सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका, कवयित्री एवं शिक्षिक
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा (राजिम)
रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, देहरादून)
लेख –
बीता कल एक सीख, आज एक उपहार!
-सुश्री सरोज कंसारी
वर्तमान क्षण में जीना ही जीवन का असली सार है! बीते कल व आने वाले कल की चिंता आज की खुशी छीन लेती है; वर्तमान में पूरी तरह सजग रहना ही सच्ची शांति है।
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ये जिंदगी न तो बीते हुए कल में है, न आने वाले कल में। ज़िंदगी सिर्फ ‘अभी’ में है। कल की बातों को पछतावे की तरह ढोते रहने से अच्छा है कि उनसे सीख लो और आगे बढ़ जाओ। तभी हम आज की ताकत को पूरी तरह जी पाएंगे। मन की सच्ची शांति और खुशी सिर्फ इसी बात में है कि हम ‘आज’ के प्रति जागरूक रहें। अतीत का अर्थ सिर्फ़ बीता हुआ कल नहीं है, बल्कि वह अनुभवों का एक संग्रह है। अक्सर हम अपनी पिछली गलतियों या दुखों से चिपक जाते हैं और उन्हें ढोते रहते हैं, जिससे वर्तमान की गति धीमी हो जाती है। सच तो यह है कि जो बीत गया, वह पत्थर की लकीर है जिसे मिटाया नहीं जा सकता, लेकिन उसे पढ़कर सीखा जरूर जा सकता है। हमारे साथ जो हुआ, वह हमारे नियंत्रण में नहीं था, लेकिन उस अनुभव को ‘सीख’ बनाकर आज को ‘संवारना’ पूरी तरह हमारे हाथ में है।
अतीत को बोझ की तरह पीठ पर मत लादिये, बल्कि उसे एक पायदान (सीढ़ी) की तरह इस्तेमाल कीजिए ताकि आप वर्तमान के धरातल पर और मजबूती से खड़े हो सकें। जब हम बीते कल को पकड़ना छोड़ देते हैं, तभी हमारे हाथ आज के अवसरों को थामने के लिए खाली और स्वतंत्र होते हैं।
बीता कल बस सीख है, बोझ न उसको मान,
पत्थर की लकीरों से, अब मत कर अभिमान।
आज है कोरा कागज, लिख दे कर्म महान् ,
‘अभी’ में ही जीवन है, यही सच्चा ज्ञान।
याद रखें…अतीत को पछतावे की तरह ढोने के बजाय उससे सिर्फ सीख लें, और यह समझना होगा कि ये जिंदगी का असली मौका सिर्फ ‘आज’ और अभी है। अपने कर्मों से आज को इतना सुंदर बना दो कि यही पल तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत और शांति बन जाए।…साधना आज को संवारने की करना! हमारा आज एक कोरे कागज की तरह है, जिस पर हम अपने कर्मों की नई इबारत लिख सकते हैं। बीते कल की कड़वाहट को आज के अमृत में घोलना बंद करना होगा।
जब हम कहते हैं कि ‘आज हमारे हाथ में है’, तो इसका अर्थ है कि हमारे पास अपनी ऊर्जा को सही दिशा देने का अवसर है। आज को संवारना ही वास्तव में स्वयं को संवारना है। जो बीत चुका है, उसे स्वीकार कर लेना ही बुद्धिमानी है, और जो सामने है, उसे पूरी शुद्धता और प्रेम से जीना ही महानता है।
वर्तमान में जीना केवल एक विचार नहीं होता, बल्कि ये एक साधना है। यह एक ऐसी कला है…जिसमें हम हर सांस के प्रति कृतज्ञ होते जाते हैं। जब मन अतीत के गलियारों से बाहर निकलकर वर्तमान के आंगन में आता है, तो जीवन एक बोझ नहीं बल्कि एक उत्सव लगने लगता है। हमारी शांति इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हमारे साथ अतीत में क्या हुआ, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि हम आज किस चेतना के साथ खड़े हैं।
जीवन की सार्थकता इसी पल में छिपी है। अतीत की राख से अनुभव चुनिए, भविष्य के लिए संकल्प लीजिए, लेकिन जिए सिर्फ ‘आज’ में। वर्तमान ही वह सेतु है जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से जोड़ता है। आइए, बीते कल की जंजीरों को तोड़कर, आज के इस सुनहरे अवसर को पूरी पवित्रता के साथ गले लगाएं। अतीत को पीछे छोड़, वर्तमान को गले लगाएँ; क्योंकि यहीं जीवन का असली सार और सच्ची शांति छिपी है। वर्तमान…जहाँ शांति और सजगता का मिलन होता है।
दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो समय एक निरंतर बहती धारा है, जिसमें ‘कल’ और ‘परसों’ केवल मन की कल्पनाएँ हैं। वास्तविकता केवल ‘अभी’ है। जब हम अतीत के अनुभवों को बोझ की तरह ढोना छोड़कर उन्हें केवल ज्ञान के प्रकाश की तरह देखते हैं, तो हमारी चेतना मुक्त हो जाती है। वर्तमान में जीना केवल समय का प्रबंधन नहीं, बल्कि आत्मा का जागरण है। यह बोध कि ‘मैं यहाँ हूँ और यह क्षण पूर्ण है’, हमें उस शाश्वत शांति से जोड़ता है जिसे दुनिया की कोई भी भौतिक वस्तु नहीं दे सकती। संवार लीजिए अपना आज, क्योंकि यही वह एकमात्र क्षण है जहाँ आप वास्तव में जीवित हैं।
इसी पल में जीना। कल की चिंता और आने वाले कल का डर, आज की खुशी छीन लेते हैं। अगर मन को शांति चाहिए, तो पूरी तरह ‘आज’ में ही रहना सीखो।
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