संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आदमी का जंगल और जानवरों का
‘हैप्पी एनिमल डे’
आज 4 अक्टूबर है। इंटरनेट पर रंग-बिरंगे पोस्टर्स की बाढ़ आ चुकी है, व्हाट्सएप ग्रुपों में क्यूटनेस का ओवरलोड है और इंसान बड़े गर्व से अपनी डीपी बदलकर ‘विश्व पशु दिवस’ मना रहा है। वाह! क्या संवेदनशीलता है! इंसान भी कितना महान प्राणी है, साल के 364 दिन जंगलों को काटकर कंक्रीट के गगनचुंबी पिंजरे बनाता है, नदियों में कचरा और जहर घोलता है, और फिर किसी एक दिन जानवरों की तस्वीर शेयर करके अपनी ‘पशु-प्रेम’ की टीस मिटा लेता है। सच तो यह है कि अगर आज जंगलों के किसी शेर या गली के किसी आवारा कुत्ते के पास स्मार्टफ़ोन होता, तो वह इंसानों की इस नौटंकी पर जोर से हँसता—अगर उसके पास भूख से बिलबिलाने और गाड़ियों के पहियों से बचने के बाद ज़रा भी वक्त बचता।
इंसान ने प्रकृति के साथ कितना शानदार न्याय किया है! उसने जानवरों को उनकी ही जमीन से खदेड़ दिया और जब वे जान बचाने के लिए शहरों की सड़कों पर आ गए, तो उन्हें ‘अतिक्रमणकारी’ या ‘खतरनाक आवारा’ घोषित कर दिया। जंगलों को काटकर हमने मॉल और हाईवे बना दिए, और जब कोई तेंदुआ या हाथी गलती से अपने पुराने रास्ते पर आ जाता है, तो हम चीखने-चिल्लाने लगते हैं कि देखिए, जानवरों ने ‘मानव बस्तियों’ में आतंक मचा दिया है। असल में आतंक किसने मचाया है, यह किसी से छिपा नहीं है। हमने उनकी दुनिया छीन ली और बदले में उन्हें क्या दिया? सड़क के किनारे पड़ा प्लास्टिक का कचरा, जिसे खाकर गायें अपने पेट में ज़हर पालती हैं, और जहरीली हवा, जिसमें सांस लेना इंसान के लिए तो खैर फैशन है ही, बेजुबानों के लिए मजबूरी बन चुकी है।
आजकल के पशु-प्रेम का अपना अलग ही ड्रामा है। घर में विदेशी नस्ल का कुत्ता पालो, उसे एसी में रखो, महंगे बिस्किट खिलाओ और फिर इंस्टाग्राम पर रील बनाकर खुद को ‘एनिमल लवर’ साबित करो। लेकिन वही इंसान जब घर के बाहर गली के किसी भारतीय कुत्ते को देखता है, तो उसे भगाने के लिए पत्थर उठा लेता है। यह कैसी चुनिंदा हमदर्दी है? एक तरफ इंसान लैब में बेजुबानों पर कॉस्मेटिक्स और दवाइयों के बेरहम ट्रायल करता है ताकि उसकी सुंदरता और जिंदगी बनी रहे, और दूसरी तरफ एक दिन कैलेंडर पर गोला बनाकर ‘एनिमल राइट्स’ पर ज्ञान झाड़ता है। अगर आज जानवर बोल पाते, तो वे इंसान से कोई अधिकार या सहानभूति नहीं मांगते, वे बस एक ही दुआ करते—“हे ईश्वर, हमें इस इंसान की दया और उसके मनाए जाने वाले त्योहारों से बचा लो, हम अपनी तबाही खुद झेल लेंगे, मगर इस ढोंग का बोझ हमसे नहीं उठता!”







