सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका / कवयित्री / शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
”जागो व बढ़ो!” (कविता)
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जागो!
जागो, उठकर देखो ये ज़िंदगी साफ है,
हँसते रहना, क्योंकि हँसने से ही
निराशा व दुःख सब दूर होते हैं।
निराशाओं के काले साये में,
जीवन को अंधकारमय मत करो,
ग़मों के दौर में, भी मुस्कुराने का,
अपना एक अलग अंदाज़ रखना।
सबके प्रति मन में संवेदनशीलता रखना,
इंसानियत का सबसे नेक गुण है।
भीड़ का हिस्सा मत बनना,
भीतर छिपे अपने हुनर को पहचानो।
दिखावटी बातों व छलावे से दूर रहो,
अपनी सोच का दायरा सदा विशाल रखना।
परेशानियाँ तो आती-जाती रहेंगी,
हर पल संघर्ष के लिए खुद को तैयार रखना।
अपनी अच्छाई व अपनी नेकियों से,
सबके दिलों पर एक अमिट छाप छोड़ दो।
समस्याओं के इस अथाह समंदर को,
कभी खुद पर हावी मत होने दो।
समाधान की गहराई व हौसला,
हमेशा अपने पास रखना।
सिर्फ खुद में ही मगन न रहना,
अपने कर्मों का भी पूरा हिसाब रखना।
दुनिया की फिज़ूल बातों पर ध्यान न दो,
बस! अपनी राह पर अडिग कदम रखना।






