जहाँ दिल पत्थर हो चुके हों, वहाँ रोने से पत्थर नहीं पिघलते — बस आँसू सूख जाते हैं

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/ लेखिका/शिक्षिका

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा/राजिम

रायपुर, (छ.ग.)

 

                (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

 

                                आलेख –

जहाँ दिल पत्थर हो चुके हों, वहाँ रोने से पत्थर नहीं                 पिघलते — बस आँसू सूख जाते हैं

                   : सुश्री सरोज कंसारी

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            जीवन एक झरना है, इसे पानी बनकर जियो। खुद को खुश रखना सबसे जरूरी है, हर पल मुस्कुराते रहो।धैर्य दुखों की जड़ को खत्म कर देता है, इसलिए तनाव न लें। हमेशा सकारात्मक रहो, क्योंकि मन की शांति संसार की सबसे बड़ी अमानत है। मौन हार नहीं, खुद की गरिमा बचाना है।शब्दों से पहले सम्मान जरूरी है, वरना मौन बेहतर है! जहाँ भावनाओं का मोल और बहस का परिणाम न हो, वहाँ मौन रहना ही गरिमा और शांति का मार्ग है। मौन अंतरात्मा की अभिव्यक्ति की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। जब हमारा हृदय किसी की बातों से विचलित हो जाता है, मन सांसारिक विडंबनाओं से ऊब जाता है, कुंठित प्रथाओं से साँसें सिहर जाती हैं और कहते-कहते जुबान थक जाती है, तब अनुभूति हृदय की अतल गहराइयों में सिमट जाती हैं। जब कोई शब्दों की वास्तविकता नहीं समझता, फ़र्ज़ की राहों में, सब कुछ समर्पित हो जाता है, और अपनों को मनाते-संवारते-सहेजते भाव शून्य हो जाते हैं, तब अंतर्द्वंद्व घेर लेता है। ऐसी स्थिति में, अंतर्मन में बहुत-सी बातें होती हैं, प्रत्येक क्षण कोई हलचल रहती ही है..! जिसे व्यक्त करने के लिए कभी-कभी शब्द नहीं मिलते हैं। तब मौन ही अनर्गल विचारों को नियंत्रित करने का माध्यम बनता है। यूँ ही कोई मौन नहीं होता। जब अपनों से ही जख्म मिलते हैं, हृदय में हज़ारों ख्वाहिशें दफ़न हो जाती हैं, आत्मा चोटिल हो जाती है। जब किसी की बातें चुभकर कसक बन जाती है, तब दूषित धारणाओं, झूठ और अव्यावहारिक लोगों से दूर एकांत की तलाश होती है — एक ऐसी जगह जहाँ बेवजह की भीड़ न हो। मौन स्पर्श करता है और उलझी हुई हर गुत्थी को सुलझाता है। मौन वही है…जिसमें मानवीय संवेदनाओं की धारा बहती है। जो आजीवन कर्मरत होकर,फ़र्ज़ की राह पर चलते जाते हैं, उनके मस्तिष्क में, अनेक सवाल उमड़ते रहते हैं, किन्तु सुकून देने वाले जवाब नहीं मिलते। मौन आत्मा की आवाज़ है। मानव ऊपर से भले शांत और सहज दिखे, पर अशांत मन को केंद्रित करने के लिए…वह मौन का सहारा लेता है — उस दिशा में, जहाँ कोई बाह्य शोर सुनाई न दे। मानव जीवन में, बहुत-सी व्यथा होती है। सहने और कहने की भी एक सीमा होती है। हद से ज़्यादा होने पर मौन को चुनते हैं वे लोग, जो बेवजह बहस-विवाद पसंद नहीं करते, जो अपनी बोझिल मानसिकता किसी अन्य पर, थोपना नहीं चाहते। कड़वाहट की हर घूँट पीते-पीते कभी-कभी हर शख़्स को अपनेपन की मिठास, स्नेह, करुणा और सहानुभूति की प्यास होती है..! आज के आधुनिक माहौल में, हर तरफ अव्यवस्था का मंज़र है। अपने-पराए की पहचान में ज़िंदगी अस्त-व्यस्त हो जाती है। दौलत ही आज ज़रूरत बन गई है। स्वार्थ के रथ पर, सवार होकर, लोग जाने कहाँ-कहाँ भटकते हैं। भावनाओं को कुचलने में, इतने माहिर हैं कि खून के रिश्तों की परवाह नहीं करते हैं, तो गैरों को समझना और अपनाना बहुत दूर की बात है। अपने कुटिल स्वभाव से वे जज़्बातों को रौंदते हैं। क्रोध की आग में, जलकर न जाने कितने बर्बाद हो गए। शब्दों से ही हर गमगीन या खुशनुमा दास्तान शुरू होती है। कठोरता को धारण कर लोग मानवता की सरहद पार कर जाते हैं। आज हर तरफ भयावह दृश्य है। ‘भाईचारा’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ सिर्फ कहने में अच्छे लगते हैं। व्यावहारिक रूप से सभ्यता धूमिल हो चुकी है। आपस में तकरार है, प्रत्येक क्षण यहाँ फायदे के सौदे होते हैं। एक सच्चे, ईमानदार और सीधे व्यक्ति को षड्यंत्र कर कुचल दिया जाता है। शब्दों में बहुत शक्ति है — एक ही बात के कई अर्थ निकाले जाते हैं। जिंदगी के इस सफ़र में वे लोग गुमराह हो गए हैं जो भले हैं, संस्कारी हैं, जिनमें इंसानियत जिन्दा है। अच्छे लोग कम