देश के सामने एनटीए के रुप में व्यापमं का राष्ट्रीय संस्करण

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अंजनी सक्सेना

 

        (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

नीट पेपर लीक

 

 

देश के सामने एनटीए के रुप में व्यापमं का राष्ट्रीय संस्करण

 

 

आखिर वही हुआ जिसका डर था। देश के लाखों बच्चे एक बार फिर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी(एनटीए) की लापरवाही के कारण पुनः गंभीर मानसिक तनाव और शैक्षणिक उत्पीड़न झेलने के लिए विवश हैं। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने 3 मई को हुई नीट की परीक्षा पेपर लीक होने के बाद अब रद्द कर दी है। अब इस परीक्षा में शामिल हुए सभी बच्चों को यह परीक्षा दोबारा देना होगी।

भारत जैसे देश में, जहाँ एक साधारण परिवार का बच्चा वर्षों तक अपनी आँखों में डॉक्टर बनने का सपना संजोता है, सारे परिवार की आशा और आकांक्षाएं नीट पर टिकी होती हैं। वहां परीक्षा की शुचिता भंग हो चुकी है। यह सिर्फ एक पेपर लीक का मामला नहीं बल्कि एक पूरी पीढ़ी के आत्मविश्वास की हत्या जैसा है। नीट (NEET UG 2026) के ताजा घटनाक्रमों ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

केरल, हरियाणा, राजस्थान से लेकर उत्तराखंड तक लीक पेपर का वाट्सएप पर बंट जाना चीख-चीख कर कह रहा हैं कि यह बिना अंदरूनी मिलीभगत के संभव नहीं है। ऐसा लग रहा है कि हमारे देश में अनजाने में ‘व्यापमं’ (VYAPAM) जैसे किसी भयानक जिन्न को राष्ट्रीय स्तर पर पाला जा रहा हैं? लाखों छात्रों के भविष्य और उनकी मानसिक प्रताड़ना को लेकर किसी की चिंता नहीं है। बच्चों को घंटों पुलिस थाने में बिठाकर पूछताछ हो रही है,तब अनिवार्य हो गया है कि बच्चों को पेपर किसने भेजा के बजाए पेपर कहां से और किसकी लापरवाही से लीक हुआ इसकी जांच की जाए। एनटीए की भूमिका, औचित्य और ईमानदारी पर भी ईमानदारी से ही प्रश्न पूछे जाएं।

​ मध्य प्रदेश का व्यापमं घोटाला स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े शिक्षा घोटालों में से एक था। इसी घोटाले के बाद प्रवेश परीक्षाओं में अनियमितता, भ्रष्टाचार और लापरवाही को रोकने के लिए एनटीए को प्रवेश परीक्षाएं कराने की जिम्मेदारी दी गयी थी। यदि हम व्यापमं की कार्यशैली और वर्तमान में एनटीए के तहत हो रही गड़बड़ियों की तुलना करें, तो पैटर्न डरावने हद तक समान नजर आता है।

​          व्यापमं में भी एक राज्य से दूसरे राज्य तक फैले बिचौलिये सक्रिय थे। नीट 2026 में भी हम देख रहे हैं कि केरल में बैठा एक छात्र राजस्थान के सीकर में पेपर सप्लाई कर रहा है। यह अंतर्राज्यीय जाल बिना किसी संगठित सिंडिकेट के नहीं चल सकता।

​           व्यापमं में अधिकारियों और प्रिंटिंग प्रेस की मिलीभगत से पेपर बाहर आते थे। नीट के मामले में भी, जिस तरह से बायोलॉजी और केमिस्ट्री के प्रश्नों का क्रम तक नहीं बदला और हाथ से लिखे 150 सवाल हूबहू मैच कर गए,उससे यह आशंका प्रबल हो रही है कि सेंधमारी ‘सोर्स’ (Source) पर ही हुई है। व्यापमं की जांच भी सीबीआई ने की और उसकी जांच में सालों लग गए क्योंकि उसमें सफेदपोशों के हाथ थे। एनटीए की चुप्पी भी इसी आशंका को बल देती है कि कहीं रक्षक ही तो भक्षक नहीं बन गए? अभी तक जो जानकारियां मिली हैं उनके अनुसार पेपर लीक के इस मामले में कई लोगों से पूछताछ हो रही है जिनमें अनेक बच्चे भी शामिल हैं लेकिन एनटीए (जिस पर परीक्षा कराने की पूरी जिम्मेदारी है) के किसी भी अधिकारी से किसी भी तरह की पूछताछ की कोई बात सामने नहीं आयी है।

