राजकुमार कुम्भज, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
वंदे मातरम् में बहुमत की तानाशाही.
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वंदे मातरम् वंदन-गायन में बहुमत की तानाशाही के दुर्लभ-अंश देखना अन्यथा नहीं है.असहमतियों का तिरस्कार करने से किसी भी लोकतंत्र की महानता संदिग्ध नज़र आना अस्वाभाविक नहीं है.
राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान से असहमत होने का एक सीधा-सीधा आशय और अभिप्राय यह भी हो सकता है कि ये स्तुतियाॅं सॅंस्कृत में लिखी गईं हैं और कि सॅंस्कृत भारतीय भाषा नहीं है.
अनेक अनुसंधान संस्थान प्रामाणिकता से साबित कर चुके हैं कि सॅंस्कृत आर्य भाषा है.
भारत में सॅंस्कृत से पहले प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषा होने की प्रामाणिकता सिद्ध हो चुकी है.यहाॅं तक कि सॅंस्कृत में प्राकृत तथा अपभ्रंश की उपस्थिति मिलती है जबकि प्राकृत तथा अपभ्रंश में सॅंस्कृत का अंशमात्र भी उपलब्ध नहीं है.शोध बताते हैं कि आर्य जब यूरेशिया ( मध्य एशिया ) से भारत आए,तो ज़ाहिर है कि उनके साथ उनकी अपनी भाषा,सॅंस्कृत भी आ गई.
इस तरह भारत में सॅंस्कृत का आगमन ज़रा भी अस्वाभाविक घटना नहीं था.जो भी क़बीले जहाॅं भी जाते हैं,वे वहाॅं अपना बहुत सारा साॅंस्कृतिक-संसार साथ-साथ लिए चलते हैं.
सर्वविदित तथ्य है कि आर्य के बाद मुग़ल और मुग़ल के बाद ॳॅंग्रेज़ भारत आए,जो अपने साथ-साथ अपनी-अपनी परंपराओं,आस्थाओं और विश्वासों का लवाज़मा भी लेते आए.
आर्य अगर सॅंस्कृत भाषा लेकर आए थे,तो उन्हीं की तरह मुग़ल भी अपने साथ अरबी-फ़ारसी और ॳॅंग्रेज़ अपनी भाषा,ॳॅंग्रेज़ी ले आए थे.
अपने आरंभिक-काल में ये भाषाऍं राजकाज की गोपनीय भाषाऍं बनीं रहीं और सामान्य जन-जीवन से समानांतर दूरी बनाकर चलतीं रहीं,किन्तु सरकारी स्कूलों-कॉलेज़ों,ठेकों तथा नौकरियों के मुताबिक़ स्थितियाॅं परिस्थितियाॅं बदलतीं गईं.
स्तुतियों-प्रस्तुतियों की स्थापनाऍं भी अपनी-अपनी सत्ताओं के मॅंगलगान में समर्पित रहती हैं.
सत्ताओं के संरक्षण तथा आदेशानुसार, विजय-गाथाऍं और इतिहास-कथाऍं लिखा जाना एक वर्जित,किन्तु परंपरागत शग़ल रहा है.इस शग़ल का अनुकरण अतिप्राचीनकाल से यथावत चला आ रहा है.
कौन नहीं जानता है कि पराजितों की पीड़ाऍं और असहमतों की व्यथाऍं,कभी भी इतिहास का विषय नहीं रही हैं,उनके आर्तनाद को सुनने-देखने-लिखने के वास्ते और मंशा से शायद कवियों का आविष्कार हुआ है.
कवियों ने सिर्फ़ आर्तनाद ही नहीं लिखे,कुछ जाॅंबाज़ कवियों ने सत्ता-वंदनाऍं भी लिखीं और मातृभूमि के सम्मान में राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत भी लिखे.
वक़्त बदलते ही,सत्ताऍं बदल जाती हैं,सत्ता-वंदनाऍं बदल जाती हैं,इतिहास बदल जाते हैं,लेकिन मनुष्यता की महानता यही है कि असहमतियाॅं नहीं बदलतीं हैं.
असहमतियाॅं हर युग,हर काल -खंड और हर सत्ता-विरूद्ध क़ायम-मुक़ाम मिलती हैं.अस्वीकृत और तिरस्कृत होते रहने पर उनका एकाधिकार है!
अब इस असहमति से क्या फ़र्क़ पड़ता है कि वंदेमातरम् और जन-गण-मन दोनों ही सॅंस्कृत में क्यों हैं?
जिस हिंदी भाषा को आज वैश्विक-मान्यता का दर्ज़ा मिला है,उस खड़ी बोली की मान्यता का समय और जन्म,भारतेन्दु हरिश्चन्द्र-युग है.
वंदे मातरम् के दो छंदों बाद—दुर्गा,लक्ष्मी,
सरस्वती—के वंदन-गायन को अगर कुछ लोग अपनी मान्यताओं,परंपराओं और आस्थाओं से विपरित परिस्थितियों में पाते हुए ख़ुद को असहज पाते हैं,तो इस मुद्दे को तुष्टिकरण अथवा संतुष्टिकरण जैसे बाज़ारू जुमलों से जोड़कर देखने का अपराधीकरण क्यों किया जाना चाहिए?
सरकार क़ानून बनाती है,ठीक है.संसद में बहुमत से सरकार बनती-बिगड़ती है,ठीक है.51 है,तो बहुमत हुआ,ठीक है,लेकिन वह जो 49 है उसके प्रतिनिधित्व का क्या हुआ?
अर्थात् इस महान् मौजूदा लोकतांत्रिक-संसदीय व्यवस्था का निर्णायक नीति-निर्धारण मात्र 1 कर रहा है,क्या ये ठीक है?
इसलिए भी अगर किसी की भी अपनी मान्यताओं,परंपराओं तथा आस्थाओं के मुताबिक़ वंदे मातरम् के दो छंदों बाद का वंदन-गायन आपत्तिजनक और असहज प्रतीत होता है अथवा हो रहा है,तो कुछ अधिक गंभीरता से विचार किया जाना क्या ज़रूरी नहीं हो जाता है?
क़ानून का भय,क़ानून तोड़ने की शक्ति भी देता है.एक सीमा के बाद क़ानून के भय की सीमा समाप्त हो जाती है.संशय नहीं है कि गाॅंधी का नमक-सत्याग्रह और लोहिया का सिविल-नाफ़रमानी,इसके सबसे प्रेरक व प्रामाणिक ज्ञात उदाहरण हैं.
कुछ इसलिए भी क्यों नहीं असहमति का पर्याप्त सम्मान किया जाना चाहिए और क्यों नहीं लोकतंत्र में बहुमत की तानाशाही पर गहरी व्याकुलता व्यक्त की जाना चाहिए?
अंततः वंदे मातरम् के वंदन-गायन को राष्ट्रवाद से जोड़कर देखना,अगर बहुमत की तानाशाही नहीं है,तो फिर क्या?






