सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा-राजिम, (रायपुर, छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
आलेख –
खुद को समझो, जीवन आसान हो जाएगा
आत्म-प्रेम: भीतर की ताकत जगाने का रास्ता
सुश्री सरोज कंसारी
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जीवन एक सतत यात्रा है जिसमें हर मोड़ पर नए अनुभव हमारा इंतजार करते हैं। सुख और दुख, सफलता और असफलता, ये सभी इस यात्रा के सहयात्री हैं। अक्सर हम बाहरी दुनिया की चकाचौंध में इतने उलझ जाते हैं कि अपने भीतर झाँकना भूल जाते हैं। जबकि सच तो यह है कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति और सबसे गहरा सुकून हमारे अपने भीतर ही छिपा है। जब तक हम स्वयं को नहीं समझेंगे, स्वयं से प्रेम नहीं करेंगे, तब तक बाहरी उपलब्धियाँ भी अधूरी लगेंगी।
मनुष्य जीवन में कई तरह की समस्याएँ आती हैं, लेकिन कभी-कभी संघर्ष करते हुए हम अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। दुख की अधिकता मानव मस्तिष्क को झकझोर कर रख देती है। अत्यधिक तनाव हमें शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह उलझा देता है। इसे सुलझाते-सुलझाते हम इतना खो जाते हैं कि मन की शांति ही गँवा बैठते हैं।
सांसारिक जीवन की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं। हमें यह ध्यान रखना जरूरी है कि पाने की चाह में हम क्या खो रहे हैं। जीवन के हर पल का आनंद लेने के लिए स्थिर, शांत और संयमित होना आवश्यक है। खुद की परवाह करना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। आत्म-प्रेम के बिना हम किसी भी चुनौती का सामना नहीं कर सकते। आत्म-प्रेम किसी भी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का प्रमुख आधार है।
जीवन के हर क्षेत्र में खुद का मूल्य स्थापित करने के लिए आत्म-प्रेम आवश्यक है। आत्म-प्रेम के बिना एक अधूरापन हमेशा बना रहता है। सांसारिक जीवन के सुखद अनुभव के लिए आत्म-प्रेम जरूरी है। जीवन में मोह-माया के जाल में फँसा मनुष्य हमेशा किसी न किसी बात पर व्यथित रहता है। साथ रहते हुए मनमुटाव, नाराज़गी और बहस भी हो जाती है, जिससे मन में निराशा का भाव उत्पन्न होता है।
इसलिए खुद के साथ गहरा संबंध स्थापित कीजिए। संसार में चाहे कितने भी प्रियजन हों, जब स्वार्थ की हवा चलती है तो कभी गलतफहमी में, लोभ या किसी भी कारण से रिश्ते टूट ही जाते हैं। विपरीत हालात में खुद को संभालने और प्रोत्साहित करने के लिए आत्म-प्रेम जरूरी है। आत्म-प्रेम से हम हर निर्णय निष्पक्ष ले सकते हैं और मन के द्वंद्व दूर होते हैं।
खुद को बेहतर बनाने, अपनी कमियों और खूबियों को जानने के लिए आज के समय में आत्म-प्रेम हर इंसान के लिए जरूरी है। आंतरिक शक्ति को उजागर करने और खुद का मूल्यांकन करने के लिए आत्म-प्रेम एक सरल माध्यम है। आत्म-प्रेम से हम खुद की भावनाओं को व्यक्त कर पाते हैं। दुनिया को जानने से पहले अपने प्रति स्नेह, दया, करुणा, क्षमा, सहयोग, सांत्वना, प्रोत्साहन और साहस हम आत्म-प्रेम के द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं।
अपने चरित्र, स्वाभिमान और आत्म-सम्मान को बनाए रखने के लिए आत्म-प्रेम सबसे प्रथम कर्तव्य है। आत्म-प्रेम हमें मानसिक मनोबल देता है। आत्म-प्रेम करके हम खुद को करीब से महसूस करते हैं। सांसारिक व्यक्ति, वस्तु या स्थान के प्रति लगाव और अति प्रेम अक्सर दुख का कारण बनता है, लेकिन आत्म-प्रेम करके हम अपनी आत्मा की आवाज़ सुनते हैं। अपनी अच्छाई-बुराई को सहर्ष स्वीकार करते हैं, खुद में सुधार कर आगे बढ़ते हैं। हम अपने मूल स्वरूप को किसी भी हालात में नहीं खोते।
