कवि -राजेन्द्र सिंह जादौन
भोपाल म. प्र.
(नया अध्याय, देहरादून)
मैं फकीर सा पत्रकार
मैं फकीर सा पत्रकार,
तुम महारानी हो पत्रकारिता,
मेरे हिस्से धूल भरे रास्ते,
तुम्हारे हिस्से शाही मर्यादा।
खुला आसमान मेरी छत है,
ये धरती मेरा बिस्तर,
थककर कहीं भी सो जाता हूँ,
सच की चादर ओढ़कर।
तुम महलों में रहती हो,
नरम गद्दों पर सोती हो,
मेरे शब्दों में सच्चाई है,
तुम सजावट में खोती हो।
मैं भूख से लड़ता हर दिन,
कलम को हथियार बनाकर,
तुम सत्ता की चौखट पर
खबरों को तौलती हो सजा कर।
मेरे पाँव में छाले हैं,
पर हौसला अब भी जिंदा है,
मैं सच के पीछे भाग रहा,
तुम्हारा सच भी बंदा है।
मैं धूप में जलता रहता हूँ,
बारिश में भीगता हूँ,
हर दर्द को शब्दों में ढालकर
दुनिया से सीधा भिड़ता हूँ।
तुम वातानुकूलित कमरों में
बहसों का खेल सजाती हो,
मैं मैदान में उतरकर
सच्चाई की कीमत चुकाता हूँ।
फिर भी एक रिश्ता है हममें,
तोड़ना इतना आसान नहीं,
मैं तेरा ही एक अंश हूँ,
ये मानना भी अपमान नहीं।
तू अगर महारानी है,
तो मैं तेरी ही आवाज हूँ,
तू अगर सजी हुई तस्वीर है,
तो मैं उसका अंदाज हूँ।
एक दिन ऐसा आएगा,
जब फर्क ये मिट जाएगा,
तेरे महलों से निकलकर
सच फिर सड़क पे आएगा…
और उस दिन
ना कोई फकीर होगा,
ना कोई महारानी,
सिर्फ पत्रकारिता होगी…
और उसकी सच्ची कहानी।
(कविता कॉपी राईट है )






