सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा/राजिम,
रायपुर, (छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
“आधुनिकता में शर्मसार मानवता”
(कविता)
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यह जिन्दगी हर पल सिखाती रही
जो सिर्फ ख्वाबों-खयाल होती है
हर चाहत मुकम्मल कहाँ होती है किसी की
खुशी के दामन में ग़म का अंबार होता है।
अधूरी ही रह जाती हैं दास्तानें यहाँ पर
कौन किसी का हमनवाँ हरदम होता है?
पल-पल हादसों से भरे इन लम्हों में
सुकून न जाने कहाँ लापता होता है।
जिंदगी के इस अथाह समंदर में भी तो
हर एक शख्स प्यार का प्यासा होता है
फिर क्यों नफरत का जहर घोलकर मन में
निराशा के घोर अंधकार में भटकता है?
भरोसा नहीं इस पल का, क्या हो जाए
फिर भी कल के लिए बेचैन रहता है
रिश्तों की गहराई में उतरता कौन है?
ईर्ष्या, द्वेष, घृणा और बैर में उलझा रहता है।
स्वार्थ की जब चलती है हवा चहुँ ओर
अपनेपन के रिश्तों में ही दरार होती है
वास्तविकता से कोसों दूर रहते हैं सभी
बाहरी आडंबर से फुरसत कहाँ मिलती है?
हर पल ही अंजान सफर है यहाँ
मंजिल का पता यूँ ही कहाँ मिलता है
ढूँढती हैं निगाहें न जाने किसे हर पल
दिल जो चाहे वो आसानी से कब मिला है?
भ्रम, झूठ और बस एक धोखा है सब यहाँ
फिर भी सांसारिक मोह कहाँ छूटता है
‘मेरे’-‘तेरे’ के बीच उलझे हैं झमेले सारे
मिलकर, संगठित होकर कहाँ रह पाते हैं।
स्वार्थ की अपनी दुनियां में बसर करते
दर्द, कराह और पीड़ा कौन सुनता है?
मानवता शर्मसार है आधुनिकता की दौड़ में,
संयम, शील और मर्यादा अब कहाँ बची है?







