राज्य का संयम,समाज का अनुशासन, तभी सधेगा व्यवस्था का संतुलन।

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कुमार कृष्णन

            (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

 

राज्य का संयम,समाज का अनुशासन, तभी सधेगा व्यवस्था का संतुलन।

 

(विनायक फीचर्स)

लोकतंत्र की पहचान केवल नियमित चुनावों से नहीं होती। उसकी असली कसौटी यह है कि वह असहमति के साथ कैसा व्यवहार करता है। धरना, प्रदर्शन, रैली और जनसभा केवल राजनीतिक गतिविधियां नहीं, बल्कि नागरिकों और राज्य के बीच संवाद के संवैधानिक माध्यम हैं। इसलिए किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए राज्य द्वारा बल प्रयोग का प्रश्न महज कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। यह नागरिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और राज्य की जवाबदेही से भी जुड़ जाता है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए ‘चलो संसद’ प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के कथित इस्तेमाल और साहिल लोचब के घायल होने के मामले ने इस बहस को फिर सामने ला दिया है। साहिल की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 118 और 125 के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। धारा 118 खतरनाक हथियार या साधन से जानबूझकर चोट अथवा गंभीर चोट पहुंचाने से संबंधित है, जबकि धारा 125 दूसरों के जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कृत्यों से जुड़ी है। एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी संसद मार्ग थाने पहुंचे और साहिल तथा उनकी मां के साथ धरने पर बैठे। उनका आरोप था कि साहिल के शरीर में अब भी पैलेट के छर्रे हैं और उनकी आंख की रोशनी प्रभावित हुई है। राहुल गांधी ने इसे केवल एक युवक के साथ कथित अन्याय का मामला नहीं माना, बल्कि यह सवाल भी उठाया कि जब राजधानी के एक पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने में इतनी कठिनाई हो सकती है, तो दूरदराज के गांवों और छोटे शहरों में आम नागरिक की स्थिति क्या होती होगी।

साहिल ने भी शिकायत दर्ज कराने में आई कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी और उनकी टीम के प्रति आभार जताया। कांग्रेस ने एफआईआर को न्याय की दिशा में पहला कदम बताया, जबकि भाजपा ने राहुल गांधी पर अराजकता की राजनीति करने का आरोप लगाया। भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया पहले से चल रही है।

इन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों से अलग इस पूरे मामले का मूल प्रश्न है कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए राज्य की शक्ति की संवैधानिक सीमा क्या होनी चाहिए?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19 (1) (ख) शांतिपूर्वक तथा निःशस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा जैसे संवैधानिक आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। लेकिन प्रतिबंध की कसौटी राज्य की सुविधा नहीं, संविधान है।

राज्य का दायित्व केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं है। उसे व्यवस्था की रक्षा करते हुए नागरिक स्वतंत्रताओं को अनावश्यक क्षति से भी बचाना होता है। यही कारण है कि जंतर-मंतर की घटना को केवल पैलेट गन के इस्तेमाल के विवाद के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि भारत की भीड़ नियंत्रण नीति कितनी लोकतांत्रिक, मानवीय और जवाबदेह है।

कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के पास बल प्रयोग की शक्ति होना आवश्यक है। प्रदर्शन के दौरान हिंसा, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या सुरक्षा बलों पर हमला हो तो पुलिस मूकदर्शक नहीं रह सकती। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में बल प्रयोग असीमित अधिकार नहीं है। उसकी वैधता आवश्यकता, अनुपातिकता, सावधानी और जवाबदेही से तय होनी चाहिए।

मूल सिद्धांत सरल है,राज्य उतना ही बल प्रयोग करे, जितना स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वास्तव में आवश्यक हो। यदि संवाद, चेतावनी, मध्यस्थता या अन्य कम हानिकारक उपायों से स्थिति संभाली जा सकती है, तो अधिक जोखिम वाले साधनों का इस्तेमाल अंतिम विकल्प होना चाहिए।

