स्वतंत्रता सेनानी पंडित नंदकिशोर झा की पुण्यस्मृति को नमन!

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संवाददाता मुजफ्फरपुरः आशीष त्रिवेदी

 

                (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

 

 

स्वतंत्रता सेनानी पंडित नंदकिशोर झा की पुण्यस्मृति को नमन!

 

मुखमंडल पर तेजोमय आभा, आंखे चमकीली, वाणी प्रखर, लंबे दुबले कद काठी, आत्म विश्वास से लबरेज व्यक्तित्व के धनी अपने जोश और जुनून के पक्के, दृढ संकल्प शक्ति, देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की लालसा लिए जिन्होने अपना सम्पूर्ण जीवन देश और समाज के लिए न्योछावर कर दिया। प्रसिद्ध समाज सेवी, राष्ट्र प्रहरी, स्वतन्त्रता सेनानी पंडित नंदकिशोर झा की सेवा भावना, उनका, मिलनसार व्यक्तित्व की अनुगूंज आज भी लोग महसूस कर लोगों के मन में श्रध्दा के भाव का संचरण होने लगता है। प्रखर स्वतंत्रता सेनानी पंडित नंदकिशोर झा का 2 मई 1988 को अवसान हो गया।वे अनंत यात्रा पर चले गए किन्तु उनका समाज और राष्ट्र हित के लिए किया गया योगदान स्मरणीय है।

 

दरअसल, उस समय देश में सत्याग्रह आंदोलन का बिगुल बज चुका था। गांधीजी के आह्वान पर सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के पूर्व सरकारी सेवा में बतौर हाईस्कूल के शिक्षक के रूप में कार्य किए। वाणिज्य एवं कर विभाग में इन्सपेक्टर के पद पर भी रहे किन्तु सच्चे देशभक्त होने के नाते यह सब पद इनको ज्यादा दिनो तक आकर्षित न कर सका। देश सेवा की भावना के भावावेश में ये सब छोड छाडकर सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े और गांधीजी के संदेशो को गांव गांव जाकर पहुँचाने लगे। लोगों से मिलकर अँग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध आवाज बुलंद करने लगे। वे अपने जीवन में न केवल आजादी की लड़ाई लडे़ बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी गरीब कमजोर एवं असहाय के पक्ष में खड़ा हुए। उस अन्याय और दमनकारी सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध उन्होंनेे जीवन काल में तकरीबन 350 कीता केस लडा़ और गरीबों की आवाज बने। याद रहे कि उन्होंने कभी भी अपने से किसी कमजोर के साथ अन्याय न किया न होने दिया।हां, न्यायालयी प्रक्रिया में न्याय दिलाने के सिलसिले में उन्हें कई बार अपने से धनाढ्य और ताकतवर से भी जुझना पडा़ किन्तु अपने सामाजिक स्वाभिमान पर आंच न आने दिए। सत्य के मार्ग पर चलने के लिए उन्हें ईश्वर से प्रेरणा और अत्याचारियों से लड़ने की शक्ति मिलती थी। लोगों का समर्थन उनका सबल पक्ष था।लोगों से मिले नैतिक समर्थन के बल पर उन्हें कार्य करने का उत्साह बढता था।जाहिर सी बात है कि ऐसे निस्वार्थ समाज सेवक को लोग सर आँखों पर रखते थे। तभी तो लोग इन्हे आदरपूर्वक ओझाजी से संबोधित किया करते थे। उनके जीवन से जुड़ी हुई अनेक कहानी प्रचलित है जिससे आज के लोगों को सीखने की जरूरत है। उन लोगों के द्वारा स्थापित आदर्श आज भी हमारे विघटित समाज को आईना दिखाता है।

 

दरअसल, न्यायालयी प्रक्रिया के दौरान जब ये न्यायालय जाते थे तो वहाँ पर दोनो पक्ष के लोग होते थे। ऐसे में दोनों व्यक्ति का आमना सामना तो हो ही जाता था। मजे की बात यह है कि मत भिन्नता और दोनो दो भिन्न सिरे पर होने के बावजूद उन लोगों के बीच परस्पर बातचीत होती थी। परस्पर कुशलक्षेम का अदान प्रदान होता था। इतना ही नहीं, कुछ हँसी -मजाक या बातों में कटाक्ष भी होता था जिसमें एक मर्यादा तथा गरिमा होती थी। अवधेश बाबू के साथ न्यायालय के बाहर बैठकर बाते हो रही थी। बाते बातों में अवधेश बाबू ने ओझाजी से कहा, ओझाजी, इस केस में मैं आपको परास्त कर दिया। सुनते ही तपाक से ओझाजी ने जवाब दिया, अवधेश बाबू, सवाल निचली अदालत में हराने की नहीं है। मिशन है कि उक्त केस में आपको पराजित करूँगा और लड़ाई आगे जारी रहेगी।

 

दरअसल, अवधेश बाबू के एक संबंधी जो उच्च पदाधिकारी थे के सिफारिश पर निचली अदालत में एकतरफा फैसला सूना दिया गया।यह बात ओझाजी को नागवार गुजरी। वैसे वे कट्टर कांग्रेसी तथा गांधी विचारधारा के व्यक्ति तो थे ही, एक बार जब श्रीमती इंदिरा गांधी मधुबन आई थी तो ओझाजी को उनकी प्रतिभा को देखकर मंच पर अध्यक्षता करने की जिम्मेदारी दी गई थी। श्रीमती गांधी ओझाजी से प्रभावित हुई थी। अपनी तीक्ष्ण बुध्दि और प्रधानमंत्री से परिचय के बल पर ओझाजी इंदिरा गांधी से मिलने दिल्ली जा पहुंचे।

 

