डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या
(नया अध्याय, देहरादून)
गीत (जहरीली हवा)
ऐसी हवा बही कुछ मित्रों,
जिसमें जहर भरा है।
जिधर देखिए मुँह फैलाए,
अरि ले वाण खड़ा है।।
विवश हो गई जनता सारी,
समझ न आए उसको।
जहाँ देखिए घबराए सब,
दुख कहते तो किसको?
भाग-दौड़ सर्वत्र मची है-
वह शैतान अड़ा है।।
अरि ले वाण खड़ा है।।
स्थिति इतनी हुई भयावह,
लोग भागते फिरते।
मिलना-जुलना बंद हो गया,
छिपे-छिपे घर रहते।
कोई मदद नहीं करता है-
पीछे शत्रु पड़ा है।।
अरि ले वाण खड़ा है।।
नित प्रकोप बढ़ता ही जाए,
अंत न इसका लगता।
जग में हाहाकार मचा है,
देख, कौन है बचता।
प्रभु का मात्र आसरा अब है-
भारी प्रभु-पलड़ा है।।
अरि ले वाण खड़ा है।।
हे, प्रभु तेरा शत-शत वंदन,
भक्त पुकारें तुमको।
आओ नाथ बचा लो जग को,
करो सुरक्षित सबको।
अकथ नाथ है महिमा तेरी-
लगता अरि तगड़ा है।।
अरि ले वाण खड़ा है।।






