डॉक्टर रामबली मिश्र, वाराणसी
(नया अध्याय, देहरादून)
राजा हरिश्चन्द्र
राजा हरिश्चन्द्र अति दानी।
स्वाभिमान सत्य गुण ज्ञानी।।
सारा जग है उन्हें जानता।
दान यज्ञ को स्वयं मानता।।
मूल्य सनातन के वे पोषक।
आत्म रूप अति प्रिय संतोषक।।
दानशीलता के प्रमाण वे।
दान यज्ञ के सहज प्राण वे।।
दानी बनकर राज लुटाये।
विचलित कभी नहीं हो पाये।।
बामन प्रभु की बने परीक्षा।
खुद के विक्रय की ले दीक्षा।।
किये मशान घाट रखवाली।
काशी धन्य हुई मतवाली।।
मरा हुआ शिशु भी करदाता।
पत्नी आँचल फाड़ प्रदाता।।
हरिश्चन्द्र की देख निष्ठता।
प्रकट हुई तब ईश अस्मिता।।
राजपाट सब पुनः आ गया।
हरिश्चन्द्र इतिहास छा गया।।
मेरी माँ
अतिशय दिव्य सदा विमल, निर्मल मन मुस्कान.
आराध्या जननी सरल, विद्या सरस महान..
सुखदायी वरदायिनी, अमृतमय प्रिय ज्ञान.
माता के आशीष से, मिला मुझे सम्मान..
मैं माँ का उपहार हूँ, उसका ही प्रतिरूप.
काया पाया प्रेम की, अरु साहित्यिक रूप..
माँ की शीतल छांव में, है स्वर्गिक आनंद.
खुला बुद्धि का द्वार है, बना आज कवि -चन्द..
माँ मुझको अनुपम लगे, दिव्य अलौकिक भाव.
देती अमृत सीख प्रिय, सुन्दर करे स्वभाव..
स्वच्छ चांदनी की चमक, से माँ है भरपूर.
दे प्रकाश रक्षा करे, तिमिर भगाए दूर..
माँ ही चारोंधाम है, देती है पुरुषार्थ.
स्वयं बनी भावार्थ वह, देती सच शब्दार्थ ..
खोज- खबर लेती सदा, रखती नित खुशहाल.
पास खड़ी यदि माँ सरल, बालक मालामाल..
मेरी माँ ने है दिया, मुझको ऐसा ज्ञान.
छुट गयी हैं गांठ सब, रहा नहीं अभिमान..