​नीट 2026 में लगभग 22 लाख छात्र शामिल हुए। इनमें से अधिकतर वे हैं जो अपनी मेहनत के दम पर 600-650 का आंकड़ा छूने का प्रयास करते हैं। लेकिन जब परीक्षा से कई दिन पहले ही बाजार में 600 नंबर के सवाल के 150 प्रश्न व्हाट्सएप पर Forwarded many times के टैग के साथ घूम रहे हों, तो योग्यता का दम घोंटना तो तय ही है।

​. सीकर में जिस तरह से एक मई को ही पेपर पहुँच गया था, उसने तकनीकी सुरक्षा के एनटीए के दावों की हवा निकाल दी है। एनटीए कहता है कि उनके पास 5 जी जैमर्स और बायोमेट्रिक्स हैं, जैमर से वे व्हाट्सएप को परीक्षा केंद्र के अंदर आने से तो रोक लेते हैं, लेकिन जो प्रश्न पेपर होने से आठ दिन पहले ही वाट्सएप की दुनिया में फारवर्ड होने लगे हों उसे रोकने की एनटीए ने क्या व्यवस्था की उसकी जानकारी किसी को नहीं है।

​          यह तो जग जाहिर है कि ​किसी भी संस्थान में भ्रष्टाचार तब तक जड़ नहीं जमाता जब तक कि शीर्ष पर बैठे लोग अपनी आँखें मूंद न लें या खुद उस भ्रष्टाचार का हिस्सा न बन जाएं। अब समय आ गया है कि एनटीए के कर्ताधर्ताओं पर भी शक की सुई घुमायी जाए। उनकी संपत्ति और उनके जीवन स्तर (लाइफ स्टाइल) की गहन जांच की जाए। एनटीए के उन तमाम अधिकारियों की पिछले 5 वर्षों की चल-अचल संपत्ति का ऑडिट होना चाहिए, जो परीक्षा प्रक्रिया, पेपर सेटिंग और प्रिंटिंग प्रेस के चयन से जुड़े हैं। अधिकारियों के रिश्तेदारों, नौकर चाकरों और उनके बिजनेस पार्टनर्स के बैंक खातों की जांच होनी चाहिए। अक्सर भ्रष्टाचार का पैसा सीधे खातों में न जाकर ‘बेनामी’ रास्तों से घूमता है।

​        राजस्थान एसओजी (SOG) जिस तरह से संदिग्धों के कॉल लॉग्स खंगाल रही है, बच्चों से पूछताछ कर रही है, उसी तरह एन टी ए के आंतरिक तंत्र के डिजिटल संचार की भी फॉरेंसिक जांच होनी चाहिए।

​             ​अक्सर एनटीए जैसी संस्थाएं यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि यह सिर्फ एक “गेस पेपर” था जो संयोग से मिल गया। लेकिन 180 में से 150 सवालों का हूबहू मिलना, वह भी उसी क्रम में, सांख्यिकीय रूप से तो असंभव है और यही अनेक आशंकाओं, कुशंकाओं को जन्म दे रहा है। अप्रैल से ही पेपर का मार्केट में होना और एनटीए का 7 मई तक बेखबर रहना उनकी अक्षमता को तो स्पष्ट रुप से दर्शाता है।

​नेशनल टेस्टिंग एजेंसी का गठन एक ‘ऑटोनॉमस’ और ‘ट्रांसपेरेंट’ संस्था के रूप में किया गया था लेकिन आज यह संस्था खुद एक बोझ और विवाद का केंद्र बन गई है। जब तक हर दोषी सलाखों के पीछे नहीं पहुँचता, तब तक देश का युवा इस व्यवस्था पर भरोसा नहीं करेगा। ​अगर आज एनटीए को व्यापमं बनने से नहीं रोका गया, तो भारत की चिकित्सा और शिक्षा व्यवस्था की नींव ढह जाएगी। 22 लाख बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले हर व्यक्ति, चाहे वह कोई कोचिंग संचालक हो,पीजी संचालक हो, प्रिंटिंग प्रेस का कर्ताधर्ता हो या एनटीए के अंदर बैठा कोई विभीषण, उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

​जांच केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसका रुख उन वातानुकूलित कमरों की तरफ भी मुड़ना चाहिए जहाँ ये साजिशें रची जाती हैं। देश को ‘क्लीन नीट’ चाहिए, ‘दागी एनटीए’ नहीं ताकि देश में भगवान का दर्जा प्राप्त डॉक्टर सदैव अपनी गरिमा बनाए रख सके अन्यथा ऐसे एनटीए से नीट पास करने वाले भविष्य के डॉक्टरों की ईमानदारी पर सदैव प्रश्न चिन्ह लगा रहेगा।        (विभूति फीचर्स)

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