व्यवस्था, बदलाव और इतिहास की हलचल को छुपाए बैठी है।
मैंने घंटों झील के किनारे बिताए। नीले पानी में पहाड़ों का प्रतिबिंब एक अजीब भ्रम पैदा करता है जैसे पहाड़ पानी में उतर आए हों, और पानी पहाड़ों में चढ़ गया हो। पत्रकार की नजर ऐसे दृश्य में सिर्फ सौंदर्य नहीं देखती, वह प्रतीक भी देखती है। और मेरे लिए यह दृश्य प्रतीक था लचीलापन और समर्पण का।
टिहरी के लोग भी बिल्कुल इसी पानी की तरह हैं ऊपर से शांत, भीतर से गहरे। संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा है, लेकिन शिकायत उनकी संस्कृति में नहीं। टिहरी की गलियों में चलते हुए एक बात बहुत साफ़ महसूस होती है यहाँ का जीवन नदी की तरह है कभी बहता हुआ, कभी ठहरता हुआ, पर हमेशा आगे बढ़ता हुआ।
डैम ने भले ही पुराना शहर डुबो दिया हो, लेकिन टिहरी की आत्मा को नहीं। यहाँ के लोग मेहनत करते हुए, नदियों की तरह अपने रास्ते तलाशते हुए, पहाड़ों की तरह दृढ़ रहते हुए आगे बढ़ते हैं।
एक शाम मैं झील के ऊपर बने झूले जैसी तैरती नाव पर बैठा। सूरज ढल रहा था और पानी पर सुनहरी छाया फैलती जा रही थी। वह क्षण किसी आध्यात्मिक अनुभव जैसा था। पहाड़ स्तब्ध खड़े थे। हवा बिल्कुल शांत। और झील की लहरें जैसे पुरानी कहानियों को हल्के-हल्के छू रही थीं।
मैंने खुद से पूछा क्या पत्रकारिता सिर्फ दौड़, संघर्ष और तनाव का नाम है? या क्या इसमें ऐसी यात्राओं की भी जरूरत है जो मन को साफ़ कर दें?
टिहरी ने मुझे बताया कि पत्रकारिता का सबसे मुलायम और सबसे संवेदनशील रूप प्रकृति के बीच ही जीवित रहता है। शहर की उथल-पुथल, राजनीति की उठापटक, सत्ता की कहानियाँ इनके बीच पत्रकार अक्सर खुद को भूल जाता है। लेकिन टिहरी जैसे स्थान उसे फिर से अपने भीतर पहुँचाते हैं।
टिहरी की यात्रा सिर्फ पहाड़ों और पानी की कहानी नहीं।
यह सहेजने और छोड़ने की कहानी भी है।यह मजबूरी और स्वीकार्यता की कहानी है।यह विकास और स्मृतियों के टकराव की कहानी है। और यह कहानी सिर्फ टिहरी की नहीं पूरे पहाड़ की है, बल्कि पूरे देश की है।
इस यात्रा के अंत में सिर्फ इतना समझ आया पानी की गहराई सिर्फ भौतिक नहीं होती, भावनात्मक भी होती है। और टिहरी इसी भावनात्मक गहराई का नाम है। जब मैं वापस लौटा, तो लगा कि यह पानी मेरे भीतर भी कुछ धो गया है कुछ थकान, कुछ बोझ, कुछ अनकहे सवाल। टिहरी ने मुझे हल्का कर दिया,और पहाड़ों ने मुझे फिर से नया कर दिया।
देहरादून यात्रा और पहाड़ों का फकीरीपन
देहरादून की ओर जाने वाली सड़कें जैसे-जैसे पहाड़ों का आंचल थामती हैं, मन किसी अनजानी शांति से भरने लगता है। मैं भले ही मध्यप्रदेश के विंध्याचल और सतपुड़ा के जंगलों से निकला हुआ एक घुमन्तू पत्रकार हूँ, लेकिन उत्तराखंड की यह यात्रा मुझे भीतर तक बदल देने वाली साबित हुई। घुमक्कड़ी मेरे लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि आत्मा की भूख है कुछ खोज लेने की, कुछ जान लेने की, और कुछ महसूस कर लेने की। यही भाव मुझे लगातार रास्तों पर धकेलता रहता है।
देहरादून पहुँचते ही ऐसा लगा जैसे पहाड़ों ने मुझे चुपचाप अपने आँगन में बुला लिया हो। यहाँ की हवा में एक फकीरीपन है ऐसा फ़कीरीपन जो मन को हल्का करता है, अहंकार को पिघला देता है और इंसान को अपनी औकात का एहसास कराता है। मैदानी इलाकों की भागमभाग में जो बेचैनी सदैव भीतर खड़ी रहती है, वह पहाड़ों की इस पवित्र हवा में घुलकर कहीं गायब हो जाती है।
देहरादून की गलियाँ, चाय की दुकानो के कोने, मसूरी की ओर जाने वाली घुमावदार सड़कें इन सबमें एक अद्भुत कहानी है। ये कहानियाँ किसी किताब में नहीं मिलतीं, इन्हें महसूस करने के लिए आपको अपनी सांसों की लय को पहाड़ों की लय से जोड़ना पड़ता है। यहाँ के लोग, यहाँ की भाषा, यहाँ की शांति सब मिलकर एक ऐसी सभ्यता बनाते हैं जिसमें जीवन का सार छिपा है।
