“कर्म, ज्ञान व आध्यात्म का संतुलन ही जीवन है। वर्तमान में जीना सीखें, यही आत्मा की परम् शांति का मार्ग है”

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री एवं लेखिका

नवापारा-राजिम

रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

                 (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

“कर्म, ज्ञान व आध्यात्म का संतुलन ही जीवन है। वर्तमान में जीना सीखें, यही आत्मा की परम् शांति का मार्ग है”

              — सुश्री सरोज कंसारी

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              जीवन की यात्रा : जीवन की यात्रा जन्म से शुरू होती है और मृत्यु पर आकर रुकती है। हर सांस हमें जीने की मोहलत देती है और हर पल सीख देती है। अपनी इस कर्म भूमि में अपनी भूमिका का श्रेष्ठ निर्वहन करते हुए हर क्षण का उपयोग करें और जितने दिन भी रहें, स्वस्थ, मस्त और व्यस्त रहें… ये जीवन की गहराई में इतना भी न डूबें कि थाह न मिले और इतने भी लापरवाह न बनें कि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन न कर पाएं। इसलिए अपने लिए मध्यम मार्ग सुनिश्चित करें – संतुलित जीवन जिसमें न अधिक धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा हो और न सिर्फ सुखी जीवन की कल्पना हो, बल्कि सादा जीवन उच्च विचार हो। जब हम अपने लिए, अपनों के लिए खुशी की तलाश करते हैं, जिंदगी यूं ही गुजर जाती है क्योंकि खुशियों की कोई सीमा नहीं – एक पूरी होने पर दूसरी जागृत हो जाती है, पर संतुष्टि नहीं मिलती। इस बात को भी ध्यान में रखें – कर्म, ज्ञान और आध्यात्म के संगम से जीवन तीर्थराज बनता है। तीर्थ करने से जिस प्रकार मानसिक सुख मिलता है, पुण्य की प्राप्ति होती है, हर चिंता से मन-मस्तिष्क मुक्त रहता है, ईश्वर के दर्शन कर हम स्वयं के जीवन को धन्य मानते हैं। तो क्यों न अपने इस नश्वर शरीर का मोह त्याग कर अमानत में मिली जिंदगी में कर्म, ज्ञान और आध्यात्म का समन्वय कर लें? इसे हमेशा के लिए संयमित, मर्यादित और अनुशासित बना लें। कर्मरत रहते हुए ध्यान रहे – अपने हर कर्म का फल हमें अवश्य ही मिलता है। इसलिए कर्मभूमि में रहते हुए कभी भी किंकर्तव्यविमूढ़ न हों, अर्थात संशय की स्थिति में न रहें। हमेशा सत्य मार्ग का चयन करें, जो है स्पष्ट कहें, झूठ का सहारा न लें। झूठ की नीव पर सफल जीवन की कल्पना हमेशा अधूरी रहती है। अज्ञान के अंधेरे में सिर्फ शून्यता होती है, इसलिए उचित-अनुचित बातों का ज्ञान होना जरूरी है। कोई भी मनुष्य सर्वगुण संपन्न नहीं। जो ज्ञात नहीं, उसे जानने का प्रयास करें। बड़े-बुजुर्गों के अनुभव का लाभ लें, संत, ज्ञानी पुरुषों, महात्माओं के उद्गार को कभी झुठलाएं नहीं। ज्ञान के बलबूते पर ही हम आध्यात्म की सीढ़ी पर चढ़ते हैं। आध्यात्म से मन एकाग्र और शांत होता है। आज के दूषित माहौल में एक आध्यात्म की राह है जो हमारी विचलित मानसिकता को व्यवस्थित कर जीने के कई विकल्प प्रदान करती है, जिसमें सभी कुविचार स्वमेव नष्ट हो जाते हैं और एक अलौकिक परम् आनंद की प्राप्ति होती है।

 जीवन की विडंबनाएँ :

