गजल 

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राजेंद्र रंजन गायकवाड

(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) 

बिलासपुर, छत्तीसगढ़

 

               (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)  

 

 

 

     गजल 

कुछ सोचता और कुछ हो जाता है,

जिसे खोजता हूँ, वही खो जाता है।

प्यार की राहों में, भटकते-भटकते,

ख़्वाबों में खोने को तन सो जाता है।

वो मुस्कान जो चुरा ली थी आँखों से,

बीते पलों को सोचके मन रो जाता है।

शाम ढलती तो उदासियाँ जगमगाती हैं,

रात के साये में दिल, ग़म ढो जाता है।

इश्क़ की किताबें, पढ़ते रहे उम्र भर,

लोगों की सुनके, नयन सब धो जाता है।

 

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