ऋषिकेश, हरिद्वार, चमोली और टिहरी जैसे स्थान तो सिर्फ जगहें नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति के पड़ाव हैं। जब गंगा के तट पर ऋषिकेश की शाम के सितारे चमकते हैं, तब समझ में आता है कि भारतीय सभ्यता ने हजारों वर्षों तक इस नदी को माँ क्यों माना। हरिद्वार का घाट सुबह-सुबह किसी मंदिर की तरह लगता है जहाँ कोई घंटी नहीं बजती, लेकिन आत्मा का द्वार अपने आप खुल जाता है।
चमोली और टिहरी की वादियाँ देखकर पहली बार लगता है कि प्रकृति स्वयं भी कभी-कभी मानो कविता लिखती है। और वह कविता शब्दों से नहीं, रंगों, हवाओं और पहाड़ी खामोशी से लिखी जाती है। इन जगहों को देखना, असल में खुद को देखना है क्योंकि प्रकृति के सामने हर मनुष्य अपनी परतें खोलकर खड़ा हो जाता है।
इस यात्रा ने मुझे समझाया कि पत्रकारिता का असली सौंदर्य सिर्फ खबरों की तहकीकात में नहीं, बल्कि जीवन की तहों को समझने में भी है। पहाड़ों ने सिखाया कि खोज सिर्फ अपराध, राजनीति या सत्ता के गलियारों में नहीं होती। खोज उन रास्तों में भी है जहाँ सभ्यता का शोर नहीं पहुँचता, जहाँ सिर्फ हवा बोलती है, और वह भी धीरे।
मैं मध्यप्रदेश से आया हूँ विंध्याचल पर्वत मेरे खून में बसते हैं, सतपुड़ा के जंगलों की खुशबू मेरी साँसों में घुली हुई है। परन्तु उत्तराखंड के पहाड़ों ने एक अलग प्रकार का स्पर्श दिया एक ऐसा स्पर्श जो अपनी जड़ों को और मजबूती से पकड़ना सिखाता है। यहाँ की हवा में जो साफगोई है, जो पारदर्शिता है, वह मानो आईने की तरह है; यह आईना आपको खुद से परिचित कराता है।
देहरादून की सुबह किसी पर्व की तरह लगती हैं। हल्की धूप जब चीड़ और देवदार के पेड़ों के बीच से गुजरती है, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति आपके लिए दरबार लगा रही हो। और उस दरबार में न कोई राजा है, न कोई प्रजा बस इंसान और प्रकृति की बराबरी पर खड़ी एक मौन बातचीत।
पत्रकारिता की दुनिया में अक्सर एक दबाव रहता है तेज चलने का, जल्दी लिखने का, जल्दबाज़ी में निष्कर्ष निकालने का। लेकिन पहाड़ों ने मुझे बताया कि जीवन को समझने के लिए धीमा होना जरूरी है। पहाड़ कभी नहीं भागते, लेकिन फिर भी सबसे ऊँचे होते हैं यह बात जीवन का सबसे बड़ा दर्शन है।
यह यात्रा मुझे फकीरीपन का अर्थ समझाती है। फकीरी का मतलब गरीबी नहीं, बल्कि वैराग्य है ऐसा वैराग्य जिसमें इंसान कुछ खोकर नहीं, बल्कि बहुत कुछ पाकर जीता है। यहाँ आकर समझ में आया कि पहाड़ों पर रहने वाले लोग क्यों इतने सहज, सरल और निर्मल होते हैं। क्योंकि प्रकृति उन्हें रोज-रोज नम्रता का पाठ पढ़ाती है।
देहरादून से मसूरी तक का सफर जैसे-जैसे ऊपर चढ़ता है, नीचे छूटता संसार छोटा होता जाता है। शायद यही वजह है कि जो लोग पहाड़ों में रहते हैं, उनका दिल इतना बड़ा होता है क्योंकि वे दुनिया को ऊँचाई से नहीं, गहराई से देखते हैं।
इस यात्रा का अंत भले ही तय हो, लेकिन इसका असर जीवन भर रहेगा। यह यात्रा बताती है कि इंसान अगर कभी खो जाए, तो पहाड़ों के पास चला जाए। क्योंकि पहाड़ कभी आपका रास्ता नहीं रोकते वे बस आपको याद दिलाते हैं कि रास्ता असल में आपके भीतर है।
देहरादून ने मुझे बहुत कुछ दिया न सिर्फ यादें, बल्कि एक नया दृष्टिकोण, एक नई आस्था, एक नया सुकून। और यह सुकून किसी होटल, किसी दुकान, किसी बाज़ार में नहीं मिला, यह मिला गंगा की धारा में, हवा की लय में, और पहाड़ों की खामोश फकीरी में। शायद यही यात्रा का असली अर्थ है वह आपको वापस वहीं ले जाए जहाँ से आप आए थे, लेकिन एक नए मन और नई आत्मा के साथ।







