मीडिया प्रभारी भोपालः प्रेरणा गौतम
(नया अध्याय, देहरादून)
“राजनीति में ‘महिला’, लेकिन सुरक्षा में ‘लापता’”
आज देश के राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक एक मुद्दा खूब गूंज रहा है महिला आरक्षण। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो इस बिल के पास न होने से देश की महिलाओं पर कोई ऐतिहासिक अन्याय हो गया हो। हर मंच पर महिला सशक्तिकरण की बातें हैं, भाषणों में संवेदनशीलता की झलक है, और बहसों में आंकड़ों का अंबार। लेकिन इसी शोर-शराबे के बीच कुछ ऐसी आवाज़ें भी हैं, जो या तो दबा दी जाती हैं या जानबूझकर अनसुनी कर दी जाती हैं।
हाल ही में उत्तराखंड की एक महिला नेता का बयान काफी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि “राज्य में महिलाओं की संख्या ज्यादा है, इसलिए महिलाओं के खिलाफ अपराध भी ज्यादा दिखते हैं।” यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि उस सोच का आईना है, जो समस्या की जड़ को समझने के बजाय उसे आंकड़ों के पीछे छिपाने की कोशिश करती है। सवाल यह है कि क्या अपराध इसलिए ज्यादा हैं क्योंकि महिलाएं ज्यादा हैं, या इसलिए क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है?
अगर इसी तर्क को मान लिया जाए, तो क्या हमें यह भी मान लेना चाहिए कि जहां पुरुष ज्यादा हैं, वहां पुरुषों के खिलाफ अपराध ज्यादा होना स्वाभाविक है? या फिर यह तर्क सिर्फ जिम्मेदारी से बचने का एक सुविधाजनक तरीका है? ऐसे बयान न सिर्फ समस्या को हल्का करते हैं, बल्कि पीड़ितों के दर्द को भी नजरअंदाज करते हैं।
इसी बीच मध्य प्रदेश के खंडवा में हुई एक घटना ने समाज की संवेदनशीलता पर एक और सवाल खड़ा कर दिया। एक महिला के साथ दुष्कर्म का प्रयास, और जब वह उसमें नाकाम रहा, तो उस पर चाकू से बेरहमी से हमला। यह सिर्फ एक अपराध नहीं है, यह उस मानसिकता का प्रमाण है जिसमें महिला को एक वस्तु समझा जाता है जिसे या तो हासिल किया जाए या नष्ट कर दिया जाए।
घटना के बाद जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई, वह थी पुलिस की कार्रवाई में देरी। छह दिनों तक एफआईआर दर्ज न होना, और फिर मीडिया के दबाव में आकर कार्रवाई करना यह दर्शाता है कि न्याय व्यवस्था कितनी निष्पक्ष है, या यूं कहें कि कितनी “प्रभावित” हो सकती है। अगर आरोप सही हैं कि आरोपी का संबंध किसी राजनीतिक पदाधिकारी से है, तो यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
अब सवाल उठता है क्या देश को इस समय महिला आरक्षण बिल की ज्यादा जरूरत है या महिलाओं की सुरक्षा की? क्या संसद में सीटें बढ़ाने से सड़कों पर सुरक्षा अपने आप बढ़ जाएगी? क्या कानून बनाने से पहले उन्हें लागू करने की ईमानदारी नहीं होनी चाहिए?
महिला आरक्षण का उद्देश्य निस्संदेह सराहनीय है। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़नी चाहिए, उन्हें निर्णय लेने के मंच पर जगह मिलनी चाहिए। लेकिन क्या यह पर्याप्त है? क्या केवल संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाने से गांव, कस्बों और शहरों में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी?
सच्चाई यह है कि समस्या कहीं अधिक गहरी है। यह समस्या मानसिकता की है, व्यवस्था की है, और प्राथमिकताओं की है। जब तक कानून का डर अपराधी के मन में नहीं होगा, जब तक पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव से मुक्त नहीं होंगे, तब तक कोई भी बिल महिलाओं को सुरक्षित नहीं बना सकता।
आज जरूरत है कि हम मुद्दों को सतही तौर पर न देखें। महिला आरक्षण पर बहस होनी चाहिए, लेकिन उसके साथ-साथ महिला सुरक्षा पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। यह समझना होगा कि सशक्तिकरण केवल प्रतिनिधित्व से नहीं आता, बल्कि सुरक्षा, सम्मान और न्याय से आता है।
राजनीति में महिलाओं के नाम पर भावनाएं भड़काना आसान है, लेकिन उनके लिए सुरक्षित माहौल बनाना मुश्किल। और शायद यही वजह है कि आसान रास्ता चुना जाता है बयान देना, बिल लाना, और तालियां बटोरना। लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब हर महिला यह महसूस करेगी कि वह कहीं भी, कभी भी सुरक्षित है।
आज अगर कोई महिला अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है, अगर उसे न्याय पाने के लिए हफ्तों इंतजार करना पड़ता है, अगर उसे दबाव में समझौता करने के लिए मजबूर किया जाता है तो यह सिर्फ एक महिला की हार नहीं है, यह पूरे समाज की हार है।
इसलिए यह वक्त है कि हम सवाल पूछें। सिर्फ सरकार से नहीं, बल्कि खुद से भी। क्या हम सच में महिलाओं को सशक्त बनाना चाहते हैं, या सिर्फ इस मुद्दे को एक राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं?
महिला आरक्षण जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है महिला सुरक्षा। क्योंकि बिना सुरक्षा के सशक्तिकरण अधूरा है, और अधूरा सशक्तिकरण सिर्फ एक भ्रम है।
महिलाओं के नाम पर राजनीति बंद होनी चाहिए, और उनकी सुरक्षा पर राजनीति शुरू होनी चाहिए। तभी इस देश की आधी आबादी सच में आजाद और सशक्त कहलाएगी।







