कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी (चन्दू )
बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आँख खुले बस तेरी बातें,
बन मीठी यादें घुलती हैं,
विरह की ज्वाला बन जाती वेदन,
नीर नैन से ढुरती है।
तेरी हँसी की मधुर तरंगें,
मन के तार बजाती हैं,
सूनी-सूनी इन राहों में,
तेरी आहट भरमाती हैं।
चाँद खड़ा है नभ के ऊपर,
फिर भी रात न ढलती है,
तेरे बिन इस सूने मन की,
हर धड़कन बस जलती है।
फूल खिले हैं उपवन में पर,
खुशबू मुझको छलती है,
तेरी यादों की पुरवाई,
चुपके से आ मिलती है।
पल-पल तेरा नाम पुकारे,
साँस-साँस कुछ कहती है,
तेरी तस्वीर हृदय में रहकर,
आँखों से बातें करती है।
भीगी-भीगी पलकें मेरी,
तेरा पता ही पूछती हैं,
तेरे बिन ये सूनी रातें,
करवट लेकर रूठती हैं।
कब लौटोगे मेरे सजना,
बाट तुम्हारी तकती हूँ,
तुम बिन सूने जीवन-पथ पर,
तन्हा-तन्हा चलती हूँ।
मन की वीणा मौन पड़ी है,
कोई तार न बजता है,
तेरी यादों का दीपक बनकर,
हर पल मन में जलता है।
आँख खुले बस तेरी बातें,
बन मीठी यादें घुलती हैं,
विरह की ज्वाला बन जाती वेदन,
नीर नैन से ढुरती है।
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पल भर की जुदाई तुमसे,
अब सहना मैं चाहूँ न,
दूर कहीं तुमसे जुदा होकर,
रहना अब मैं चाहूँ न।
आँखों में बसते हो तुम ही,
नींद कहाँ अब आती है,
तेरी यादों की पुरवाई,
तन-मन मेरा सहलाती है।
सूनी-सूनी रातें काटूँ,
कोई दीप जलाऊँ न,
पल भर की जुदाई तुमसे,
अब सहना मैं चाहूँ न।
तेरे बिना ये साँसें मेरी,
जैसे बोझ बनी रहतीं,
तेरे बिना ये धड़कन मेरी,
चुपके-चुपके रोती रहती।
तुम बिन जीवन रीत गया है,
और कोई रंग भाऊँ न,
दूर कहीं तुमसे जुदा होकर,
रहना अब मैं चाहूँ न।
तेरी आहट सुनने को मैं,
राहों पर नज़रें धरती,
तेरे कदमों की कल्पना में,
हर पल खुद से बातें करती।
तुम आ जाओ पास मेरे तो,
फिर कोई ग़म पाऊँ न,
पल भर की जुदाई तुमसे,
अब सहना मैं चाहूँ न।
तुमसे ही तो प्रीत लगी है,
तुमसे ही संसार मेरा,
तुम बिन जैसे अधूरा है,
हर सपना और प्यार मेरा।
जनम-जनम तक साथ तुम्हारा,
इससे अधिक मैं चाहूँ न,
दूर कहीं तुमसे जुदा होकर,
रहना अब मैं चाहूँ न।
चन्द्रमती की यही पुकार है,
सुन लेना तुम आज सनम,
तेरे संग ही साँस चले और,
तेरे संग ही हो मेरा दम।
तुमसे दूर एक पल भी रहना,
अब तो मैं बिल्कुल चाहूँ न,
पल भर की जुदाई तुमसे,
अब सहना मैं चाहूँ न।