ही हैं। कुदरत के फैसले से जो नाराज़ होते हैं, वही ज़िंदगी की धरातल पर आतंक मचाते हैं। माटी का चोला पहनकर हम इस संसार में आते हैं, अपने कर्म से ही अच्छे या बुरे बनते हैं। कर्म क्या किए, यह भूल जाते हैं; याद रखते हैं कि क्या मिला और क्या नहीं मिला। जो मिला उसकी कदर नहीं कर पाते, जो नहीं मिला उसके पीछे भागते हैं। सब करते हैं, किन्तु, अपने गुनाह पर नज़र नहीं डालते। दूसरों के दोष देखने से फ़ुरसत ही नहीं। बेगुनाह कोई नहीं — छोटी-बड़ी ग़लती सभी से होती है, चाहे जान-बूझकर या अनजाने में। इंसान को समझना मुश्किल है, पल-पल में मिज़ाज बदल जाते हैं। करीबी हो या गैर, विश्वास के काबिल सिर्फ वो विधाता है जिसने ज़िंदगी और मौत के बीच हमें जीने की कुछ मोहलत दी है, जिसे हम प्रपंच में निकाल देते हैं। न खुद जीते हैं, न जीने देते हैं। चारों तरफ हाहाकार है। कोई पूर्ण रूप से सुखी नहीं। किसी को रूप-रंग और यौवन का, तो किसी को शौहरत, दौलत और पद-प्रतिष्ठा का घमंड है। शब्दों के जाल में फँसकर हम मकड़ी की तरह उलझ गए हैं। क्या कहना है, कब और कैसे कहना है — एक बार भी नहीं सोचते, और अर्थ का अनर्थ कर अपनों के लिए ही षड्यंत्र रचते हैं। कहने से न समझते हैं, न कोई किसी की सुनता है। जब इन सबसे आत्मा कराह उठती है, तो मौन की राह चुनती है। किसी भी बात के दो पहलू होते हैं — सकारात्मक और नकारात्मक। सोच-समझकर मीठी वाणी बोलकर हम ‘रामायण’ की रचना कर सकते हैं, जहाँ आपसी प्रेम के कारण वनवास भी आसानी से कट जाता है। जहाँ राम की मर्यादा होती है, शब्दों में सार और सहजता होती है, वहाँ स्नेह, समझदारी, करुणा, दया, ममता, वात्सल्य, धैर्य और शांति का वातावरण बनता है। रामायण अर्थात् भाई-भाई में प्रेम, त्याग, तपस्या, समर्पण और अहंकार का विनाश। जो अभाव में जीने की कला जानते हैं, वे अपने मधुर वचन से लोगों के दिल में जगह बना लेते हैं। जहाँ भाव प्रधान होते हैं, शब्दों का चयन सोच-समझकर होता है, वहाँ एकता के सूत्र में बँधकर हर समस्या का समाधान निकलता है। वे शब्दों के तीर से किसी को आहत नहीं करते। जहाँ नकारात्मक भाव होते हैं, वहीं ‘महाभारत’ की रचना होती है — जहाँ मज़ाक में किसी का अपमान करना उद्देश्य हो, वहीं से अर्थ के अनर्थ होते हैं। आपसी कलह और विवाद ही भयंकर परिणाम देते हैं। जहाँ पारिवारिक भाव नहीं, विश्वास और लगाव नहीं, वहीं युद्ध की स्थिति निर्मित होती है। इतिहास गवाह है कि शब्दों के इस खेल में न जाने कितने मूर्छित हुए, घायल हुए, और अपनों को अपने ही मारने-काटने पर उतारू हुए। कहते हैं, जितनी ज़रूरत हो उतना ही कहें, अन्यथा गंभीर परिणाम सामने आते हैं। शब्दों से मिले घाव बहुत दर्द देते हैं। वे मन-मस्तिष्क को बेचैन कर देते हैं और ज़िन्दगी अव्यवस्थित हो जाती है। सोचने-समझने की क्षमता खो जाती है। इसलिए कम कहें, पर सटीक और सात्विक भाषा का प्रयोग कीजिये। मौन आत्मा को तृप्त कर शुद्ध तथा सार्थक दिशा प्रदान करता है। बाह्य कलह से व्यथित होकर आत्म-शांति हेतु मौन की गहराई में जाना ही सबके लिए हितकर है। मौन रहने से क्रोध, चिंता, बैर, छल-कपट जैसे दुर्गुण दूर होते हैं और मानसिक शांति मिलती है। मन में उठ रहे हज़ारों सवालों के सटीक जवाब मिलते हैं। दुगुनी ऊर्जा मिलती है और कार्यशक्ति बढ़ती है, एकाग्रता में वृद्धि होती है। मौन की अदालत में जाने से ही हर गुनाह के सही फैसले होते हैं। यथार्थ के साक्षात् दर्शन मौन से ही होते हैं।

 

        गले की नसें फूलने तक चिल्लाकर देख लिया,

       पर बहरे कानों के शहर में गूँज भी दम तोड़ देती है।

          जहाँ संवेदना की जमीन ही बंजर हो चुकी हो,

 वहाँ चीखकर अपनी आत्मा को लहूलुहान करना व्यर्थ है।

         अपनी बातों की पोटली अब कसकर बाँध ली है,

          हर किसी के पास हृदय नहीं होता समझने को।

   अब मौन ही मेरा सबसे प्रखर और गरिमामय विरोध है,

       शब्दों की बर्बादी से बेहतर, खामोशी का चुनाव है।

 

जब शब्द अपनी कीमत खो देते हैं, तब मौन ही सबसे शक्तिशाली हथियार बन जाता है। प्रतिक्रिया न देना भी एक बहुत बड़ी प्रतिक्रिया है। अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए कभी-कभी शब्दों का त्याग करना ही सबसे बुद्धिमानी भरा निर्णय होता है।

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