बच्चों के जी का जंजाल बनती जेईई और नीट की परीक्षाएं

Spread the love

 

अंजनी सक्सेना

 

            (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

बच्चों के जी का जंजाल बनती जेईई और नीट की परीक्षाएं

 

 

 

भारत में हर साल 37 लाख से ज्यादा किशोर जेईई और नीट की परीक्षाएं देते हैं। आईआईटी की बीस हजार से भी कम सीटों के लिए 15.3 लाख बच्चे, और मेडिकल की लगभग दो लाख सीटों के लिए 22 लाख से ज्यादा बच्चे बैठते हैं। ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में गणित और जीवविज्ञान पढ़ने वाले बच्चों के लिए ये परीक्षाएं अब योग्यता की कसौटी नहीं, जी का जंजाल बन गई हैं।

सबसे खतरनाक बात यह हो रही है कि अब बच्चों पर सिर्फ पढ़ाई का दबाव नहीं ही नहीं है, साथ ही सामाजिक और प्रशासनिक दबाव भी उन्हें उत्पीड़ित कर रहा है। परीक्षा हॉल में घुसने से पहले ही बच्चे टूट रहे हैं। यहां घुसने से पहले ही सख्ती के नाम पर जो हो रहा है, वो भी गंभीर मानसिक उत्पीड़न ही है। लंबी आस्तीन मना, जूते मना, घड़ी मना, रबर बैंड मना। लड़कियों के झुमके, बालों के क्लिप, नाक की लौंग और तो और उनके अंतर्वस्त्र तक सब उतरवाए जा रहे हैं। 3 घंटे के पेपर से पहले 2 घंटे गेट पर बच्चों को अपराधियों की तरह लाइन में लगाकर चेक किया जा रहा है।

 

जबाब में एनटीए कहता है “चीटिंग रोकने के लिए”। लेकिन सोचिए एक 17 साल के बच्चे या बच्ची के अंडरगारमेंट उतरवाना चीटिंग रोकना है या गरिमा की हत्या? 2024 में नीट का पेपर लीक बिहार-गुजरात से हुआ। बड़े माफिया पकड़े गए पर सजा किसे मिली? गेट पर खड़ी उस बच्ची को जिसकी ब्रा में हुक था या उसे जिसकी पैंट में मैटल का बटन था।

 

इधर एक और दूसरा बिजनेस मॉडल देखिए। कोटा की इकोनॉमी 6,000 करोड़, सीकर की 2,000 करोड़। 2 लाख बच्चे कोटा में, 1.5 लाख सीकर में। फीस है 1.25 लाख से 4.5 लाख सालाना। हॉस्टल-मेस 1.8 लाख अलग। टेस्ट सीरीज 25,000 अलग। कोटा, सीकर ही नहीं आप इंदौर, पटना, लखनऊ, हैदराबाद, बैंगलौर से लेकर सिलीगुड़ी, देवास, भोपाल या और भी किसी भी बड़े से छोटे शहर तक कहीं भी चले जाएं,कोचिंग का यही मॉडल मिलेगा।

 

यहां हर जगह हर कोचिंग का बिजनेस मॉडल भी एक जैसा लेकिन बड़ा शानदार है,11वीं में एडमिशन लो, स्टार बैच, एडवांस बैच, अर्ली बर्ड, रेजोनेंस बैच में बांटो। जो टॉप 500 में आएगा, उसका पोस्टर पूरे शहर में। 10 लाख का चेक पकड़ाते फोटो। बाकी 99.5% बच्चों का हाल कि “तुमसे न हो पाएगा” ये रोज सुनो।

 

2023 में कोटा के एक संस्थान ने 50 करोड़ सिर्फ विज्ञापन पर खर्च किए। उसी साल 26 बच्चों ने जान दी। यानि एक पोस्टर की कीमत 2 करोड़, एक बच्चे की जान फ्री।

 

