”मानवता को शिखर तक ले जाना है,अधर्म-अत्याचार की जड़ मिटाना है।”- सुश्री सरोज कंसारी।

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सुश्री सरोज कंसारी

मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत

कवयित्री, लेखिका एवं अध्यापिका

समाज-सेविका, नवापारा-राजिम

रायपुर, छत्तीसगढ़।

 

 

                         (नया अध्याय, देहरादून)

 

”मानवता को शिखर तक ले जाना है, अधर्म-अत्याचार की जड़ मिटाना है।”- सुश्री सरोज कंसारी।
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वास्तविक जीवन हमारी संवेदनाओं और सद्भावनाओं में निहित होता है। हम जो दिन-प्रतिदिन निस्वार्थ भाव से सबके कल्याण और भले के लिए कार्य करते हैं, वही हमारे अस्तित्व को सार्थकता प्रदान करता है। हमारी प्रार्थना हो कि सर्वत्र सबका भला हो, कल्याण हो। अधर्म तथा अत्याचार, वे चाहे किसी भी रूप में प्रकट हों, उन्हें मिटाने में लगे रहना ही हमारा सर्वोच्च धर्म, कर्म और कर्तव्य है। मनुष्यता की गरिमा बनी रहे, यही हमारा लक्ष्य है। आज के समाज में जहाँ कुछ लोग असभ्यता और जानवर-समान आचरण करते हैं, वहाँ हमारी मानवीय चेतना और नैतिकता ही प्रकाश-स्तंभ बन सकती है। असीम इच्छाओं की कामना लिए मनुष्य का मन सदैव भटकाव पूर्ण स्थिति में होता है। अस्त-व्यस्त मानसिकता को यदि समय पर दिशा न मिले तो यह पतन की ओर चला जाता है। मन में उठ रही भावनाओं को सहज करने के लिए सात्विक जीवन और शुद्ध भाव रखना आवश्यक है। सांसारिक जीवन के अनंत कष्टों के बीच, खुद अनुकूल वातावरण देने का प्रयास जरूरी है । जन्म-मरण के उस चक्र हम सभी उलझे हैं। सत्यता को स्वीकार करने से भीतर की शांति चेहरे पर एक अलौकिक आभा के रूप में झलकती है। दया, करुणा और स्नेह जैसे गुणों को अपनाना चाहिए, तथा छल-कपट व द्वेष से मुक्त रहना चाहिए। अनंत वेदनाएं के बीच ही जीवन के उद्देश्य को खोजें। अपनत्व की महक बिखेरते रहिए। भावनाओं के आदान-प्रदान से हमें एक नए अनुभव मिलते हैं। जिससे परेशानियों के बीच हम जीवन की सुखमय बना सकतें हैं। मन में सभी के लिए शुभ विचार लेकर ही प्रगति के पथ पर बढ़ सकते हैं। अपनी शक्ति को निरन्तर सही, सेवा के कार्यों में खर्च करें। यह जीवन दर्शन हमें सिखाता है कि भौतिक उपलब्धियाँ क्षणभंगुर (नाशवान) हैं, पर हमारे कर्मों की पवित्रता व हमारे नैतिक निर्णय ही स्थायी महत्व रखते हैं। सदैव जीवन को प्रगति शिखर पर ले जाने के लिए सही मार्ग अपनाइए भले ही कष्ट हो लेकिन अपने कर्म से पछतावा नहीं, गर्व होना चाहिए। यह जीवन ईश्वरीय देन है, जिसे निरंतर सुधारने तथा एक उद्देश्यपूर्ण ढंग से जीने का प्रयास करते रहना चाहिए। इसे सद्कर्म, सेवा में लगाना हमारा धर्म है। अपने कर्त्तव्य, जिम्मेदारी और संस्कार युक्त आचरण से इसे सुसज्जित कीजिये। गतिशील इस जीवन का हर लम्हा बेहद कीमती है। एक विशेष लक्ष्य के लिए समर्पित रहिए जिससे मानव मात्र के सुख,समृद्धि एवं विकास में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका हो। बस, भोग-विलास में डूबे रहकर इसे व्यर्थ मत किजिए। स्वार्थ पूर्ण जीवन से कभी आत्म संतुष्टि नहीं पा सकते हैं। खुद में हीन भाव उत्पन्न हो ऐसे कार्य से बचिए। जिससे मन दुर्बल हो ऐसी सोच को दिल-दिमाग से निकालिए आत्म विश्वास जगे, कर पूर्ण उत्साह से भरपूर रहिए।

