सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, छ.ग.
(नया अध्याय, देहरादून)
सत्कर्म की राह: सद्भाव के फूल!
(प्रेरणादायक कविता)
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हर जंग अब ज़िंदगी की, जीत कर दिखलाना है,
राह के हर पत्थर से, संभलकर आगे बढ़ जाना है।
खुशियों की इस कश्ती को, तूफानों से बचाना है,
जीवन के इस पथ पर, अनवरत चलते जाना है।
हर मुश्किल में हौसलों को, बुलंद कर दिखाना है,
मायूस हर चेहरे पर, मुस्कान को वापस लाना है।
गुमसुम सी इस ज़िंदगी में, आशाओं की तरंग भरनी है,
कुंठित हर एक सोच से, अब आगे निकल दिखाना है।
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की, राह पर ही बढ़ते जाना है,
गर्दिशों के इस दौर में भी, हिम्मत अपनी दिखाना है।
एकता और सौम्यता का, परिचय मिलकर दे जाना है,
मुश्किलों में साथ खड़े हो, जग के लिए मिसाल बन जाना है।
जीवन मंज़िल नहीं सफर है, सद्भाव के फूल खिलाना है,
सुख बरसे हर आँगन में, बस सत्कर्म करते जाना है।







