शिक्षा और चिकित्सा: पूरे पन्ने के विज्ञापन से आधी जिंदगी के सवाल।

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पंकज शर्मा “तरुण “

 

               (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

शिक्षा और चिकित्सा: पूरे पन्ने के विज्ञापन से आधी जिंदगी के सवाल।

 

 

प्रतिदिन की भांति प्रातः नित्य कर्मों के पश्चात द्वार पर आए अखबार को उठाकर लाया और पढ़ना शुरू किया।पहले पृष्ठ पर ही एक नामी गरामी कोचिंग कंपनी का पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छपा था,जिसमें अधिकांश प्रकाशित फोटो में लड़कियों के फोटो की संख्या लड़कों से अधिक थी जिससे यह तो सिद्ध होता ही था कि लड़कियां बनिस्बत लड़कों के पढ़ने में अधिक तेज होती हैं। जैसे ही उस पृष्ठ को पलटा, अगले पृष्ठ पर भी एक विज्ञापन था जो, पिछले पृष्ठ की भांति पूरे पृष्ठ पर था मगर अंतर केवल इतना ही था कि वह किसी बड़े निजी अस्पताल का था। जिसमें अस्पताल सर्व सुविधायुक्त होने के उल्लेख होने के साथ- साथ सारे रोगों की चिकित्सा के बारे में, आधुनिक तकनीक के साथ -साथ विख्यात विशेषज्ञ चिकित्सकों के नामों का उल्लेख था।

 

देख कर मन में विचार आया कि शिक्षा और चिकित्सा जैसे बुनियादी संस्थानों के विज्ञापनों ने किस प्रकार इतने बड़े- बड़े विज्ञापन दे कर लोगों पर मानसिक और आर्थिक दबाव बनाया हुआ है, क्योंकि यह विज्ञापन लाखों रुपए से कम में नहीं प्रकाशित होते। जो मरीजों और उनके परिजनों की जेबों से ही निकाले जाते हैं। इसके लिए इश अस्पतालों को झूठ का सहारा भी लेना ही पड़ता है। कोचिंग संस्थानों की बात करें तो कोटा,सीकर जैसे मंझौले शहरों में पूरे भारत देश से बच्चों को माता- पिता इस आशा से कोचिंग के लिए भिजवाते हैं कि उनके बच्चे कोचिंग से प्रतियोगी परीक्षाओं को अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण कर अपना भविष्य उज्जवल कर लेंगे, मगर होता क्या है ? आए दिन खबर पढ़ने को मिलती है कि नीट या जेईई में भाग लेने वाले कोचिंग ले रहे बच्चे ने पढ़ाई के अत्यधिक दबाव से फांसी लगा ली या जहर खा कर जान दे दी। सोच कर देखिए बच्चे को पाल पोस कर बड़ा करना कितना दुष्कर होता है मंहगे निजी नामी गिरामी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना और इसके पश्चात लाखों रुपए देकर कोचिंग दिलवाना। एक मध्यम आय वर्ग के पिता पर कितना दबाव पड़ता होगा ? आत्म हत्या की स्थिति कितनी मर्माहत होती होगी ? मगर इस दुष्कर परिस्थिति से इन कोचिंग संस्थानों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता ये निर्बाध गति से चलते रहते हैं, बल्कि यूं कहें कि दौड़ते रहते हैं।

 

पड़ोसी देश नेपाल में जेन जी आंदोलन के पश्चात जब नई सरकार का प्रादुर्भाव हुआ है, नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने सर्व प्रथम सुधारात्मक कदम उठाते हुए निजी शिक्षा संस्थानों को पूरी तरह बंद करने की घोषणा की है, जिसका नेपाल में उन सभी लोगों ने जो इस निर्णय के पक्ष में थे, स्वागत किया। इसके साथ ही हमारे देश में भी ऐसे ही कदम उठा कर राहत पाने की मांग उठने लगी है। देखा जाए तो यह सही भी लगता है। इससे बच्चों में समानता का भाव तो पनपेगा ही पालकों से शिक्षा के नाम पर हो रही लूट खसोट भी बंद होगी। जिससे मध्यम वर्ग और निचले तबके के लोगों को इस महंगी शिक्षा से बचे धन से स्वयं और परिवार का जीवन स्तर सुधारने में सहायता ही मिलेगी।शिक्षा के क्षेत्र में समान अवसर प्राप्त होंगे। शिक्षकों को समान वेतन मिलेगा, शिक्षा के अलग -अलग पाठ्यक्रम संचालित नहीं करने होंगे।

 

इसी प्रकार चिकित्सा जगत में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। चिकित्सा को देश में लालची पूंजीपतियों ने मानव सेवा क्षेत्र को एक उद्योग का रूप दे दिया है। मध्यम वर्ग के व्यक्ति अपनी चिकित्सा इन महंगे अस्पतालों में करवाने की प्रथम तो सोच नहीं सकते और कोई सोचता भी है तो उसके जीवन भर की कमाई यह अस्पताल चिकित्सा के नाम पर छीन लेते हैं। जब से सरकार ने आयुष्मान कार्ड जारी किया है, तब से तो इन अस्पतालों की तो और पो बारह हो गई है। जो अस्पताल इस योजना के लिए पात्र हैं, वे मरीज की चिकित्सा के नाम पर फर्जी बिल बना कर सरकारी खजाने को सेंध लगाकर लूटने में लगे हैं।

 

पिछले दिनों मेरी एक परिचित से मुलाकात हुई। उसके पिता अस्पताल से ठीक हो कर आए थे उनके स्वास्थ्य के बारे में मैने पूछा, भाई कैसा क्या अनुभव हुआ बड़े अस्पताल में चिकित्सा करवाने का ? तो उसने जो विवरण दिया वह मुझे स्तब्ध कर गया। उसने बताया कि जब अस्पताल से छुट्टी देने की प्रक्रिया शुरू हुई तो बिलों के भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई उसमें जो खर्च अस्पताल का हुआ साथ ही हमारे खर्चे जोड़ कर चार लाख रुपए हुए जिसमें अस्पताल ने पांच लाख का बिल बनाया। जिसमें से हमको भी बीस हजार रुपए नगद भुगतान किए। इस प्रकार आयुष्मान कार्ड में नया घोटाला किया जा रहा है।

 

मुझे बड़ा आश्चर्य मिश्रित दुख भी हुआ कि देश सेवा और देश प्रेम के नाम पर सम्मानित अस्पताल सरकारी खजाने को किस प्रकार बेरहमी से लूट रहे हैं। सही मायने में देखा जाए तो आज भारत सरकार के खजाने को चुपचाप चाटने वाली इस खतरनाक दीमक को समझदारी की डीडीटी छिड़क कर सही समय पर खत्म करने की आवश्यकता है नहीं तो निश्चित मानिए इसके दुष्परिणाम देश हित एवं जन हित में नहीं होंगे। (विभूति फीचर्स)

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