ड्रॉपर बैच, बच्चों के लिए यह नाम ही गाली है लेकिन कोचिंग वालों के लिए शानदार बिजनेस अवसर। एक साल बर्बाद करने वाले को “ड्रॉपर” बोल दो। 18 साल के बच्चे को लगने लगता है वो “वेस्ट” है। कोचिंग वाले कहते हैं “ड्रॉप मत लो, हमसे पढ़ो तो सेलेक्शन पक्का” लेकिन रिजल्ट कुछ नहीं और अगले साल फिर वही आश्वासन।

 

आमतौर पर माना जाता है कि 12 वीं क्लास में सप्ताह में 35 घंटे पढ़ाई आवश्यक है। यानि प्रतिदिन लगभग पांच घंटे पढ़ना एक बच्चे के लिए पर्याप्त है। लेकिन जेईई और नीट के बच्चों की हालत देखिए। उनका कोचिंग का शेड्यूल ही 70-80 घंटे प्रति सप्ताह है। रोज सुबह 7:30 से दोपहर 1:30 क्लास। 2:30 से 6:30 फिर सेल्फ स्टडी के नाम पर क्लास,कहीं कहीं 7:30 तक भी। रात 8 से 12 होमवर्क, साथ ही आना जाना,नहाना धोना, खाना पीना नतीजे में नींद 5 घंटे से भी कम।

 

इन बच्चों को क्या पढ़ना है,फिजिक्स में 11वीं के 10 चैप्टर और 12वीं के 14 चैप्टर। रोटेशन से क्वांटम तक। केमिस्ट्री में 200 से भी ज्यादा नाम वाले रिएक्शन, 5000 से ज्यादा ऑर्गेनिक कन्वर्जन। बायोलॉजी में 38 चैप्टर, 15,000 से ज्यादा फैक्ट्स। मैथ्स में कैलकुलस से लेकर कॉम्प्लेक्स नंबर तक हर चीज आनी जरूरी है तभी उनका सिलेक्शन होना संभव है एकाध भी चैप्टर इधर उधर हुआ तो साल बरबाद और बच्चों के शब्दों में कहूं तो जिंदगी बरबाद।

 

इधर विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है 14-17 साल के किशोर को 8-10 घंटे नींद चाहिए। लेकिन सच्चाई यह है कि बच्चे ढंग से सो भी नहीं पा रहे हैं। नींद में गणित के फार्मूले और केमिस्ट्री की रिएक्शन चलती रहती हैं। कोटा के 82% बच्चों को इनसोम्निया, 67% को क्रॉनिक हेडेक, 55% को पेट की बीमारी है। दूसरे शहरों में भी जहां बच्चे कोचिंग के जंजाल में फंसे हुए वहां भी कमोबेश यही स्थिति हैं। सत्रह अठारह साल के बच्चों के सिर के बाल उड़ना शुरू हो गये हैं। कारण सबका एक ही है, बढ़ता घनघोर जानलेवा तनाव। खेल,दोस्त,फिल्म सब कुछ उनके लिए “डिस्ट्रैक्शन” है। कोचिंग के मेंटर खुद कहते हैं आपका सबसे अच्छा दोस्त ही आपकी लाइफ खराब कर देगा। यानि दो साल के लिए जिंदगी फ्रीज कर दो। सिर्फ मॉड्यूल, टेस्ट और रैंक यही इन बच्चों का जीवन है। उस पर भी एक दिन तबीयत खराब? ट्रैफिक में फंस गए? नीट मे ओएमआर बबल गलत भर गया या बाथरूम जाना पड़ा तो दो साल की मेहनत खत्म।

 