पैलेट गन को अपेक्षाकृत कम घातक भीड़ नियंत्रण साधन माना जाता है। लेकिन कम घातक का अर्थ नुकसानरहित नहीं है। धातु के अनेक छोटे कण एक साथ फैलते हैं और उनके शरीर के किस हिस्से पर लगने का नियंत्रण सीमित होता है। आंख, सिर, गर्दन या शरीर के अन्य संवेदनशील हिस्सों में चोट स्थायी नुकसान तक पहुंचा सकती है। इसलिए किसी हथियार की संवैधानिक स्वीकार्यता केवल उसके आधिकारिक वर्गीकरण से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक प्रभाव से भी तय होनी चाहिए।

भारत में पैलेट गन को लेकर सबसे गंभीर बहस जम्मू-कश्मीर में इसके इस्तेमाल के बाद सामने आई थी। आंखों की रोशनी जाने और गंभीर चोटों के अनेक मामलों ने इसके उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े किए। जंतर-मंतर की घटना ने उसी बहस को राष्ट्रीय राजधानी में फिर सामने ला दिया है।

हालांकि इस मामले में पैलेट के कथित इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। सुरक्षा बलों की ओर से धातुयुक्त पैलेट के इस्तेमाल के आरोपों का खंडन किया गया है, जबकि प्रदर्शनकारियों और याचिकाकर्ताओं के दावे अलग हैं। ऐसे विरोधाभासी दावों के बीच किसी निष्कर्ष पर पहुंचना राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच और वैज्ञानिक साक्ष्यों से संभव है।

यही कारण है कि न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अभी किसी पक्ष को दोषी नहीं ठहराया है और न ही पैलेट गन के इस्तेमाल पर अंतिम निष्कर्ष दिया है। उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रयुक्त सामग्री को सुरक्षित रखने जैसे कदम यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं कि आगे की प्रक्रिया प्रमाणों पर आधारित हो। लोकतंत्र में आरोप जितने गंभीर हों, निष्पक्ष जांच की आवश्यकता उतनी ही अधिक होती है।

न्यायालय का काम राजनीतिक आरोपों की पुष्टि करना नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच करना और राज्य की कार्रवाई को संविधान की कसौटी पर परखना है। यही न्यायिक संयम लोकतंत्र की संस्थाओं में विश्वास बनाए रखता है।

भीड़ नियंत्रण के संदर्भ में आधुनिक पुलिसिंग का पहला माध्यम बल नहीं, संवाद होना चाहिए। प्रशिक्षित वार्ताकार, चरणबद्ध चेतावनी, सुरक्षित निकासी मार्ग, जोखिम का वैज्ञानिक आकलन और स्थिति के अनुरूप रणनीति पुलिस की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि बल प्रयोग अपरिहार्य हो, तो उसका उद्देश्य और सीमा दोनों स्पष्ट होने चाहिए।

दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में भीड़ प्रबंधन की रणनीतियां इसी दिशा में विकसित हुई हैं। संवाद, मध्यस्थता, वीडियो रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा, प्रशिक्षित वार्ताकार और स्वतंत्र निगरानी जैसे उपायों का उद्देश्य केवल भीड़ हटाना नहीं, बल्कि पुलिस और नागरिक दोनों की सुरक्षा तथा बाद की जवाबदेही सुनिश्चित करना है। आधुनिक पुलिसिंग की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि भीड़ कितनी जल्दी तितर-बितर हुई, बल्कि इससे भी कि कार्रवाई के दौरान नागरिक गरिमा और अधिकारों की कितनी रक्षा हुई।

