डॉ0 हरि नाथ मिश्र
(पूर्व विभागाध्यक्ष-अंग्रेजी)
का0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
अयोध्या, (उ0प्र0)
(नया अध्याय, देहरादून)
भ्रमित मन
साँझ (अतुकांत)
सूर्यास्त के समय जब होती है साँझ,
ठिठुर सा जाता है अंधकार के भय से,
यथार्थ से अनभिज्ञ मन-
नादान, बेखबर पंछी की भाँति,
जो फँस जाता है अचानक-
बाज़ के चंगुल में।
चीख उठता है,
चिल्ला उठता है-अंधकार की चपेट से,
मूरख मन…।।
इसे आभास नहीं अपनी नियति का,
यदि संज्ञान है भी तो….,
बन जाता है जैसे अनजान।
रोज सीखता है,रोज भूल जाता है,
निश्चेष्ट,निरुत्साही, ठगा सा,कटा सा-
यह कंपित मन…..।।
इसे रहती है तालाश हर पल,
शायद किसी चराग़ की।
ऐसे चराग़ की जो कभी बुझे नहीं।
भला,ऐसा कभी हो सकता है कि-
चराग़ जले और बुझे नहीं!
जान ले रे भ्रमित मन….।।
चराग़,अंधकार के क्षणिक लोप का-
है एक पल।
और है भी तो है शायद एक दिखावा-
है एक छल।
एक मृगतृष्णा है-चमकती जल-बूँदों सी,
जलती रेतों की।
देख ले रे चकित मन….।।
वस्तुतः अंधकार ही तो होता है-
उद्गम-स्थल प्रकाश का-
जैसे निशि-तम से भानु-प्रकाश का
उदीयमान होना शुभ प्रभात के साथ।
समझ ले रे विकल मन।।