हर मोड़ पर हमें अलग सोच और समझ रखने वाले व्यक्तियों से सामना करना पड़ता है। जहाँ किसी की तरक्की, सफलता, प्रसिद्धि, पद-प्रतिष्ठा, धन-दौलत या शोहरत देखकर कभी-कभी मन में ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट या बैर जैसे दुर्भाव भर जाते हैं, तब हम हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। हम खुद को कमजोर और दूसरों को मजबूत मानने लगते हैं। हमें लगता है कि हमारे पास जो है वह औरों की तुलना में कम है।
किसी की विशेष प्रसिद्धि देखकर हम उदास भी हो जाते हैं, यह सोचकर कि हममें कोई विशेष उपलब्धि, हुनर या योग्यता नहीं जो लोगों की नज़र में अद्भुत और आकर्षक बने। ऐसी नकारात्मक भावनाएँ आत्म-प्रेम के अभाव में होती हैं। हम दूसरों के गुणों को देखकर अपनी कमियों पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं, क्योंकि हम खुद की आंतरिक क्षमता को देख नहीं पाते। जब जीवन में प्रेम का अभाव होता है तो हम भटकते हैं।
आत्म-प्रेम से हम खुद की भावनाओं का सम्मान करते हैं। अपनी शक्ति और सामर्थ्य पर ध्यान देते हैं, उसे निखारते हैं। आत्म-गहराई में जाकर जीवन के सार को ग्रहण करने की क्षमता विकसित होती है। आत्म-प्रेम से हम जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपना पाते हैं। खुद से प्रेम करके हम जान पाते हैं कि हम जैसे हैं, जो भी हमारे पास है — रिश्ते-नाते, मित्र-प्रियजन, पद-प्रतिष्ठा, धन-दौलत — वह पर्याप्त है और एक निश्चित समय के लिए है।
हमारी जिम्मेदारी बनती है कि जो है उसे स्वीकार करें और ईमानदारी से अपना कर्तव्य पूरा करें। जो भी अच्छाई है उसे बाँटते रहें। किसी बात पर घमंड न करें, हमेशा सहज और सरल रहें। जो भी जीवन में जुड़े हैं उनके प्रति आभारी रहिए। चाहे कितने भी ऊँचे मुकाम पर चले जाएँ, आप एक इंसान हैं और इंसानियत ही आपका धर्म है — इस बात का ध्यान रखिए। किसी को छोटा न समझें, हर व्यक्ति अपनी जगह मूल्यवान है। इस बात को कभी न भूलें।
किसी तकलीफ से घिरे व्यक्ति के मन में कई तरह के विचार उमड़ते हैं। कभी-कभी उदासीनता हम पर हावी हो जाती है और हम खुद को एक असफल व्यक्ति मानकर हार मान लेते हैं। अगर जीवन की विभिन्न कठिनाइयों के बीच आत्म-शांति और संतुलन बनाए रखना है तो खुद पर पूर्ण विश्वास रखिए, दूसरों से अधिक अपेक्षा करना बंद कीजिए।
खुद पर ध्यान दीजिए और चिंतन कीजिए कि आप क्या चाहते हैं। शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनने के लिए आपको क्या चाहिए? आपके लक्ष्य क्या हैं? आपमें क्या विशेष गुण हैं? ऐसी कौन-सी कमी है जिसे सुधारने की जरूरत है? इस बात पर गौर कर खुद के व्यक्तित्व को निखारने के लिए कार्य कीजिए, तभी आप जीवन के हर क्षेत्र में सामंजस्य स्थापित कर सहयोगी बन पाएँगे।
मनुष्य जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। बाहरी सुंदरता की बजाय आंतरिक मजबूती और शांति के लिए अधिक प्रयास कीजिए। अस्थिर होने की बजाय स्थिर चित्त रहिए। किसी बात को लेकर मन को परेशान रखने की बजाय उस हालात से निकलने की कोशिश कीजिए। अपनी भावनाओं को इतना नियंत्रित कीजिए कि बाहर की नकारात्मक सोच, लोग और उनका व्यवहार आपको विचलित न कर पाएँ।
हमेशा याद रखिए, आत्म-प्रेम स्वार्थ नहीं बल्कि आत्म-बोध है। जिस दिन आपने खुद को पूरी तरह अपनाना सीख लिया, उस दिन दुनिया की कोई भी परिस्थिति आपको तोड़ नहीं पाएगी। आप एक दीपक की तरह बन जाइए — पहले खुद जलिए, खुद को रोशन कीजिए, तभी आप दूसरों के जीवन में उजाला फैला पाएँगे। क्योंकि जो स्वयं प्रेम से भरा है, वही इस संसार को सच्चा प्रेम दे सकता है। तो आज से, अभी से, खुद से एक वादा कीजिए — मैं खुद से प्रेम करूँगा, खुद का सम्मान करूँगा, और हर दिन खुद का बेहतर संस्करण बनूँगा।
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