सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका / कवयित्री / शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, देहरादून)
लेख –
जीवन: समस्या नहीं, अनुभव है !
-सुश्री सरोज कंसारी
“कल की फिक्र और बीती बातों को छोड़कर, आज के हर पल को खुशी से जीना ही असली जिन्दगी है।”
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ज्यादा सोचना इंसान को कमजोर बनाता है, इसलिए मन को हमेशा शांत और ठंडा रखें। जो बात आपको दुखी करे, उस पर ध्यान देना तुरंत छोड़ दें, इसी से मन सरल होगा। हमेशा अच्छी बातें सुनें और अच्छे काम करते रहें।
जिन्दगी एक समस्या नहीं,
अपितु एक अनुभव है,
चित्त को सरल कर लो,
यही इसका वैभव है।
तनाव का बोझ छोड़ो,
हर लम्हा जियो,
यही सादगी का सत्य है।
अक्सर हम जीवन को उलझनों की अंतहीन श्रृंखला मान लेते हैं। अपना अधिकांश समय हम भविष्य की चिंताओं को सुलझाने या अतीत की गलतियों को सुधारने में बिता देते हैं। लेकिन जीवन की असली परिभाषा किसी गणितीय सवाल को हल करने में नहीं है। वह हर पल को पूरी गहराई से महसूस करने में छिपी है।
हम जीवन को एक गणित के सवाल की तरह देखते हैं और हर समय उसे हल करने की कोशिश में लगे रहते हैं। इस आपाधापी में हम जीना भूल जाते हैं। वास्तव में, जीवन धूप छांव का एक अद्भुत मेल है। इसमें आने वाली चुनौतियां बाधाएं नहीं, बल्कि सीखने के अवसर हैं।
जीवन सरल है, बस मन को सरल बना लो…जटिलता परिस्थितियों में नहीं, हमारे विचारों में होती है। जब हम इच्छाओं, उम्मीदों और तुलनाओं को कम कर देते हैं, तो जीवन का स्वाभाविक सौंदर्य सामने आने लगता है। सरल मन वह है जो हर पल को बिना शर्त स्वीकार करता है। जैसे ही हम दिखावे और चालाकी का त्याग करते हैं, उलझनें खुद सुलझने लगती हैं और हम सादगी में ही परमानंद पा लेते हैं।
सादगी केवल बाहरी पहनावा या जीवनशैली नहीं है। यह एक मानसिक अवस्था है। अनावश्यक विचारों का त्याग करने से मन में स्पष्टता आती है। यही स्पष्टता बताती है कि वास्तव में महत्वपूर्ण क्या है। तब हमारी ऊर्जा रचनात्मक और प्रेरणादायक कामों में लगती है।
सोचना कम करोगे तो जीना आसान हो जाएगा…ओवरथिंकिंग एक शोर है जो भीतर की शांति को निगल जाता है। हम उस कल की चिंता में आज को खो देते हैं जो अभी आया ही नहीं। कम सोचने का मतलब विचारहीन होना नहीं है। इसका मतलब है व्यर्थ के विचारों को विराम देना। जैसे ही मानसिक विश्लेषण रुकता है, जीवन की छोटी छोटी चीजों में भी गहरा सुकून मिलने लगता है।
हर बात पर कंट्रोल जरूरी नहीं, भरोसा जरूरी है…हम बाहरी हालात, लोगों और नतीजों को काबू में रखने की कोशिश करते हैं। यही तनाव की सबसे बड़ी वजह है। जीवन नदी की तरह है जो अपना रास्ता खुद बनाती है। जब मान लेते हैं कि हर चीज हमारे हाथ में नहीं है, तब हम समर्पण सीखते हैं। अपनी मेहनत और ब्रह्मांड की व्यवस्था पर भरोसा ही असली शांति है। जो हमारे लिए सही है, वह समय आने पर जरूर मिलेगा। बस धैर्य के साथ चलते रहना है।
मन का बोझ छोड़ दो, जीवन खुद बहने लगेगा…शिकायतें, कड़वाहट और पुरानी बातें मन में दबाए रखने से हम खुद भारी हो जाते हैं। यह बोझ तरक्की और खुशी के रास्ते का पत्थर बन जाता है। जैसे ही क्षमा करना और भूलना सीखते हैं, मन हल्का हो जाता है। हल्का मन ही ऊंचाई तक उड़ सकता है। जब पकड़ने की जिद छोड़ देते हैं, तो जीवन एक सुंदर प्रवाह में बहने लगता है और हम हर हाल में सामंजस्य बिठाना सीख जाते हैं।
जीवन को अनुभव मानने का अर्थ है स्वीकार्यता…इसका अर्थ है कि हम असफलता से भी उतना ही सीखते हैं जितना सफलता से। एक यात्री की तरह जो ऊबड़ खाबड़ रास्तों की शिकायत करने के बजाय दृश्यों का आनंद लेता है, हमें भी हर परिस्थिति को सबक मानकर अपनाना चाहिए। जीवन का कोई फाइनल रिजल्ट नहीं है जिसके बाद सब ठीक हो जाएगा। जीवन तो बस अभी और इसी वक्त है। जब हम सुलझाने की जिद छोड़कर जीना शुरू करते हैं, तब समझ आता है कि हर सांस, हर मुलाकात, हर भावना अपने आप में अनमोल है।
इसलिए रुकिए। एक गहरी सांस लीजिए। इस यात्रा का आनंद उठाइए। जीवन जीने के लिए है, सिर्फ सोचने या सुधारने के लिए नहीं होता। सादगी आत्मा का शुद्ध स्वरूप होता है। जीवन को सुलझाने की कोशिश छोड़कर उसे सिर्फ़ सरल बना लीजिए। तब आप पाएंगे कि जिसे आप समस्या समझ रहे थे, वह महज एक भ्रम था। जीवन को हल करने वाला सवाल मत समझें, उसे महसूस करने वाला अनुभव समझना होगा। सादगी और आज में जीना ही असली शांति है।
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