जब आप भीतर से जलेंगे, तभी बाहर उजाला करेंगे!

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका

अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, (छ.ग)

 

               (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

लेख 

जब आप भीतर से जलेंगे, तभी बाहर उजाला करेंगे!

                 -सुश्री सरोज कंसारी

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जैसे झरना पत्थरों के बीच से रास्ता बना लेता है, वैसे ही आप भी समस्याओं के बीच से आगे बढ़ें।

 

सामान्य से विशेष बनने के लिए जीवन में कठिन तप की जरूरत होती है। यूं ही कोई महान व्यक्तित्व का धनी नहीं बन जाता। यदि किसी व्यक्ति को देखकर, मिलकर और सुनकर मन में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होने लगे, तो समझिए वह साधारण नहीं है।…जिनका व्यक्तित्व अद्भुत हो, दैवीय गुणों से युक्त हो, जिनके सानिध्य में सुकून मिले, चेहरे पर अलौकिक आभा हो, जिनमें ज्ञान, बल और बुद्धि का अद्भुत समन्वय हो, फिर भी जो सहज-सरल हों — आचरण की सुंदरता और सादगी लोगों को स्वयं ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। सच है, मनुष्य होकर मनुष्यता को प्राप्त कर लेना किसी चमत्कार से कम नहीं। इस संसार की भीड़ से अलग अपने रास्ते बना लेना और आत्म-कल्याण करना मनुष्य का सर्वप्रथम लक्ष्य है। खुद को मजबूत बनाकर परिवार, समाज और राष्ट्रहित में समर्पण ही जीवन को सर्वोत्तम बनाता है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का भाव लेकर जो जीवन में आगे बढ़ते हैं, उनमें असीम शक्ति का संचार होता है। जो सभी के लिए शुभ सोचते हैं और नि:स्वार्थ सेवा-सहयोग करते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि का विकास होता है। मनुष्य जीवन में तेजस्वी व्यक्तित्व बन पाना कठिन हो सकता है, लेकिन असंभव नहीं। अपनी जीवनशैली में नियमित हर दिन कुछ अच्छा करने की आदत डालें। हर दिन हम खुद में सुधार करें, बेहतर बनने के लिए हर दिन प्रयास करें। अपने ज्ञान, बल और बुद्धि का उपयोग सत्कार्यों में कीजिए। तेजस्वी व्यक्तित्व के लिए आंतरिक स्तर पर हमें पवित्र भाव और दृढ़ संकल्प रखना जरूरी है।

 

नकारात्मक विचारों को सकारात्मक भाव से हरा दीजिए। आत्मविश्वास वह शक्ति है जो आपको कभी मायूस नहीं होने देगी। तेजस्वी का अर्थ है — जिनके कार्य, व्यवहार और सोच में पूर्ण पवित्रता हो। जो औरों के जीवन से दुख को कम और खुशी में वृद्धि करें, वही श्रेष्ठ मानव की श्रेणी में आते हैं। जो गम के अंधियारे में भी उम्मीद की लौ जलाने का हुनर रखते हैं, वही तेजस्वी व्यक्तित्व बनकर निरंतर निखरते हैं। जो खुद तकलीफ सहकर भी औरों को प्रेम, करुणा, दया, क्षमा, दान, सांत्वना और मित्रवत व्यवहार देते हैं, वे मनुष्य जन्म को धन्य बना लेते हैं। औरों के लिए अपने सुख का त्याग करना ही मानव का लक्ष्य है। शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से इस सांसारिक जीवन की चुनौतियों का सामना करने की सामर्थ्य जुटाते रहिए। हर दृष्टि से मजबूत बनिए और मद, माया, मोह, लोभ से दूर रहिए। आंतरिक सुंदरता आपके चेहरे पर नई चमक देती है। तेजस्वी व्यक्ति अपने जीवन से संतुष्ट होता है, किसी से कोई तुलना नहीं करता। वह जीवन के पथ पर स्वतंत्र बहता है। किसी से ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट, नफरत या क्रोध नहीं रखता। अपने धुन और दम पर जीवन को दिव्य बनाता है। मन में साहस भरकर निर्भीक होकर चलता है। हर तरह के तनाव से मुक्त होकर मन को शांत कर जीवन के हर क्षण को जीवंत बना लेता है। अपने स्पष्टवादी, मिलनसार, ईमानदार और हंसमुख स्वभाव के कारण लोकप्रिय होता है। तेजस्वी व्यक्तित्व की आंतरिक स्थिति मजबूत होती है।

 