नीट 2024 का ही हाल देखिए, पेपर लीक के आरोप लगे, 67 बच्चों को 720 में से 720 नंबर मिले। ग्रेस मार्क्स का घोटाला हुआ। एनटीए ने 1563 बच्चों को 20 से 70 नंबर का “टाइम लॉस” का ग्रेस दिया । सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई, री-टेस्ट हुआ। सोचिए उस बच्चे का क्या जो बॉर्डरलाइन स्कोर पर था। पहले ग्रेस से सेलेक्शन हुआ, फिर री-टेस्ट में बाहर। सिस्टम ने 1 महीने में दो बार मारा। पेपर लीक एनटीए की अपनी कमजोरियों और गलतियों से हुआ लेकिन सजा बच्चों को आज भी मिल रही है। तीन बजे से शुरू होने वाले पेपर का रिपोर्टिंग टाइम एक बजे का है। ढ़ाई बजे गेट बंद होंगे लेकिन यदि कोई बच्चा ट्रेफिक में फंस जाए, गाड़ी खराब हो जाए या अकस्मात कोई दुर्घटना भी हो जाए तो सेंटर दो मिनट की भी देरी बर्दाश्त नहीं करेगा। चेकिंग भी जबर्दस्त। सर्दियों में होने वाली जेईई की परीक्षा में जैकेट नहीं,फुल स्लीव नहीं, बड़े बटन नहीं, रुमाल नहीं,जूते नहीं और तो और इस बार बच्चों के पेन तक बाहर फिंकवा दिए गए।

 

बच्चियों के पीरियड्स हों तो 3 घंटे का पेपर,एक घंटे की चेकिंग, बड़े शहरों में समय पर पहुंचने के लिए घर से एक घंटे पहले निकलना और ऐसी स्थिति में परीक्षा हाल से बाथरूम जाने पर 10 मिनट बर्बाद। सेनेटरी पैड चेकिंग के नाम पर लड़कियों को शर्मिंदा किया जाना यानि प्रताड़ना की पराकाष्ठा।

 

एनटीए का तो कहना ही क्या। जेईई की एक परीक्षा अनेक सेशन्स में प्रतिदिन दो शिफ्ट में होती है। हर दिन और हर शिफ्ट में अलग पेपर,किसी दिन पेपर सरल तो किसी दिन बहुत कठिन लेकिन कहा जाता है कि रिजल्ट नार्मलाइज करके पर्सेंटाइल दिए जाते हैं। कठिन और सरल पेपर को कैसे एक समान किया जाता है यह तो बच्चों को तो क्या उनके अभिभावकों को भी समझ में नहीं आता। इसी वर्ष पांच अप्रैल की दूसरी शिफ्ट के पेपर की एनटीए ने जो प्रोविजनल आंसर की जारी की उसमें 19 प्रश्नों के उत्तर गलत थे। घबराए बच्चों ने आनंस की को चैलेंज किया। इसके लिए भी एनटीए ने प्रति प्रश्न दो सौ रुपए की फीस रखी हुई थी। जो संस्था नंबर और पर्सेंटाइल दशमलव के बाद भी सात अंको (जैसे 98.3379764) में देती है, उसकी यह गलती तो अक्षम्य अपराध की श्रेणी में मानी जानी चाहिए। यह सिर्फ एक शिफ्ट का उदाहरण है,अन्य शिफ्टों में भी ऐसी समस्याएं सामने आयी हैं।

 

भारत में आईआईटी और एम्स के अलावा 1,000 से ज्यादा टॉप इंजीनियरिंग कॉलेज, 500 से ज्यादा टॉप मेडिकल कॉलेज तो हैं ही साथ ही लगभग हर शहर में ढ़ेरों इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेज हैं। इनके अलावा अन्य सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों विषयों के कॉलेज और यूनिवर्सिटी हैं लेकिन कोचिंग वालों ने बच्चों के मन में बैठा दिया है कि “जेईई नहीं तो कुछ नहीं, नीट नहीं तो कुछ नहीं”। उन्होंने बीए,बीएससी, रिसर्च, एग्रीकल्चर, डिजाइन, लॉ, सब कुछ बच्चों की नजरों में कमतर बना दिया है। कुल मिलाकर इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों के बड़े बड़े पैकेजों को महिमामंडित करके बच्चों को बरगलाने की मुहिम जमकर चल रही है।

बदलाव प्रकृति का नियम है। यहां भी बदलाव की गहन गंभीर आवश्यकता है। साल में तीन बार नीट की और चार बार जेईई की परीक्षा हो सकती है, जिनका बेस्ट स्कोर काउंट हो। एक दिन की किस्मत पर जिंदगी दांव पर नहीं लगनी चाहिए। कई बार खेलों में बड़े बड़े दिग्गज खिलाड़ी एक दिन कुछ नहीं कर पाते और अगले दिन सफलता का परचम लहरा देते हैं। क्रिकेट में ही देख लीजिए, एक खिलाड़ी कभी कभी शून्य पर भी आउट हो जाता है लेकिन अगली बार वही खिलाड़ी शतक भी मार देता है।