दरअसल, अवधेश बाबू के एक संबंधी जो उच्च पदाधिकारी थे के सिफारिश पर निचली अदालत में एकतरफा फैसला सुना दिया गया। लेकिन ओझाजी हार मानने वालो में नहीं थे। इंदिरा गाँधी से मिलकर कलक्टर, पूर्वी चंपारण के नाम एक पत्र लिखा लाए कि केस के फैसला पर निष्पक्ष पुनर्विचार किया जाय। आखिरकार, न्यायिक फैसला ओझाजी के पक्ष में हुआ क्योंकि न्याय के हकदार ओझाजी धे।

 

मुकदमेबाजी करना ओझाजी का शगल नहीं था। अन्याय होता जहाँ देखते थे, जिसके साथ होता देखते थे तो ये बहुत द्रवित और सामाजिक सरोकार के कारण उद्वेलित हो जाते थे। न्याय के लिए मध्यस्थता करते थे। बात बन गई तो ठीक अन्यथा जिसका साथ देते, प्राणपन से उसका साथ निभाते थे क्योंकि ये मानवीय संवेदना तथा सामाजिक सरोकार के लिए जाने जाते थे। हिंसा और लड़ाई झगडा के बिल्कुल विरुद्ध थे। जहां भी गये लड़ाई झगड़ा को त्याज्य बताकर, पंचायत के द्वारा समस्या का समाधान निकाल दिया करते थे। इसी सब गुणधर्म के कारण ये गांव जवार में समादृत थे। लोग इन्हें काफी दूर दूर तक न्यायप्रिय समाधान के लिए बुलाकर अपने यहाँ ले जाते थे और ओझाजी प्रायः बडे़ से बडे़ विवाद का निपटारा अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण सरलतापूर्वक कर देते थे। कमाल की बात यह होती थी कि दोनो पक्ष के लोग इनकी बातों को शिरोधार्य कर लेते थे और अपना विवाद भूलकर सौहार्दपूर्वक रहने लगते।

 

ओझाजी अपने जीवन में हमेशा निस्वार्थ समाज की भलाई में लगे रहें। लोगों के दुख दर्द में उनके साथ रहें। लोक सेवा ही उनके जीवन का लक्ष्य था। किसी तरह के सामाजिक कार्य में हाथ बढा़ते तो उसको अंजाम तक पहुँचाते चाहे उसके लिए उन्हें कठिनाईयों का सामना भी क्यों न करना पड़ता। नतीजतन, जब हाजी फरजन्द हाईस्कूल के लिए हाजी साहब ने जमीन तो दे दिए किन्तु वहाँ पर मकान बनाना चुनौती थी। मकान बनवाने के लिए जब कोई आगे नहीं आया तो ओझाजी ने यह बीड़ा उठाया। लोगों से चन्दा इकठ्ठा करके वहाँ भवन निर्माण कार्य करवाया और तब फेन्हारा के विद्यार्थी के लिए शैक्षिक गतिविधि सुचारू रूप से संचालित होने लगा। अभिमन्यु बाबू उस जमाने के बहुत विद्वान तथा उच्च आदर्श वाले शिक्षक थे। वे अन्यत्र कहीं कार्यरत थे।ओझाजी के सदप्रयास से अभिमन्यु बाबू का हाजी फरजन्द हाईस्कूल, फेन्हारा में बतौर प्रधानाचार्य स्थानांतरण करा लाए गये।सचमुच वे समृद्ध व्यक्तित्व वाले सुयोग्य शिक्षक थे। कठोर अनुशासन, शिष्टाचार और विद्या तथा ज्ञान के प्रतीक पुरूष थे।ओझाजी के प्रति अभिमन्यु बाबू के हृदय में अगाध प्रेम और श्रद्धाभाव था।

 

सार्वजनिक जीवन से इतर भी इनका जीवन था जो बेशक अनुशासित था। वैसे तो इनका जीवन हमेशा अधिकांश सफर में ही कटता था। इसका कारण था कि न्यायालयी प्रक्रिया की भागदौड़ हो या फिर सार्वजनिक जीवन जीने की प्रतिबध्दता के कारण ये बहुत दिनो तक अपने घर पर टिककर नहीं रह सकते थे। लेकिन जब वे घर पर होते थे तो नियमित रूप से रामायण तथा पुराणादि धार्मिक ग्रंथ हो या फिर साहित्य और इतिहास का अनुशीलन करते थे। ओझाजी कई भाषाओं यथा हिन्दी, संस्कृत, अँग्रेजी एवं नेपाली के जानकार तो थे ही, वे विधिज्ञाता भी थे। कानून के इतने अच्छे जानकार थे कि वे खुद वकील को भी मार्गदर्शन दिया करते थे।बुजुर्गो के बीच चर्चा के दौरान मैने एक बार ओझाजी के बारे में सुना कि ओझाजी वकील तो नहीं थे लेकिन विधिज्ञाता थे। वकीलों के वकील, वे एक बैरिस्टर थे। उनके प्रति लोगों के श्रध्दाभाव प्रदर्शन के पीछे का कारण यह था कि लोग उनके बुध्दि ज्ञान तथा वाक चातुर्य के तथा सामाजिक समरसता के कायल थे।

 

आजकल, जब लोग लालच पूर्ति की संभावना देखकर किसी के साथ दोस्ती कर सहयोग करते हैं। कभी वे लोग भी थे जो निस्वार्थ भाव से सभी वर्गो के अमीर गरीब के साथ सहृदयता रखते थे। आज सामाजिक परिवेश में उनके सेवा भाव तथा सामाजिक सरोकार के लिए समर्पण भाव से सीखकर ही सच्चे समाजसेवी देशभक्त के प्रति सच्ची श्रध्दांजलि होगी।

 

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