राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
बिजली नहीं, गर्मी से तन-मन जल रहा है,
क्या करे इन्सान, ये सवाल मचल रहा है।
पंखा भी रुक गया, हवा ने भी ठुकराया है,
पसीने की बाढ़ें, बदन मोम सा पिघल रहा है।
रात को नींद नहीं, दिन को चैन कहाँ मिले,
हवा की चाहत, कलेजा बाहर निकल रहा है।
सरकारें वादे देतीं, नेता झूठे भाषण दे रहे हैं,
गर्मी में बेहाल हैं, वक्त काटना खल रहा है।
ठंडी हवा का सपना, देख-देख कर जीते हैं,
गर्मी का तांडव, रूह को कुचल कर रहा है।







