श्री चैतन्य महाप्रभु और जगन्नाथजी की रथयात्रा

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अंजनी सक्सेना

 

 

             (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

श्री चैतन्य महाप्रभु और जगन्नाथजी की रथयात्रा

 

 

 

पिछले पांच सौ वर्षों से जिस एक नाम की गूंज बंगाल की गलियों से लेकर वृंदावन की कुंज गलियों तक और पुरी के समुद्र तट से लेकर विश्व भर में सुनाई दे रही है, वह है “हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे”। इस महामंत्र और हरिबोल संकीर्तन को घर-घर तक पहुंचाने वाले संत थे श्री गौरांग महाप्रभु, जिन्हें जगत श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में पूजता है।

वैष्णव परंपरा में अवतारी पुरुष और समाज को नई दिशा देने वाले संत को महाप्रभु कहा जाता है। जैसे श्रीमद् वल्लभाचार्य जी महाराज वल्लभ महाप्रभु कहलाए, उसी तरह बंगाल के नदिया में जन्मे विश्वम्भर अपने दूध जैसे गौर वर्ण के कारण गोरा और गौरांग नाम से पुकारे गए। संन्यास लेने के बाद उनका नाम श्रीकृष्ण चैतन्य पड़ा, पर लोक में वे चैतन्य महाप्रभु बनकर अमर हो गए।

शरीर पर न जनेऊ का बोझ, न पंडिताई का अहंकार। सिर पर शिखा, गले में तुलसी की माला, हाथ में करताल और मुख पर कृष्ण नाम। ढोलक-मंजीरे की थाप पर वे नाचते, गाते और रोते थे। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर ब्राह्मण भी चलता था और चांडाल भी। महाप्रभु ने पहली बार समाज को यह पाठ पढ़ाया कि ईश्वर के दरबार में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। उनका एक ही सूत्र था: जेई भजे सेई बड़ो, अभक्त हीन छार। कृष्ण भजने नाहि जाति-कुल विचार॥ अर्थात जो भगवान को भजता है वही श्रेष्ठ है, शेष सब व्यर्थ है।

इसी भाव को लेकर वे बंगाल से निकले। झारखंड के जंगलों को पार करते हुए वे श्रीजगन्नाथपुरी पहुंचे। वहां से फिर बंगाल लौटे और नाम संकीर्तन करते-करते वृंदावन की धूल छान आए। वृंदावन में उन्होंने लुप्त हो चुके कृष्ण के लीला स्थलों को फिर से जीवित किया। बंगाल का विष्णुपुर और बांकुड़ा उनके प्रभाव से द्वितीय वृंदावन बन गया। नदिया गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा।

पुरी में उन्होंने अगले बारह वर्ष बिताए। यहीं रहकर उन्होंने भगवान जगन्नाथ के महात्म्य को जन-जन तक पहुंचाया। उनके मुख से निकला वाक्य आज भी पुरी में गूंजता है: जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ। जगन्नाथ का भात, जगत उठाए हाथ। नंगी भूमि पर बैठकर खात, पूछत न जात-पात। यानी जगन्नाथ का प्रसाद पाने के लिए पूरी दुनिया हाथ फैलाती है और उसे पाने के लिए कोई जाति नहीं पूछी जाती।

पर महाप्रभु की इससे भी मर्मस्पर्शी लीला जुड़ी है पुरी की रथयात्रा से। आषाढ़ के दिन जब जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, तो महाप्रभु प्रेम में पागल हो जाते थे। वे रथ के आगे नाचते, संकीर्तन करते और आंसुओं से रथ की धूल भिगो देते। गौड़ीय परंपरा मानती है कि महाप्रभु स्वयं कृष्ण के अवतार थे, इसलिए जब वे नाचते तो रथ भी रुक जाता।

पुरी के वृद्ध आज भी एक कथा सुनाते हैं। एक बार महाप्रभु भावातिरेक में मूर्छित होकर गिर पड़े। उनका सारा शरीर पसीने से लथपथ था और मुख से बस “कृष्ण-कृष्ण” निकल रहा था। सेवकों ने उठाना चाहा पर वे नहीं उठे। उसी क्षण जगन्नाथ का विशाल रथ भी बीच बाजार में थम गया। हजारों लोगों ने जोर लगाया, पर रथ एक इंच भी नहीं हिला। जैसे ही महाप्रभु को होश आया और उन्होंने फिर कीर्तन छेड़ा, रथ अपने आप चल पड़ा। उस दिन सबने मान लिया कि भगवान भक्त के प्रेम के अधीन हैं।

इस यात्रा को और भव्य बनाने के लिए महाप्रभु ने संकीर्तन मंडली को सात भागों में बांट दिया। हर दल में मृदंग, झांझ और नर्तक थे। जब एक दल थकता तो दूसरा संभाल लेता। पूरा ग्रैंड रोड हरे कृष्ण के नाद से गूंजता और महाप्रभु एक दल से दूसरे दल में दौड़कर सबको भाव से भर देते।

महाप्रभु का यह आंदोलन केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहा। उस समय बंगाल में नवाब हुसैन शाह का राज था। नवद्वीप के काजी ने एक दिन फरमान जारी कर दिया कि अब कोई हरिनाम संकीर्तन नहीं करेगा। यह सुनकर महाप्रभु के अनुयायी डर गए, पर महाप्रभु स्वयं आगे आए। हजारों नर-नारियों के साथ वे रात में मशालें लेकर संकीर्तन करते हुए काजी के द्वार पहुंच गए। इतनी भीड़ और इतना प्रेम देखकर काजी कांप गया। उसने महाप्रभु के चरण पकड़ लिए और न सिर्फ क्षमा मांगी, बल्कि नवद्वीप में गोहत्या पर भी प्रतिबंध लगा दिया। कहा जाता है कि उसी काजी की कब्र आज भी नवद्वीप में ‘फकीर की दरगाह’ के नाम से पूजी जाती है। महाप्रभु से प्रभावित होकर सैकड़ों मुसलमान भी वैष्णव बन गए। उन्होंने मांस-मदिरा छोड़ दी। वृंदावन में एक पठान और एक मौलवी उनसे मिले और शिष्य बन गए। महाप्रभु ने मौलवी का नाम रामदास रख दिया।

उनकी कृपा से असम, ओडिशा, झारखंड और मणिपुर की वनवासी जातियों तक कृष्ण भक्ति पहुंची। उन्होंने जगह-जगह गौड़ीय मठ स्थापित किए। आज इस्कॉन पूरी दुनिया में जो संकीर्तन कर रहा है, उसकी जड़ में भी चैतन्य महाप्रभु ही हैं।

जीवन के अंतिम दिनों में एक दिन महाप्रभु सभी शिष्यों के साथ जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में संकीर्तन करते हुए चले गए। घंटों तक अंदर से आवाज आती रही, फिर धीरे-धीरे शांत हो गई। जब पुजारियों ने द्वार खोला तो अंदर महाप्रभु का शरीर नहीं था। भक्त मानते हैं कि वे सशरीर भगवान जगन्नाथ के विग्रह में ही विलीन हो गए।

आज 500 साल बाद भी जब पुरी में रथ खींचा जाता है, तो लाखों लोग उसी भाव से रस्सी पकड़ते हैं जिस भाव से महाप्रभु ने पकड़ी थी। चैतन्य महाप्रभु ने हमें सिखाया कि भक्ति कोई कर्मकांड नहीं, प्रेम है। और जब प्रेम अपने चरम पर पहुंचता है, तो पत्थर का भगवान भी पिघल जाता है और रथ भी रुक जाता है।         (विनायक फीचर्स)

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