भारत में यह प्रश्न पुलिस सुधार से भी जुड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) में पुलिस को अधिक पेशेवर, जवाबदेह और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त बनाने के लिए कई संस्थागत सुधारों का निर्देश दिया था। इन सुधारों की भावना को पूरी तरह लागू करना आज भी चुनौती है। भीड़ नियंत्रण, मानवाधिकार और पुलिस जवाबदेही को अलग-अलग विषय मानने के बजाय इन्हें लोकतांत्रिक पुलिसिंग के एक ही ढांचे का हिस्सा समझना होगा।

लेकिन प्रदर्शनकारियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, पर हिंसा, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या सुरक्षा बलों पर हमला इस अधिकार की संवैधानिक सीमा से बाहर जा सकता है। राज्य का दायित्व है कि वह कानून लागू करे और प्रदर्शनकारियों का दायित्व है कि वे अपने विरोध को शांतिपूर्ण रखें। अधिकार और उत्तरदायित्व लोकतंत्र के दो अलग रास्ते नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।

जंतर-मंतर में यदि पुलिस ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया है, तो निष्पक्ष जांच उसे सामने लाएगी। यदि प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है, तो वही जांच जिम्मेदारी तय करेगी। दोनों स्थितियों में पारदर्शिता लोकतंत्र के हित में है।

भारत को भीड़ नियंत्रण की मौजूदा मानक संचालन प्रक्रियाओं की व्यापक समीक्षा की जरूरत है। प्रदर्शनकारियों के साथ पहले से समन्वय, प्रशिक्षित वार्ताकारों की नियुक्ति, स्पष्ट और चरणबद्ध चेतावनी, सुरक्षित मार्ग, बॉडी कैमरों का इस्तेमाल, कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग और प्रत्येक बल प्रयोग का स्वतंत्र दस्तावेजीकरण अनिवार्य किया जा सकता है। इससे पुलिस की कार्यक्षमता बढ़ेगी और नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू है पुलिस थाने तक न्याय की पहुंच। यदि किसी घायल नागरिक को प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए घंटों धरने पर बैठना पड़े, तो यह केवल एक मामले की प्रशासनिक समस्या नहीं है। यह राज्य और नागरिक के बीच शक्ति के असंतुलन का बड़ा सवाल उठाता है। एफआईआर दर्ज होना दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है, लेकिन शिकायत को विधिसम्मत ढंग से दर्ज करना और निष्पक्ष जांच करना न्याय व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है।

राजधानी में हुई घटना को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं। लेकिन लोकतंत्र के लिए इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि राजनीतिक विवाद से अलग संस्थागत प्रक्रिया अपना काम करे। सत्ता पक्ष को जांच से पहले किसी को दोषी घोषित नहीं करना चाहिए और विपक्ष को राजनीतिक दबाव को न्याय का विकल्प नहीं बनाना चाहिए। न्याय की विश्वसनीयता तभी कायम होगी, जब वह सत्ता और विपक्ष दोनों से समान दूरी पर रहे।

यह विवाद केवल पैलेट गन का नहीं, बल्कि राज्य की शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन का प्रश्न है। राज्य के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति होनी चाहिए, लेकिन उस शक्ति पर संविधान की सीमा भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में पुलिस का अधिकार नागरिक के अधिकार का प्रतिद्वंद्वी नहीं है, दोनों की रक्षा एक ही संवैधानिक व्यवस्था करती है।

भारत को ऐसी भीड़ नियंत्रण नीति की आवश्यकता है जिसकी पहली प्रवृत्ति बल प्रयोग नहीं, संवाद हो, जिसका पहला हथियार दमन नहीं, संयम हो, और जिसकी अंतिम कसौटी केवल भीड़ को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि नागरिक गरिमा, मानवाधिकार और कानून के शासन की रक्षा करना हो। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात से नहीं मापी जाती कि राज्य विरोध को कितनी कठोरता से दबा सकता है। उसकी असली शक्ति यह है कि वह असहमति के बीच भी संविधान, नागरिक अधिकार और मानवीय गरिमा की रक्षा कितनी निष्पक्षता और धैर्य से करता है।                 (विनायक फीचर्स)

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