गुरुकुल शिक्षा प्रणाली

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डा. शीला डागा

हरिद्वार, उत्तराखण्ड

 

 

                     (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली: यह एक आवासीय विद्यालय होता है, जहां प्रारंभ से ही बालक को श्रमपूर्वक जीने का अभ्यास हो जाता है। प्राकृतिक वातावरण में वह सर्दी, गर्मी, वर्षा सभी का स्वागत करते हुए जीवन की कठिनाइयों में साहसपूर्वक जीने का अभ्यास भी कर लेता है। आश्रम के नियम पालन के अनुशासन एवं गुरुजनों के सान्निध्य में सदाचार, गुरुजनों का सम्मान, शिष्ट आचरण आदि की शिक्षा और संस्कार प्राप्त करता है। सांसारिक ऊहापोहों से दूर उसको अध्ययन के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और वह विद्या की अनेक शाखाओं की शिक्षा, जो भी उसे दी जा रही हों, सरलता से ग्रहण कर लेता है।

 

गुरुकुल में बहुत छोटी आयु में ही आकर किशोरावस्था तक रहते हुए वह मानसिक विकृतियों से बचा रहता है, क्योंकि निरन्तर कर्मशील रहने में उसका ध्यान अनावश्यक विषयों में नहीं भटकता है। आयु का यही समय बालक में संस्कार डालने का होता है। ये संस्कार भावी जीवन में भी उसके साथ चलते रहते हैं।

 

अपने से छोटे बड़े एवं समवयस्क साथियों के साथ दीर्घ अवधि तक रहने के कारण उसमें सहनशीलता, त्याग, बांटकर खाना, परस्पर सहयोग आदि गुण तो समाविष्ट होते ही हैं, साथियों की भिन्न भिन्न प्रकृति – स्वभाव के प्रति समझ भी विकसित हो जाती है। इससे अपने परिवार, समाज में सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई नहीं अनुभव करता।

 

        60 राजपुर रोड, देहरादून में स्थित कन्या गुरुकुल महाविद्यालय ऐसी ही एक सौ वर्ष पूर्व स्थापित संस्था है। 

 

स्वामी दयानंद सरस्वती की प्रेरणा से, स्वामी श्रद्धानंद एवं आचार्य रामदेव जी के प्रयासों से आर्यसमाज ने नारी शिक्षा को अति महत्वपूर्ण मानते हुए इस संस्था की स्थापना सर्वप्रथम इन्द्रप्रस्थ, दिल्ली में 1923 में की थी। गुरुकुल का वातावरण प्राकृतिक होना चाहिए, इस विचार से इसे 1927 में देहरादून में लगभग 50 बीघा भूमि स्थानांतरित कर दिया गया। सन् 1953-54 में दान में मिली भूमि सहित यह परिसर 80 बीघा का हो गया।

 

यह संस्था नारी शिक्षा अप्रतिम केंद्र रही है। बहुत कम शुल्क लेकर यहां के पाठ्यक्रम में प्राचीन विषयों- वेद, उपनिषद्, गीता, दर्शनशास्त्र आदि संस्कृत भाषा के ग्रंथों के साथ साथ हिंदी, अंग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, गणित, राजनीति शास्त्र, सामान्य ज्ञान तथा पाककला, सिलाई-कढ़ाई और क्लासिक संगीत, योगासन भी सम्मिलित है किये गए। साथ ही बहुत प्रकार के खेल-कूद एवं सभी प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियों लोक नृत्य, नाटक, वाद-विवाद आदि में भी यहां की छात्राएं जिला स्तर पर प्रतियोगिताओं में भाग लेती रहीं और बहुत सारे ईनाम भी लेकर आती रहीं। आजकल मार्शल आर्ट भी सिखाई जा रही है। एक बड़ा खेल का मैदान भी है।

 

समय के साथ व्यय बढ़ता गया और दानदाता नहीं पहुंचे तो आज इस संस्था के भवन जीर्ण हो गए हैं। प्रारंभिक सुविधाओं की स्थिति भी जीर्णता पर है। इस कारण कोरोना काल में बंद हो जाने के बाद छात्राओं की संख्या भी बहुत कम हो गई है।

 

यहां से शिक्षा प्राप्त पुरानी स्नातिकाओं (ग्रेजुएट) का ध्यान इस ओर गया तो अब स्नातिका संघ बनाकर, इसके ट्रस्ट को न्यायालय में पंजीकृत करवाकर इस संस्था के जीर्णोद्धार के लिए कृत संकल्प हो गई हैं।

स्नातिका संघ की 1960 से आगे की लगभग 100 सदस्याएं बन गई हैं। ट्रस्ट में सात सदस्याएं निम्नलिखित हैं :— 

अध्यक्षा – डॉ. शीला डागा। 1962 में विद्यालंकार। पूर्व प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय।

सचिव – योगाचार्य कु. रीता गुप्ता विद्यालंकार। ये डाइटीशियन भी हैं।

कोषाध्यक्ष – सुश्री इंदु डोब्रियाल विद्यालंकार। एम् ए हिंदी संस्कृत, भी एड। केंद्रीय विद्यालय से प्राचार्या पद से अवकाश प्राप्त।‌ 

डॉ. अतिमा बी ए एम एस।

सुश्री हेमलता विद्यालंकार

कु. मीनू सोनी विद्यालंकार, अधिवक्ता( एडवोकेट)

 

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