सम्पादक रुद्रप्रयागः लक्ष्मण सिंह नेगी
(नया अध्याय, देहरादून)
बुग्यालों में गूंजा दाती पर्व का उल्लास।
देव पूजन के साथ नियुक्त हुआ भेड़-बकरियों का सेनापति।
ऊंच हिमालयी बुग्यालों में छह माह प्रवास करने वाले भेड़ पालकों ने मनाया दाती त्यौहार ।

ऊखीमठ: ऊंच हिमालयी बुग्यालों में छह माह तक भेड़-बकरियों के साथ प्रवास करने वाले भेड़ पालकों का पारंपरिक दाती त्यौहार हर्षोल्लास एवं धार्मिक आस्था के साथ मनाया गया। सावन माह के अन्तिम सप्ताह में आयोजित होने वाला यह लोकपर्व हिमालयी पशुपालक संस्कृति, देव आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत प्रतीक माना जाता है। बुग्यालों में प्रवास कर रहे भेड़ पालकों ने देव पूजन कर सुख-समृद्धि एवं पशुधन की कुशलता की कामना की।
दाती पर्व के अवसर पर भेड़ पालकों ने विधि-विधान से स्थानीय देवी-देवताओं का पूजन-अर्चन किया, इसके बाद भेड़-बकरियों के सेनापति की नियुक्ति की पारंपरिक रस्म निभाई गई। पशुधन की सुरक्षा, बुग्यालों में विचरण और झुंड के संचालन में सेनापति की विशेष भूमिका मानी जाती है। इस दौरान भेड़ पालकों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हुए देवताओं से अपने पशुधन की रक्षा का आशीर्वाद मांगा।
छह माह बुग्यालों में रहता है प्रवास
भेड़ पालकों के लिए बुग्याल केवल पशु चराने का स्थान नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली और लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। गर्मियों के मौसम में मैदानी एवं निचले क्षेत्रों से भेड़-बकरियों के साथ ऊंच हिमालयी बुग्यालों की ओर प्रस्थान करने वाले पशुपालक करीब छह माह तक यहीं प्रवास करते हैं। इस दौरान उनका जीवन प्रकृति, पशुधन और स्थानीय देव परंपराओं से गहराई से जुड़ा रहता है।
पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
भेड़ पालक वीरेन्द्र धिरवाण ने बताया कि दाती त्यौहार को पशुपालक समाज की प्राचीन परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है। प्रत्येक वर्ष सावन माह के अन्तिम सप्ताह में ऊंच हिमालयी बुग्यालों में इस पर्व का आयोजन किया जाता है। बुजुर्ग पशुपालक नई पीढ़ी को दाती पर्व की धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं से परिचित कराते हैं। देव पूजन और सेनापति नियुक्ति की रस्म के माध्यम से पशुधन की रक्षा और बुग्यालों में सुरक्षित प्रवास की कामना की जाती है।
लोक संस्कृति का संरक्षण
आधुनिकता के दौर में जहां पारंपरिक पर्व एवं लोक संस्कृतियां धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं, वहीं दाती त्यौहार जैसी परंपराएं हिमालयी पशुपालक समाज की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं। यह पर्व प्रकृति, पशुधन और देव आस्था के बीच स्थापित उस आत्मीय संबंध को दर्शाता है, जो सदियों से हिमालयी समाज की पहचान रहा है। भेड़ पालक प्रेम भट्ट ने कहा कि दाती पर्व आने वाली पीढ़ियों तक इसी उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता रहेगा।
दाती पर्व की विशेषता
दाती त्यौहार सावन माह के अन्तिम सप्ताह में ऊंच हिमालयी बुग्यालों में मनाया जाता है। छह माह तक बुग्यालों में प्रवास करने वाले भेड़ पालक इस दिन देव पूजन करते हैं और भेड़-बकरियों के झुंड के सेनापति की नियुक्ति की परंपरा निभाते हैं। पशुधन की सुरक्षा एवं कुशलता की कामना इस पर्व का प्रमुख उद्देश्य है।
प्रधान संगठन ब्लॉक महामंत्री मदन भट्ट का कहना है कि भेड़ पालकों 6 माह हिमालयी प्रवास किसी साधना से कम नहीं है। संचार व ऊर्जा युग में भेड़ पालक इन सुविधाओं से वंचित रहकर भेड़ पालन व्यवसाय को निरन्तर बढ़ा रहे हैं, प्रदेश सरकार व पशुपालन विभाग को भेड़ पालकों के लिए प्रोत्साहन राशि देने कार्य योजना तैयार करनी चाहिए।