 

चेकिंग के नाम पर बच्चों का उत्पीड़न और समय की बर्बादी को भी रोकना जरूरी है। बच्चों से परीक्षा फीस जमकर ली जा रही है तो सेंटर पर मैटल डिटेक्टर भी लगाए जा सकते हैं। मोबाइल जैमर तो लग ही रहे हैं।

 

बेतहाशा बढ़ती कोचिंग पर लगाम लगाना और स्कूल की महत्ता पुनर्स्थापित करना भी आवश्यक है। जेईई,नीट में यदि अधिक वेटेज 12वीं बोर्ड को दिया जाए तो कोचिंग की समानांतर व्यवस्था और बच्चों पर बेतहाशा मानसिक दबाव की समस्या रोकी जा सकती है।

 

जेईई और नीट बच्चों के लिए जरूरी हैं लेकिन बच्चों से ज्यादा जरूरी नहीं हैं। आज जिस तरह से ये परीक्षाएं हो रही हैं वो एंट्री एग्जाम नहीं, एंट्री गेट पर ही एग्जीक्यूशन है।

 

अंडरवियर चेक करने वाला सिस्टम, पेपर लीक रोक नहीं पाता, पेपरों में गलतियां नहीं रोक पाता, सब बच्चों का एक साथ एक समान पेपर नहीं करवा पाता। 5 लाख फीस लेने वाली कोचिंग, एक साइकेट्रिस्ट नहीं रख पाती। “बेटी बचाओ” का नारा देने वाली सरकार के नियम बेटी को एंट्री गेट पर कपड़े बदलने के लिए मजबूर कर देते हैं। इन व्यवस्थाओं को बदलना जरूरी है ताकि देश का भविष्य सुंदर और सुखद भारत की परिकल्पना को साकार करते हुए स्वयं का जीवन भी संतुष्टि पूर्वक जी सके।

(विभूति फीचर्स)

  • Related Posts

    भाजपा कार्यकर्ताओं ने संजीव कांकर के प्रथम आगमन पर किया जोरदार स्वागत।

    Spread the love

    Spread the love      ब्यूरो  भिंड : नया अध्याय     भाजपा कार्यकर्ताओं ने संजीव कांकर के प्रथम आगमन पर किया जोरदार स्वागत।            भिंड…

    शाश्वत नाम तुम्हारा

    Spread the love

    Spread the love  विरेन्द्र जैन माहिर  नागपुर महाराष्ट्र                (नया अध्याय, देहरादून)     शाश्वत नाम तुम्हारा   मुझ अनगढ़ माटी को भी इंसानी…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    खोजी पत्रकारिता के स्वर्णिम काल की अनूठी मिसालः1980

    • By User
    • May 10, 2026
    • 15 views
    खोजी पत्रकारिता के स्वर्णिम काल की अनूठी मिसालः1980

    भाजपा कार्यकर्ताओं ने संजीव कांकर के प्रथम आगमन पर किया जोरदार स्वागत।

    • By User
    • May 9, 2026
    • 4 views
    भाजपा कार्यकर्ताओं ने संजीव कांकर के प्रथम आगमन पर किया जोरदार स्वागत।

    शाश्वत नाम तुम्हारा

    • By User
    • May 9, 2026
    • 18 views
    शाश्वत नाम तुम्हारा

    माँ की ममता

    • By User
    • May 9, 2026
    • 6 views
    माँ की ममता

    अपराध नियंत्रण की दिशा में सशक्त पहल: कन्नौज में अपराध गोष्ठी का किया गया आयोजन।

    • By User
    • May 9, 2026
    • 19 views
    अपराध नियंत्रण की दिशा में सशक्त पहल: कन्नौज में अपराध गोष्ठी का किया गया आयोजन।

    ”जागो व बढ़ो!” (कविता)

    • By User
    • May 9, 2026
    • 14 views
    ”जागो व बढ़ो!” (कविता)