हम जानते हैं क्या करना है और क्या नहीं, लेकिन कभी-कभी जीवन की विडंबनाएं बुद्धि को शिथिल बना देती हैं। सही समय पर निर्णय ले पाने में हम असमर्थ हो जाते हैं। आधुनिकता की इस चकाचौंध में हम इतने खो गए हैं कि ध्यान ही नहीं रहता कि किस दिशा में जा रहे हैं। सिर्फ दौड़ रहे हैं, ये जाने बिना कि क्यों भाग रहे हैं उस दिशा में जिधर कोई मंजिल ही नहीं। आज सौ में से अस्सी प्रतिशत लोग किसी न किसी रोग से ग्रसित हैं – सुगर, बीपी, हार्ट अटैक, सरदर्द, मानसिक असंतुलन और भी कई प्रकार की व्याधियों से घिरे हैं। जिसमें से अधिकांश लोग मानसिक तनाव से घिरे हुए हैं, जिसकी कोई ठोस वजह नहीं। आधुनिक जीवनशैली ने मन की शांति ही छीन ली है। हम में से अधिकतर लोगों की आदत होती है छोटी सी बात का दही से मही फिर घी और मक्खन बनाने की। कहने का तात्पर्य है कि बात में कोई दम नहीं होता, लेकिन उसे घुमाकर, तोड़कर, मरोड़कर अर्थ का अनर्थ बनाकर परोसने की। जिस बात को कहने का कोई औचित्य नहीं होता, उसे लेकर बहस, विवाद करने की आदत। जैसे समूह में कोई कह दे “मुझे भूख नहीं”, बात यही खत्म। लेकिन उसी में से कोई न कोई होगा जो कहेगा “क्यों भूख नहीं? जाना नहीं चाहते? कंजूस हो?” और न जाने क्या-क्या। घर, परिवार, समाज, राष्ट्र – हम कहीं भी रहें, किसी ठोस मुद्दे पर सार्थक चिंतन, मनन से किसी भी समस्या का हल निकलता है, न कि अनर्गल बातों का बखान करते रहने से। इसलिए हमेशा अपने दिमाग पर ज्यादा जोर न दें। कुछ अपने बेहतरीन अंदाज से और कुछ को नजरअंदाज से जिंदगी को शानदार बनाइए। हर बात में प्रश्न, चिंता और तिल का ताड़, राई का पहाड़ मत बनाइए। बिंदास रहिए और अपने साथ रहने वाले हर किसी को अपनेपन, मधुर मिलनसार व्यवहार से सुखद एहसास दीजिए। किसी भी मुद्दे को जब तक एकदम आवश्यक न हो, खींचा-तानी न करें। सहजता से समाधान करने का प्रयास कीजिए। ज्यादा दिमाग पर जोर देने, तनाव लेने से कई मानसिक व्याधियां जन्म लेती हैं और पूरे शरीर को रोग घेर लेते हैं। आजकल इसी डिप्रेशन की वजह से कभी भी, किसी भी उम्र में हार्ट अटैक, पैरालिसिस, बीपी बढ़ना अधिक हो रहे हैं। जिसका एकमात्र कारण नासमझ लोगों द्वारा छोटी सी बात के अतीत, भविष्य और वर्तमान की व्याख्या करते रहना और अनावश्यक तनाव देना है। हर बात पर तर्क-वितर्क से मानसिकता बोझिल होती है। जिनको आदत है बेवजह बकवास की, उन्हें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जो सभ्य, शांत, व्यावहारिक होते हैं, उन्हें बहुत फर्क पड़ता है। हमेशा वर्तमान में रहें, निरन्तर प्रसन्न रहें।

सन्देश :

 जीवन की इस छोटी, अनमोल यात्रा में, प्रत्येक क्षण को जीने की कोशिश कीजिए। ख़ुद के मन को शांत रखें, आत्मा को मजबूत बनाएं, तथा जीवन को संतुलित व सार्थक बनाने का प्रयास करते रहें। हमेशा याद रखें, ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ ही जीवन की वास्तविक सफलता है।

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