राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग,
इन्दौर
(नया अध्याय, देहरादून)
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ये धिक्कार बने औजार.
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ऊँचाइयों पर खड़ा एक आदमी
नीचे जमीन पर देखता है कुछ इस तरह
कि कुएँ में झाँकता एक दूसरा आदमी
डरता है, काँपता है, खींचते हुए पानी
पसीने से लथपथ चढ़ता है सीढ़ियाँ
पानी पिलाता है उसे, वह जो है ऊपर
ऊँचाइयों पर खड़ा एक आदमी
कारण देरी थूकता है दूसरे के मुँह पर
वह जो दूसरा फिर-फिर पोंछता है मुँँह
और धिक्कारता है भीतर ही भीतर
मैं चाहता हूँ कि किसी भी एक दिन
ये धिक्कार बने औजार.
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पार्टी फंड और फंडे के नाम.
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उसके उठ खड़े होने की खबर में
उसके लिए सिर्फ अफसोस है ढ़ेर सारा
और कहीं मिले, नहीं मिले कह नहीं सकते
लेकिन वह राशनकार्ड और देशी ठेके पर
उसके जैसे ही दोस्तों सँग जरूर मिलेगा
झंडे उठाते हुए मिलेगा, फटे कपड़ों में
नारे लगाते मिलेगा, धँसी आँखें, नँगे पाँव
महँगाई विरूद्ध जुलूस में मिलेगा आगे
कटिबद्ध और प्रतिबद्ध भी मिलेगा इतना
कि जैसे अपढ़ होने का साक्षात सबूत
कोई गवाह नहीं, कोई सफाई नहीं
खुशी-खुशी आज ही हो जाएगा शहीद
पार्टी फंड और फंडे के नाम.
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चार बूँदें पसीना है कीमत मेरी.
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चार बूँदें पसीना है कीमत मेरी
झुरमुटों से आता हूँ निर्मल उजास हूँ मैं
सदियों से देता रहा हूँ दस्तक इसी तरह
मेरा भरोसा करो मैं ही दस्तावेजों में
मैं ही दस्तावेजों से बाहर भी सकुशल
कभी-कभी दरारों से भी आता हूँ बेशक
दीवारें, दरारें तत्काल गिरा देने की खातिर
बख़ूबी जानता हूँ कि गुफाएँ भी कम नहीं
प्रतिबंध भी हैं इन्हीं दिनों बहुतेरे चारोंओर
टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर टेढ़े-मेढ़े बिखरे हैं सच
सीधे रास्ते आता हूँ मैं सीधी कार्रवाई जैसे
झुरमुटों से आता हूँँ निर्मल उजास हूँ मैं
चार बूँदें पसीना है कीमत मेरी.
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