आत्म-संयम के द्वारा वह इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करता है। अंतर्मन की शुद्धता से जीवन सुंदर प्रतीत होता है। तेजस्वी व्यक्तित्व का निर्माण कठिन साधना, संयम और साहस का मार्ग है। जहाँ भीतर के दर्द को सहेजकर, शील, संयम, साहस, संस्कार, सद्व्यवहार, आत्मबल और उत्साह के साथ कर्मठ होकर आगे बढ़ा जाता है। जिनमें गलत को गलत कहने और सही के साथ खड़े होने की ताकत होती है। जिनके विचारों में क्रांति, दिल में असीम प्रेम, और होंठों पर मुस्कान होती है, ऐसे मानव बाधाओं से डरते नहीं। जिनके जीवन का लक्ष्य मानव-हित होता है, जो नि:स्वार्थ कर्म में विश्वास करते हैं। मन में जोश, जुनून और लगन होती है। तेजस्वी व्यक्तित्व में अद्भुत कार्यक्षमता होती है। भीतर असीम शांति होती है। चरित्रवान, कर्मनिष्ठ, आध्यात्मिक, सेवाभावी और समर्पित होते हैं। वे किसी परिस्थिति में विचलित नहीं होते। आँखों में अंगार, अंतस में ज्वाला, और मुट्ठी में तूफान भी रखते हैं। जहाँ अन्याय, शोषण और अत्याचार हो, वहाँ आवाज़ बुलंद कर नव-क्रांति करने की क्षमता रखते हैं।

 

भीड़ का हिस्सा बनना आसान है, पर भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाना तपस्या है। हर युग में कुछ लोग ऐसे हुए हैं जिनका व्यक्तित्व समय की धारा को मोड़ देता है। वे जन्म से विशेष नहीं होते, कर्म से विशेष बनते हैं। उनका जीवन चीख-चीख कर कहता है कि साधारण मिट्टी भी तप जाए तो सोना बन जाती है। सिर्फ़ चेहरे की चमक नहीं, बल्कि आत्मा का प्रकाश है। यह वह दीप्ति है जो संघर्षों की आँधी में भी बुझती नहीं। इतिहास गवाह है कि जिनके भीतर यह तेज जगा, उन्होंने ही युगों को दिशा दी — चाहे वे संत हों, योद्धा हों या समाज-सुधारक। आज का युवा सफलता तो चाहता है, पर तप से कतराता है। हमें समझना होगा कि तेजस्विता बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है। यह भीतर के युद्ध जीतने से मिलती है — अहंकार से, आलस्य से, और स्वार्थ से लड़कर। आइए जानें कि सामान्य से विशेष बनने की यह यात्रा कैसी होती है। याद रखें, तेजस्वी बनना किसी पद का नाम नहीं, अवस्था का नाम है। यह कोई एक दिन का काम नहीं, बल्कि हर दिन खुद को तराशने की कला है। जब हम अपने छोटे-छोटे स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचते हैं, तभी हमारे भीतर वह तेज जन्म लेता है जो युगों तक राह दिखाता है। तेजस्वी व्यक्ति मरकर भी नहीं मरता। उसका विचार, उसका कर्म और उसका चरित्र पीढ़ियों तक प्रेरणा बनता है। विवेकानंद, भगत सिंह, महान वैज्ञानिक कलाम साहब — ये सब शरीर से गए पर तेज से आज भी जीवित हैं। प्रश्न यह है: क्या हम भी ऐसा जीवन जी रहे हैं जो हमारे बाद भी प्रकाश दे…तो उठिए, आज से ही संकल्प लीजिए। हर दिन एक नेक काम, हर दिन एक दुर्गुण का त्याग, हर दिन एक नए ज्ञान का स्वागत। क्योंकि तेजस्विता कोई चमत्कार नहीं, निरंतर अभ्यास का परिणाम है। जब आप भीतर से जलेंगे, तभी बाहर उजाला करेंगे। और यही मनुज जन्म की सार्थकता होती है।

हाथ की लकीरों से बड़ा, हमारा पुरुषार्थ होता है,

नेकी की राह पर चलने वालों का, सदा उत्कर्ष होता है।

कर्म यदि हमारे अच्छे हैं, तो किस्मत चरणों की दासी है,

मन पवित्र और घर में प्रेम हो, तो घर ही मथुरा-काशी है।

 

हर दिन जानबूझकर कुछ अलग करो — सोच में, आदत में, काम में। रोज थोड़ा-सा नया ही आपको भीड़ से अलग पहचान देता है। पवित्र हृदय ही भगवान का असली घर होता है। मंदिर जाने से ज्यादा जरूरी होता है..स्वयं के मन को साफ रखना है।

 

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