डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या
(नया अध्याय, देहरादून)
गीत (पृथ्वी/धरा)
कहे धरा अब हाथ जोड़कर,
आओ लाल बचा लो मुझको।
नहीं रहूँगी तो क्या होगा-
आता नहीं समझ में तुझको??
देखो हवा बहे जहरीली,
जल का स्तर घटता जाए।
नहीं ठिकाना शरद-ग्रीष्म का,
सिंधु-नीर भी बढ़ता जाए।
वन-वृक्षों का रूप भयावह-
द्रवित नहीं क्या करता सबको??
आता नहीं समझ में तुझको??
नहीं हवा जब शुद्ध बहेगी,
नहीं नीर भी मिल पाएगा।
ऋतु वसंत जब नहीं रहेगी,
पुष्प बाग क्या खिल पाएगा?
क्या होगा जब नदी न होगी-
इसका क्या आभास न जग को??
आता नहीं समझ में तुझको??
अभी वक़्त है मुझे बचा लो,
वरन, सभी जन पछताओगे।
जीना दूभर होगा इतना,
बिना अन्न-जल मर जाओगे।
मैं हूँ तो अस्तित्व है तेरा –
कहती फिरूँ सतत जन-जन को।।
आता नहीं समझ में तुझको??
जल से जीवन, जीवन से जग,
अखिल जगत मेरे सीने पर।
नदी नहीं तो नीर नहीं है,
जीवन बचता जल पीने पर।
सभी बचा लो वन-वृक्षों को-
कहती धरती खोजो हल को।।
आता नहीं समझ में तुझको??







