अपराधिक घटनाओं में जातीय विद्वेष की राजनीति

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डॉ. सुधाकर आशावादी

 

 

                     (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

दृष्टिकोण

अपराधिक घटनाओं में जातीय विद्वेष की राजनीति

 

 

देश में आजकल जातीय विघटन की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए षड्यंत्रकारी शक्तियां सक्रिय हैं। यदि ऐसा न होता, तो उत्तरप्रदेश में अपराधिक घटनाओं में पीड़ित व अपराधी की जाति खोजकर जातीय वैमनस्य फ़ैलाने के प्रयास न किए जाते। पुलिस, प्रशासन एवं न्यायपालिका के प्रति अविश्वास व्यक्त करने के नाम पर सड़कों पर धरना प्रदर्शन करके मार्ग अवरुद्ध करके जन जीवन को अस्त व्यस्त करने का दुस्साहस न किया जाता। जाति आधारित राजनीति करने वाले तत्व हर अपराधिक घटना को जातीय आधार पर भुनाने और अपनी राजनीति चमकाने के लिए भीड़ को उकसाकर अराजकता उत्पन्न न करते। बहरहाल कुछ लोगों का कार्य ही प्रत्येक घटना में जातीय नजरिया खोजना है।

ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहाँ प्रेम प्रसंगों में हुई अपराधिक वारदातों को दलित उत्पीड़न से जोड़कर समाज में जातीय वैमनस्य फ़ैलाने का प्रयास किया गया। पुलिस द्वारा अपराधी को गिरफ्तार किये जाने पर भी संबंधित पीड़ित परिवार को जातीय विघटनकारी तत्वों ने उकसाया। बाहरी तत्वों ने धरना प्रदर्शन की आड़ में अपने अपने मनसूबे पूरे करने के प्रयास किए। जब पुलिस ने उनके आपराधिक इतिहास को खंगाल कर उनके विरुद्ध कार्यवाही की, तब ऐसे तत्वों के समर्थन में वह स्वयंभू लोग आ गए, जिनका कार्य ही केवल जातिगत राजनीति करके अपना सियासी कद ऊँचा करना है।

विडंबना यह है कि समाज द्वारा नकारे गए सियासी तत्व कभी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक कार्ड खेलकर और कभी समाज में सवर्ण कहे जानी वाली जातियों के विरुद्ध विषवमन करने से नहीं हिचकती। कुछ लोगों का कार्य ही ऐसे अवसरों की तलाश करना रह गया है, कि जिनमें वह अपना राजनीतिक स्वार्थ ढूंढ सकें। उन्हें समाज के सभी वर्गों के अपराधियों के प्रति पुलिस प्रशासन का समान रवैया नहीं दिखाई देता, उन्हें केवल एक ही जाति के अपराधियों के प्रति की जाने वाली कार्यवाही दलित उत्पीड़न दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश के मेरठ में किसी आंदोलन में अपनी राजनीति चमकाने आए कुछ बाहरी तत्वों को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा सबक सिखाए जाने पर संबंधित अधिकारी पर जातिगत आरोप लगाए गए, जिससे लगता है, कि जातीय विद्वेष की जड़ें इतनी गहरी हो गई हैं, कि पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को भी जातीय संकीर्णता के दायरे में लाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है, जिस पर गंभीर रूप से चिंतन किया जाना अनिवार्य है। यदि पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों तथा अपराधियों के जातिगत आधार पर विरोधस्वरूप धरना प्रदर्शन किए जाने लगे तो निसंदेह अराजकता को बढ़ने से रोकना असंभव होगा। सो इस संबंध में जनजागरूकता अभियान चलाये जाने आवश्यक हैं। यही नहीं कानून से खिलवाड़ करने वाले तत्वों के विरुद्ध न्यायसंगत कठोर कार्यवाही की जाने अपेक्षित है, अन्यथा अराजक तत्व हर समय प्रत्येक अपराधिक घटना को जातीय आधार पर भुनाने का षड्यंत्र रचते ही रहेंगे, जिन पर समय से लगाम लगाया जाना सरल नहीं होगा।

    (विनायक फीचर्स)

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