डॉ0 हरि नाथ मिश्र
पूर्व विभागाध्यक्ष-अँगरेजी,
का0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
अयोध्या, (उ0प्र0)
(नया अध्याय, देहरादून)
राणा प्रताप (16/14)
चढ़ चेतक राणा प्रताप ने,
जलवा खूब दिखाया था।
दिखा-दिखा अपना रण-कौशल-
अरि को मजा चखाया था।।
जहाँ लगीं थीं तोपें रण में,
मुग़ल सैनिकों की भारी।
हय-दल, गज-दल, पैदल सैनिक,
सब थे अस्त्र-शस्त्र-धारी।
मुट्ठी भर सैनिक प्रताप ले-
सबको खूब छकाया था।।
अरि को मजा चखाया था।।
बन वनवासी सूखी रोटी,
खा घासों की रहे सदा।
राज-भोग-सुख से रह वंचित-
कर्ज भूमि का किए अदा।
यहाँ दिखे, पुनि वहाँ दिखे वह-
चेतक नाच नचाया था।।
अरि को मजा चखाया था।।
तनी मूँछ ले कर में भाला,
राणा की छवि प्यारी थी।
लगे वीर-रस चढ़ चेतक पर,
स्वयं ही की सवारी थी।
रहे सुरक्षित लाज देश की-
निज सुख-चैन गवाँया था।।
अरि को मजा चखाया था।।
हल्दी-घाटी महा समर का,
रचा एक इतिहास अमर।
युगों-युगों की यही प्रेरणा,
ले साहस-बल-तेज प्रखर।
इसी वीर मेवाड़-ललन ने-
सिर को नहीं झुकाया था।।
अरि को मजा चखाया था।।
जलवा खूब दिखाया था।।






