सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका व शिक्षिका
रिपोर्टर, उद्घोषिका, नवापारा-राजिम
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, देहरादून)
लेख:
“बाँटोगे तो भरोगे”
– सरोज कंसारी
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यह संसार एक ऐसी उपस्थिति है, एक एक चलती नदी जहाँ मनुष्य का जीवन व्यापन कर रहा है। आने वाले प्रत्येक क्षण में क्या घट जाएगा, यह मनुष्य सोच भी नहीं पाता। इसलिए जब मनुष्य अपने भीतर प्रार्थना, सेवा, सत्कर्म और सद्भावना को कल्याण हेतु रखता है, तो सबका भला हो ऐसी कामना होती है, पर इसके लिए आदमी को सभी के प्रति संवेदनशील होना पड़ता है।
यहाँ भले इंसान के साथ यदि कुछ बुरा होता भी है, तो वह उसके अच्छे के लिए ही होता है। मनुष्य जब यह सोचकर प्रसन्न होता है कि मैंने किसी का दिल दुखा दिया, उसे सताया और मैं ठीक हूँ, तो वह भूल कर रहा होता है। क्योंकि प्राचीन ग्रंथों से भी हमें यही ज्ञात होता है कि इंसान कर्म अच्छा करे या बुरा, उसे उसका फल अवश्य मिलता है। जो इंसान किसी का बुरा करके भूल जाता है, उसे उससे भी ज्यादा दुःख झेलना पड़ता है।
काव्य:
कर्म का फल मिलना तय है,
और सच्चा सुकून धन में नहीं,
संतोष व एक-दूसरे के
काम आने में है।
संसार की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वो भागता-दौड़ता है। चैन-संतोष तो कहीं-कहीं ही होता है, अधिकतर लोग अपनी ही धुन में अंधे हैं। सुकून आज तक कोई धनवान नहीं खरीद सका। सुकून तो तब मिलता है, जब हम उसी में प्रसन्न रहते हैं जो हमारे पास है, जब हमें कुछ नहीं चाहिए होता है।
यहाँ लोग अधिकतर छोटे और औसत दिमाग वाले ही होते हैं, वो चर्चा करते हैं घटना को लेकर, लोगों पर उनका ध्यान अधिक होता है। और जो बड़े चेतनाशील, विचारवान लोग होते हैं वो केवल विचारों पर बोलते हैं, उन्हें ही चर्चा का विषय बनाते हैं। यहाँ समय पर समझना कठिन होता है, समय को समझा जाता है।
यहाँ दुनिया में आवश्यकता है एक-दूसरे को समझने की, सद्भावना का घर बनाने की। पर लोगों को यह अनुभव बाद में ही होता है कि इंसान जब एक-दूसरे के काम आता है तो उसका भंडार कभी खाली नहीं करता वो सर्वशक्तिमान ईश्वर। जीवन की सार्थकता संग्रह करने में नहीं, बल्कि संतोष रखने और बांटने में है। सच्चा सुख बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि भीतर के संतोष में छिपा है।