इस संसार में हर तरह के लोग होते हैं, कुछ अपने कार्य, व्यवहार से हमे सुख पहुंचाते हैं, कोई अपने कुटिल स्वभाव से दुखी करते हैं। हर कदम पर हमें लोगों की अच्छी-बुरी मानसिकता का सामना करना पड़ता है। एक जैसे नहीं होते सभी क्योंकि अपने परिवेश में रहते हुए कई तरह की सोच निर्मित होती है। हर समय अपनी सोच को सहज रख पाना आसान नहीं। अगर हम किसी का भला नहीं कर सकते, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि किसी का बुरा भी करने का हमें कोई अधिकार नहीं। पुण्य और पुण्य से भरी इस दुनिया में हमें अपने कर्मो को बहुत ही सोच-समझकर करना चाहिए। आपके लिए जो सही हैं, वह अवश्य किजिए लेकिन किसी से छीनकर, डराकर, दबाव बनाकर आगे मत बढ़िए। किसी को नीचा दिखाकर आप बड़े नहीं बन जाते। यह याद रखिए! देना एक मानवीय गुण है बस, लेते रहने से स्वार्थ बढ़ते हैं। अंतरात्मा को सदैव प्रसन्नचित रखने के लिए दयालु बने। अपने हिस्से से जरूरतमंदों को कुछ अंश ही सही दीजिए। कुछ अच्छा करने का भाव हमेशा रखिए। अंतर्मन को कभी उदास मत कीजिए! कल्याणकारी कार्य करते रहेंगे…आपका जीवन उत्कृष्ट बनेगा।
सिसकते-बिलखते, जीवन से रूठे दीन-दुखियों की ओर देखा कीजिये! कर्म का ही लेख हैं, कोई- राजा, कोई प्रजा या कोई झोपड़ी में, सड़क में तो कोई राज महल में है। नियति का खेल है! अपने हिस्से का दुख-सुख सभी पाते हैं। कभी किसी गरीब को देखकर खुद को बड़ा मत समझें। हम सभी इंसान हैं। भाग्य बदलता है। जीवन के इस रणभूमि में हम सभी संघर्षरत हैं। क्या पाना और खोना ये हम पर निर्भर नहीं करता? प्रलय तथा सृजन का क्रम अनवरत चलता है। हमें केवल अपना कर्म करना है, वो भी सावधानी से! मौन होकर। किसी को दर्द देकर कभी भूलिए मत! जीवन के इस सफर में आपको भी सामना करना ही पड़ेगा। दर्द से मुक्त कोई नहीं है। बस, जान-बूझकर किसी की भावनाओं को आहत मत न कीजिए। छोटे-छोटे प्रयास से जीवन में खुशियों को भरने की कोशिश किया किजिए। संयम से सब संभव है। किसी चीज को पाने के लिए अति व्याकुलता उचित नहीं। सांसारिक जीवन हमें हर पल किसी न किसी बात के लिए परेशान करती हैं। कभी भी आत्म अनुशासन मत तोड़िए। बिखरने की हजार वजह के बीच संवरने की क्षमता रखिए। आधुनिक जीवन शैली हमको अपनी ओर आकृषित करती है। कहाँ झुकना और कहाँ अपनी बातों पर अडिग रहना है,यह हुनर आना चाहिए। अति सुख की चाह में संग्रह ही करते रहने की प्रवृति हमे दुख के सागर में डूबने पर विवश कर देती है। जिससे शारीरिक, मानसिक तनाव की स्थिति बनी ही रहती है। चित को चिंतन लगा दें और व्यर्थ की चिंता से दूर रहें, तभी जीवन आनंदित हो पाएगा। सुकून बाहर नहीं, हृदय के भीतर है। जहाँ निस्वार्थ प्रेम है, वहीं आत्मा की शांति है। प्रेम की पूर्णता ही साहस, प्रोत्साहन और सच्चे आंतरिक सुख का स्रोत है। अपने मानवीय भावों को व्यक्त करें, उन्हें दबाएँ नहीं। अपने सद्भाव से हर जीवन में खुशियाँ भरें और मानव जीवन के महत्व को समझें। सच्चा संतोष दूसरों के दुखों में सहभागी बनने और उनके चेहरे पर मुस्कान लाने से मिलता है। संवेदनशील होना तथा दूसरों की पीड़ा को महसूस करना ही सच्ची मानवता है। याद रखें : दिखावे का सुख क्षणिक होता है, जबकि निस्वार्थ सेवा तथा परोपकार की सुखद अनुभूति जीवन भर रहती है। मानवता के उन्नयन हेतु, अधर्म का उन्मूलन ही हमारा परम कर्तव्य है। साधुवाद!

मानवता सर्वोपरि। जयतु भारतम्।
        नारी शक्ति, अस्मिता की एक सशक्त प्रतीक :
         

सादर!

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