पतझड़ में बसंत

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राजेंद्र रंजन गायकवाड़

साहित्यकार एवं 

सेवा-निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक

बिलासपुर, छत्तीसगढ़

 

                  (नया अध्याय, देहरादून)

 

   पतझड़ में बसंत

                        (कहानी संग्रह)

जब पतझड़ आता है तो पेड़ अपनी पत्तियाँ झाड़ देते हैं। रंग-बिरंगे पत्ते धरती पर बिछ जाते हैं। लगता है सब कुछ सूख गया, सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन उसी पतझड़ में कुछ फूल खिलते हैं। ऐसे फूल जो हवा के झोंकों में भी नहीं झुकते, जो सूखी धरती पर भी जड़ें जमाते हैं,यही बसंत इस कहानी संग्रह का प्रतीक हैं।

मैं, राजेंद्र रंजन गायकवाड़, सेवा-निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक, पिछले चालीस वर्षों से समाज के उस हिस्से को करीब से देखता रहा हूँ जहाँ आर्थिक अभाव और सामाजिक उपेक्षा सबसे ज़्यादा कष्ट देते हैं। जेल की चारदीवारी के अंदर मैंने देखा कि कितने ही युवा उन दीवारों के पीछे इसलिए पहुँचे क्योंकि उनके पास पढ़ने-लिखने का, आगे बढ़ने का रास्ता ही नहीं था। ग़रीबी ने उन्हें शिक्षा से, सम्मान से और सपनों से दूर कर दिया था। लेकिन उसी जेल के बाहर, उसी समाज में, मैंने उन बच्चों को भी देखा जिन्होंने पतझड़ की ठंड में भी फूल खिलाए और बसंत का एहसास करने के लिए गरीब परिवार में जन्म लेने के बावजूद मेहनत, त्याग और अटूट विश्वास के साथ उन्होंने शिक्षा का सहारा लिया और जीवन की दौड़ में आगे निकल गए।

 

सभी सच्ची कहानियाँ इस संग्रह में संकलित हैं। आर्थिक और सामाजिक सरोकार इस संग्रह की रीढ़ हैं। आज भी हमारे देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिनके पास दो वक्त की रोटी का संकट तो है, पर शिक्षा का संकट और भी बड़ा है। स्कूल की फीस, किताबें, कोचिंग, यहाँ तक कि एक शांत जगह पढ़ने की भी कमी उन्हें पीछे खींच लेती है। समाज ऐसे लोगों का उपहास करता है पर कुछ संवेदनशील लोग समाज में निर्धन होनहार बच्चों को गले लगाता है।

 

माता-पिता खेतों में, कारखानों में या मज़दूरी पर दिन-रात मेहनत करते हैं, फिर भी बच्चे की पढ़ाई अधूरी रह जाती है। इस संग्रह की दो दर्जन कहानियाँ बताती हैं कि कैसे एक गरीब माँ का त्याग, एक बीमार पिता का सपना और एक बच्चे का ज़ुनून मिलकर आर्थिक तंगी को पार कर लेता है। ये कहानियाँ साबित करती हैं कि शिक्षा ही वह पुल है जो गरीबी के खाई को पार करा सकता है।

 

सामाजिक सरोकार भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। जाति, लिंग, क्षेत्र और सामाजिक रूढ़ियों की दीवारें अभी भी खड़ी हैं। गाँव की लड़की को स्कूल भेजना, शहर के झुग्गी में रहने वाले बच्चे को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाना, पड़ोस के लोग जो “पढ़-लिखकर क्या करेगा” कहकर हतोत्साहित करते हैं। ये सब सामाजिक चुनौतियाँ हर कहानी में जीवंत हैं। लेकिन इन कहानियों के नायकों ने इन दीवारों को तोड़ा है उन्होंने दिखाया कि सामाजिक उपेक्षा के बावजूद आत्मविश्वास, अध्यापकों का मार्गदर्शन, सरकारी योजनाओं का सही उपयोग और परिवार का त्याग मिलकर सामाजिक बंधनों को भी तोड़ सकता है।

 

खुला आकाश, मुक्ताकाश, मेरा आकाश, आकाश पथ चार कविता संग्रह, एक आत्म कथा परिवर्तक- जेल अधीक्षक की आत्मकथा,लेखमाला रागरंजन 

 

प्रेम पच्चीसा सामाजिक उपन्यास और अनकहे रिश्ते प्रथम संग्रह की लोकप्रिय कहानियों के बाद पतझड़ में बसंत कहानी संग्रह न तो सिर्फ प्रेरणा का संकलन है और न ही सिर्फ आँसू बहाने की कहानियाँ ये जमीन से जुड़े नायक / नायिकाओं यादगार गुलदस्ता है। दूसरे शब्दों में कहूं तो यह वास्तविकता का आईना है जो यह बताता है कि आर्थिक और सामाजिक सरोकार कितने गहरे हों पर साथ ही यह उम्मीद भी जगाता है कि मेहनत और शिक्षा के जरिए हर आदमी  पतझड़ में फूल खिला कर बसंत ऋतु का अहसास करा सकता है।

 

मैं उन सभी पाठकों से, नीति-निर्माताओं से, शिक्षाविदों से और समाज के हर जागरूक नागरिक से अपील करता हूँ कि इन कहानियों को पढ़कर सिर्फ भावुक न हों, बल्कि सोचें हमारे आस-पास कौन-सा बच्चा आज पतझड़ में बंसत खिलाने की राह पर है? हम उसकी राह में कौन-सी दीवार खड़ी कर रहे हैं और कौन-सी मदद का हाथ बढ़ा सकते हैं?

 

पतझड़ में बंसत सिर्फ़ कहानियाँ नहीं, समाज को आईना दिखाने वाला दस्तावेज है।

 

जो बच्चा आज गरीबी में जन्म ले रहा है, कल वह मेहनत और त्याग से देश का भविष्य बन सकता है, बशर्ते हम उसे वह मौका दें।

 

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