राजेंद्र रंजन गायकवाड़
(सेवा निवृत केन्द्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
संस्मरण 22: लिगेसी क्या होती है?
कई बार हम लिगेसी शब्द को सुनते ही पैतृक संपत्ति, वसीयतनामा, बपौती या धरोहर जैसी ठोस चीजों से जोड़ लेते हैं। ये सब तो बस भौतिक विरासत के रूप हैं—घर, जमीन, सोना-चांदी या पुरानी किताबें, जो समय की धूल में धीरे-धीरे फीकी पड़ जाती हैं। लेकिन क्या यही असली लिगेसी है? नहीं, दोस्तों। एक आदमी की सच्ची लिगेसी वो नहीं जो वो कमाता है या इकट्ठा करता है; वो तो बस धन है, जो मिट्टी में मिल जाता है। असली लिगेसी वो अमर छाप है जो वो पीछे छोड़ जाता है—वो विचार, वो मूल्य, वो बदलाव जो पीढ़ियों तक गूंजते रहें। ये एक ऐसी धरोहर है जो नष्ट नहीं होती, बल्कि फैलती है, जैसे नदी का जल जो समुद्र तक पहुंचकर भी अपनी पहचान बनाए रखता है।
परिवार में लिगेसी संस्कारों का सिलसिला
सबसे पहले बात परिवार की। एक पिता, मां या दादा-दादी की लिगेसी उनके दिए संस्कारों में बसती है। कल्पना कीजिए: एक बूढ़ा किसान जो अपने बेटे को सिर्फ खेती नहीं सिखाता, बल्कि जमीन के प्रति सम्मान, मेहनत की कद्र और प्रकृति के साथ तालमेल का पाठ देता है। ये संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं। मेरे बचपन में, मेरे दादाजी कहते थे, “बेटा, पेड़ काटने से पहले सोचना कि उसकी छाया में कितने बच्चे खेलेंगे।” आज भी, जब मैं कोई फैसला लेता हूं, वो आवाज गूंजती है। ये प्यार, ये सिखावे ही हैं जो परिवार को मजबूत बनाते हैं। अगर आपका बच्चा बड़ा होकर कहे कि “पापा ने मुझे ईमानदारी सिखाई, जो आज मेरी ताकत है,” तो समझिए, आपकी लिगेसी जीवित है। ये न कागजों पर लिखी जाती है, न बैंक में जमा होती है ये दिलों में उतरती है।
समाज में लिगेसी: दुनिया को नया आकार देना
अब समाज की बात करें। यहां लिगेसी वो काम हैं जो सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे समुदाय को प्रभावित करते हैं। सोचिए, एक साधारण स्कूल टीचर जो एक गरीब बच्चे को पढ़ाकर डॉक्टर बना देता है—वो बच्चा न सिर्फ खुद की जिंदगी बदलता है, बल्कि सैकड़ों मरीजों की जान बचाता है। या एक लेखक जो अपनी किताब से अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है, जैसे प्रेमचंद ने ‘गोदान’ में किसानों की पीड़ा बयां की। उनकी लिगेसी आज भी ग्रामीण भारत की सच्चाई को जगाती है।
और न्याय की लड़ाई? गांधीजी की अहिंसा की लिगेसी ने न सिर्फ भारत को आजादी दिलाई, बल्कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर तक को प्रेरित किया। कल्पना कीजिए, अगर आप आज एक छोटा सा कदम उठाएं—एक वृक्षारोपण अभियान चलाएं, या महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाएं—तो आने वाली पीढ़ी कहेगी, “उस आदमी ने हमें हरा-भरा भारत दिया।” ये काम छोटे लगते हैं, लेकिन इनकी जड़ें गहरी होती हैं। इतिहास गवाह है: स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी जैसे भगत सिंह ने अपनी शहादत से नौजवानों में बलिदान का बीज बोया, जो आज भी राष्ट्रभक्ति की मशाल जलाता है। साहित्यकार जैसे रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी कविताओं से संस्कृति की रक्षा की, जो आज भी बंगाल की आत्मा में बसी है। ये लिगेसी धरोहर नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जो समाज को आगे बढ़ाती है।
खुद में लिगेसी: मूल्यों और साहस का प्रकाश
सबसे गहन स्तर पर, लिगेसी खुद के अंदर बसती है। वो मूल्य—सच्चाई, करुणा, साहस—जो आप जीते हैं, वो दूसरों को प्रेरित करते हैं। जब लोग आपकी मौत के बाद कहें, “उसने सही मायने में जिया,” तो समझिए, आप अमर हो चुके हैं। जैसे हमारे महापुरुष स्वामी विवेकानंद का साहस, जो युवाओं को “उठो, जागो” कहकर जगाता रहा। या संस्कृति रक्षक जैसे भीष्म साहनी, जिनकी कहानियां विभाजन की त्रासदी को आज भी याद दिलाती हैं। ये वो लोग हैं जो एक संतति से दूसरी तक मूल्यों का हस्तांतरण करते हैं।
मानव इतिहास देखिए: शिकार युग में आग की खोज ने हमें गर्मी दी, पशुपालन-कृषि युग में खेती ने भोजन, लौह युग में औजारों ने शक्ति। और अब कंप्यूटर युग में, एलन ट्यूरिंग जैसी ह्यूमन लिगेसी ने डिजिटल दुनिया रची। ये सब वरदान हैं जो पीढ़ियां काटती हैं। लेकिन सवाल ये है । हम क्या बो रहे हैं? क्या हमारी लिगेसी पर्यावरण संरक्षण होगी, या डिजिटल नैतिकता की?
आज की राजनीति और 2047 की नजर: एक चेतावनी
अब इस विषय को आज की राजनीति से जोड़ें। हमारा देश 2047 में आजादी का शताब्दी वर्ष मना रहा होगा एक विकसित भारत का सपना। लेकिन अगर हम आज की राजनीति को समझें ध्रुवीकरण, भ्रष्टाचार, पर्यावरण लूट तो 2047 की पीढ़ी हमें क्या कहेगी? “तुमने वादे किए, लेकिन अमल कहां?” या “तुमने हमें स्वच्छ हवा और समानता दी, धन्यवाद!”? राजनीति लिगेसी का आईना है। नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका को नस्लवाद से मुक्त कर अपनी लिगेसी बनाई। क्या हमारे नेता ऐसा करेंगे? या हम, आम नागरिक, अपनी वोट, अपनी आवाज से ऐसी लिगेसी बनाएंगे जो 2047 में गर्व से याद की जाए? सोचिए: अगर आज हम जलवायु परिवर्तन के खिलाफ खड़े हों, शिक्षा को सबके लिए सुलभ बनाएं, तो आने वाली नस्लें कहेंगी, “उन्होंने हमें एक मजबूत नींव दी।”
संक्षेप में कहें तो बीज बोओ, फसल आने वाली पीढ़ी काटेगी
संक्षेप में, लिगेसी वो बीज है जो तुम बोओ—चाहे परिवार में प्यार का, समाज में बदलाव का, या खुद में साहस का। फसल तो आने वाली नस्लें काटेंगी। तुम्हारी क्या लिगेसी बनेगी? एक क्षण रुकिए, सोचिए। क्या आपका नाम इतिहास के पन्नों में बस एक तारीख होगा, या एक प्रेरणा? आज से शुरू करो—एक अच्छा काम, एक सकारात्मक विचार। क्योंकि लिगेसी न बनाई जाती है, न खरीदी जाती है वो जाई जाती है, जी कर।







